Anurag Pandey उग्र राष्ट्रवाद, आतंकवाद और मजबूत सरकार

Updated: Jul 23, 2019

सन 2014 के आम चुनावों में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बी जे पी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। बी जे पी सरकार ने सत्ता में आने के बाद से ही अपनी पारम्परिक नीति "पहचान की राजनीति" का सहारा लिया और चुनाव या चुनावी लामबंदी के लिए प्रतीकों की राजनीति का बड़े आक्रामक तरीके से प्रयोग किया। इन प्रतीकों में गाय, मन्दिर-मस्जिद मुद्दा, देशद्रोह-देशप्रेम, राष्ट्रवाद, भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति की हत्या (मॉब लिंचिंग), मुस्लिम विरोधी विचार, सेना के शौर्य का राजनीतिक प्रयोग, नेहरु-गाँधी परिवार पर वाक् हमला, सभी विपक्षी दलों (मुख्यतः कांग्रेस) को पाकिस्तान परस्त घोषित करना, मुस्लिम्स पर अभद्र टिप्पणी इत्यादि को बाकी अन्य असली मुद्दों जैसे रोजगार, महंगाई, किसानो की समस्या इत्यादि पर तरजीह दी गई। बी जे पी वी. डी सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व की अवधारणा को आत्मसात करती है। हिंदुत्व की विचारधारा अल्पसंख्यको को देश की धारा से बाहर रखने की पक्षधर है, हिंदुत्व की विचारधारा अन्य समुदायों से नफ़रत के सिद्धांत पर आधारित है, क्युकी अल्पसंख्यकों की पुन्य भूमि और पितृ भूमि भारत में ना होकर या तो मक्का मदीना में है या येरुशलम में है। ये विचारधारा हिन्दुओं को संगठित करना चाहती है और इनके सैनिकीकरण की पक्षधर है, मजेदार बात ये के हिंदुत्व की विचारधारा हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था को खत्म करने की बात नहीं करता बल्कि चार वर्ण के सिद्धांत को पूरी तरह अपनाता है। (सावरकर द्वारा अपनी पुस्तक Hindutva: Who is a Hindu में लिखित)। यहाँ ये बताना आवश्यक है के हिंदुत्व और हिंदूइस्म में अंतर है, हिंदुत्व एक विचारधारा है जिसे सावरकर ने अपनी पुस्तक Hindutva: Who is a Hindu में कलमबद्ध किया, वहीं दूसरी ओर हिंदूइस्म एक धार्मिक मान्यता है, एक धर्म दर्शन है, जो हिन्दुओं की आस्था, ईश्वर में उनकी श्रद्धा एवं विश्वास, वेद पुराण एवं अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में अटूट आस्था इत्यादि को दर्शाता है।


बी जे पी हिंदुत्व के आधार पर हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा को अपनी पार्टी की विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करती है। राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ (बी जे पी की पैतृक संस्था) के दूसरे सरसंघचालक महादेव सदाशिव गोलवलकर अपनी पुस्तक We or Our Nationhood Defined में लिखते भी हैं के ‘ऐसे किसी भी व्यक्ति (मुख्यतः मुस्लिम्स और क्रिस्चियन) का राष्ट्रीय जीवन में कोई स्थान नहीं है। जो राष्ट्रीय संस्कृति (हिंदुत्ववादी संस्कृति) को नहीं अपनाता, ऐसे सभी व्यक्ति जब तक अपनी विशिष्ट पहचान को नहीं छोड़ते और राष्ट्रिय धर्म, भाषा एवं संस्कृति में अपने को समाहित नही करते तब तक उन्हें देश में सिर्फ अजनबी माना जायेगा और उन्हें द्वितीयक नागरिक की तरह से रहना होगा। (Golwalkar:1939.p.45-46).


कुल मिलाकर हिंदुत्व की विचारधारा में किसी और धर्म एवं संस्कृति के लिए कोई जगह नहीं है (हिन्दू धर्म के वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत से बिलकुल विपरीत और संकीर्ण)। बी जे पी इस विचारधारा को एक स्वीकृत विचारधारा के रूप में प्रस्तुत कर रही है एवं इसे मजबूती से रखने के लिए हिन्दू धर्म के कुछ धार्मिक चिन्हों का प्रतीक के रूप में बहुत आक्रामक तरीके से प्रयोग कर रही है। जाहिर है भारत जैसे बहुसंस्कृति राष्ट्र में कुछ लोग इसका समर्थन करेंगे और कुछ विरोध, कुछ सवाल पूछेंगे या आरोप लगायेंगे। किसी भी बहुसंस्कृति राष्ट्र में जनता पर एक तरह की कोई विशिष्ट विचारधारा नहीं थोपी जा सकती, भारत पर भी ये बात अक्षरशः लागू होती है, परन्तु वर्तमान सरकार एवं इसके समर्थक संगठन ऐसे सभी नागरिकों/संगठनों इत्यादि को देशद्रोही, राष्ट्र विरोधी होने का प्रमाण पत्र देने में कोई संकोच नही करते जो हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन नहीं करता/करती। कुल मिलाकर वर्तमान मोदी नेतृत्व वाली बी जे पी सरकार विपक्षी आवाज को, अपनी आलोचना को पूरी तरह दबाना चाहती है और देश एवं देशवासियों पर हिंदुत्व की विचारधारा थोपना चाहती है जो उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन करती है। देश में कानून का शासन है, संविधान सर्वोपरी है, लेकिन गौ हत्या या तस्करी के शक में मॉब लिंचिंग, (मानो भीड़ कानून से ऊपर हो गई है, अगर कोई व्यक्ति गौ तस्करी में शामिल भी था तो यही भीड़ पुलिस प्रशासन की मदद ले सकती थी, केस कर सकती थी, और गुनाहगार को सजा दिला सकती थी, लेकिन मोब लिंचिंग हुई और कई नेताओं ने कुछ लिंचर्स की आवभगत भी की), इसके अतिरिक्त दलितों-पिछड़ों पर अत्याचार और सरकार की चुप्पी, महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं और सरकार की चुप्पी, सोशल मीडिया का दुष्प्रयोग और उस पर गलत सूचनाओं का आदान प्रदान, सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को देशद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट बोलना एवं पाकिस्तान जाने की सलाह इत्यादि लगभग रोज के क्रियाकलाप बन गये हैं। पिछले 5 सालों में देश की स्थापित राजनीतिक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, बहुसंस्कृतिवाद, इतिहास इत्यादि पर लगातार हमले हुए हैं और हिंदुत्व आधारित उग्र राष्ट्रवाद अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है।


कुछ मीडिया समूह भी सरकार से सवाल ना पूछ कर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं और श्री नरेंद्र मोदी एवं बी जे पी को राष्ट्रवादी, देशप्रेमी, ईमानदार तथा सम्पूर्ण विपक्ष को देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी एवं भ्रष्टाचारी सिद्ध करने में लगे हुए हैं। हालांकि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में सवाल प्रधानमंत्री और सरकार से ही पूछे जाते हैं। देश में पिछले 5 सालों में कई ऐसे मुद्दे आये जहाँ सरकार की सीधे जवाबदेही होनी चाहिए थी लेकिन सरकार पर उस तरह से सवाल नहीं पूछे गये जैसे एक जिम्मेदार मीडिया से उम्मीद की जाती है और कई मुद्दों पर कई मीडिया हाउस सरकार के पैरोकार के रूप में दिखे और सवाल विपक्ष से पूछे जाने लगे। इनमे नोटबंदी, जी एस टी, बढती बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, किसानों की समस्याएं, राम जनम भूमि विवाद, तीन तलाक का मुद्दा, लव जिहाद, गौ हत्या या तस्करी के शक में हुई कई हत्याएं, सर्जिकल स्ट्राइक 2016, राफेल विमान खरीद मामला, एयर स्ट्राइक 2019, इत्यादि प्रमुख हैं, इनमें कई बार ऐसा लगा के मीडिया खुद सरकार की प्रवक्ता बन गयी है और श्री नरेंद्र मोदी को शक्तिशाली, निडर, ईमानदार, विकास पुरुष वाली छवि दे रही है, और उनसे सीधे सवाल पूछने को नजरअंदाज कर रही है।


इन सभी स्थितियों ने देश में उग्र राष्ट्रवाद के उन्माद को और बढ़ा दिया, और इसी उग्र राष्ट्रवाद का ही परिणाम है के कुछ अतिवादी लोग कानून भी अपने हाथ में लेने से पहले सोचते नहीं हैं, उनके लिए मॉब लिंचिंग, दलितों पर हमला, आरक्षण का विरोध, एस सी, एस टी एक्ट का विरोध, मुस्लिम-क्रिस्चियन विरोध इत्यादि आम बाते हो गईं हैं । ऐसी घटनाओं से उग्र राष्ट्रवाद को बल मिलता है और प्रगतिशील आवाजें कमजोर होती हैं। अंततः इस तरह की घटनाएं और मुद्दे कब हमारे दैनिक जीवन में प्रवेश कर गये, पता ही नहीं चला और बहुसंख्यक आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन सब घटनाओं को मूक या खुला समर्थन देने लगा और जाने अनजाने इस उग्र राष्ट्रवाद की लहर में घिर गया। यहीं से पाकिस्तान के लिए नफरत को एक नया उफान मिला, मुस्लिम्स, दलित, किसानों इत्यादि के लिए घृणा के भाव ने और मजबूती हासिल की एवं कई सामाजिक-राजनीतिक तथ्यों को इस उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा से रंगा जाने लगा।


परिणामस्वरुप इस पूरी व्यवस्था ने दो तरह के वर्ग को तैयार किया; एक वो जो पिछले कई वर्षों से अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पा रहा था और राजनीतिक परिद्रश्य से लगभग गायब हो चुका था (हालांकि समय समय पर इस तबके ने अपनी उपस्थिति भी दर्शाई)। इनमे कुछ ऊंची जातियां, हिंदूवादी संगठन, मिडल क्लास इत्यादि प्रमुख हैं, दूसरे वो जो इन प्रतीकों की राजनीति से कोई गुरेज नहीं करते, इनमें वो लोग शामिल किये जा सकते हैं जो सामान्यतः तो बी जे पी से कोई इत्तेफाक नहीं रखते लेकिन मुस्लिम के लिए घृणा का भाव, पाकिस्तान से नफरत, आरक्षण विरोधी विचार इत्यादि रखते हैं लेकिन इसका खुला प्रदर्शन नहीं करते। इन सभी ने अपनी आवाज उठाने के लिए अथवा पहचान पाने के लिए इस हिंदुत्व आधारित उग्र राष्ट्रवाद का सहारा लिया। इस उग्र राष्ट्रवाद ने सभी असली मुद्दों (जैसे महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार, गरीबी, महिला सुरक्षा, किसानों की समस्या इत्यादि) को पीछे धकेल दिया और प्रायोजित या प्रतीकात्मक मुद्दों (जैसे लव जिहाद, गौ रक्षा, मुस्लिम साम्प्रदायिकता, पाकिस्तान से नफरत, कांग्रेस और गाँधी परिवार पर वाक् हमला, 60 साल vs 5 साल, सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, वॉट्सएप, ट्विटर पर गलत सूचनाओं का निरंतर भेजा जाना इत्यादि) को देश के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में एक सत्य की तरह स्थापित करने का प्रयास किया। अब अधिकांश लोग गली मुहल्लों में, चाय की दुकानों इत्यादि जगहों पर असली मुद्दों पर चर्चा करते हुए कम और प्रतीकात्मक या प्रायोजित मुद्दों पर बात करते हुए ज्यादा नजर आते हैं।


इन्हीं कुछ चर्चाओं में पाकिस्तान और आतंकवाद की समस्या, मजबूत सरकार और मजबूर सरकार प्रमुख हैं। आतंकवाद भारत की कुछ प्रमुख समस्यायों में से एक है। सन 1993 के मुंबई ब्लास्ट के बाद से भारत समय समय पर आतंकवादी घटनाओं का शिकार रहा है। सामान्यतः भीड़ वाले इलाके, मार्केट इत्यादि में आतंकवादी घटनाएँ अधिकतर देखने में आती रही हैं। भारत आतंकवाद के लिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठनों पर आरोप लगाता आया है और पाकिस्तान पर इन आतंकवादियों के विरुद्ध कोई सटीक कदम ना उठाये जाने एवं उन्हें संरक्षण देने का आरोप भी लगाता रहा है। भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कई बार अंतराष्ट्रीय मंचों पर घेरने का भी प्रयास किया है एवं कई देशों ने भारत के रुख का समर्थन भी किया हैं। देश में जब भी आतंकवादी घटनाएँ होती है, आम जनमानस के अंदर रोष, गुस्सा एवं सरकार से उचित कार्यवाही की आवाज बुलंद होती है।


आम जनता सामान्यतः ऐसे मामलों में तर्कों की जगह भावनाओं एवं कई बार उन्मादों पर चलती है, लेकिन सरकार और उसका तंत्र भावनाओं पर ना चलकर कई तरह की कूटनीति इत्यादि का सहारा लेते हैं, सेना एवं सेनिक कार्यवाही को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में सरकारों से ये अपेक्षा भी की जाती है के वो आम जनता के मध्य उभर रहे किसी भी तरह की नकारात्मक भावनाओं एवं आक्रोश को अपने नेतृत्व कौशल से नियंत्रित करने का प्रयास करें। ऐसी परिस्थिति में अगर प्रधानमंत्री और उसकी सरकार जिम्मेदारी से काम करती है तब उसे मजबूत प्रधानमंत्री और मजबूत सरकार कहा जाना चाहिए, (वो भले ही गठबंधन की सरकार हो) देश की मीडिया को भी जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए ताकि एक ऐसा जनमत बन सके जो लोकतान्त्रिक हो।


हाल के वर्षों में आतंकवाद की कई घटनाएँ हुई हैं, इनमें सैनिक एवं अर्ध सैनिक बलों पर हमले चिंता का विषय हैं, जिनके हाथो में देश की सुरक्षा है, वही सुरक्षित नहीं हैं तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? सन 2014 से सैनिक, अर्धसैनिक बल एवं पुलिस पर कई आतंकवादी हमले हुए हैं, जिनमे प्रमुख 2015 का जम्मू हमला, 2016 में पठानकोट हमला, 2016 पाम्पोर हमला, 2016 यूरी हमला, 2016 बारामुला हमला, 2016 हंदवारा हमला, 2016 नगरोटा हमला, 2018 संजुवाना हमला, 2019 पुलवामा हमला इत्यादि हैं। इन सभी हमलों की निंदा की जानी चाहिए एवं परिस्थिति के हिसाब से उचित कार्यवाही भी की जानी चाहिए। सैनिको पर हुए हर हमले के बाद जनता द्वारा लगभग एक ही तरह की आवाज आई, “बदला”, और उग्र राष्ट्रवाद की वजह से हर हमले के बाद जनता में एक तरह का उन्माद और रोष देखा गया।


मोदी इस रोष और उन्माद को अच्छे से जानते हैं और इस उन्माद को राजनितिक फायदे के लिए भुनाना भी। उदहारणस्वरूप उरी हमले के लगभग 10 दिन बाद भारतीय सेना ने POK (पाक अधिकृत कश्मीर) पर सर्जिकल स्ट्राइक की और दावा किया के 35 से 40 आतंकवादी और 9 पाकिस्तानी जवान मारे गये। इस सर्जिकल स्ट्राइक का बी जे पी सरकार और मोदी ने व्यापक पैमाने पर प्रचार किया, मानो सेना ने पहली बार बॉर्डर पार करके कोई सैनिक कार्यवाही की हो। बड़े व्यापक पैमाने पर सरकार ने आतंकवाद के विरुद्ध अपने इस कार्य का प्रचार प्रसार किया। सोशल मीडिया 56 इंच, मजबूत सरकार, देश सुरक्षित हाथो में, बदला ले लिया और विपक्षी दलों पर हमले से भर गया। उन्मादी जनता ने भी इस कार्य को हाथों हाथ लिया और जिसने भी सर्जिकल स्ट्राइक की सच्चाई जाननी चाही उसे देशद्रोही, पाकिस्तान समर्थक इत्यादि उपमाओं से नवाजा गया। मानों देश को सच जानने का या प्रमाण मांगने का हक ही ना हो या जो सरकार बोल रही है उस पर आँख कान बंद करके बस विश्वास कर लिया जाए। प्रजातंत्र में ऐसा नहीं होता, अगर सेना की किसी भी कार्यवाही को सरकार सार्वजनिक कर रही है तो सवाल पूछने का अधिकार सभी देशवासियों को है। बरहाल इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद मोदी को एक निडर, साहसी, और कर्मठ नेता के रूप में पेश किया गया। जो जनता नहीं देख पाई वो था वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश चुनाव और उत्तर प्रदेश के चुनावों में सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा जिसे मोदी ने और बी जे पी के कई नेताओं से अच्छे से भुनाया। जनता ने भी सरकार के इस कृत्य को हाथों हाथ लिया और सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी एवं विकास के मुद्दों के साथ बी जे पी को उत्तर प्रदेश में बहुमत दिया। ये धारणा बन गई के बी जे पी ही आतंकवाद का खात्मा, जनता का आर्थिक विकास, भ्रष्टाचार का खात्मा और देशद्रोहियों पर लगाम लगा सकती है। कम शब्दों में नया भारत।


सवाल जो जनता तक नहीं पहुंचे वो थे, सन 2016 के यूरी हमले से पहले भी दो बार सैनिकों पर आतंकवादी हमले हुए, एक पठानकोट में और दो बार पाम्पोर में। अगर सैनिक कार्यवाही ही समाधान है तो पहले या दूसरे हमले के तुरंत बाद सर्जिकल स्ट्राइक की जानी चाहिए थी, और अगर सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकवादी डर गये थे तो 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इसी वर्ष सेना या पुलिस बल पर चार और आतंकवादी हमले हुए, बारामुला में, हंदवारा में, शोपिया में और ज़कुरा में, एवं सन 2018 में फिर से सेन्य बलों पर जम्मू कश्मीर के संजुवाना में हुआ आतंकवादी हमला, फिर हर हमले के बाद जवाब क्यों नहीं दिया जाता? हर आतंकवादी हमले के बाद बदले की कार्यवाही होनी चाहिए, हर बार सर्जिकल स्ट्राइक? अंततः सैनिक कार्यवाही फौरी तौर पर आत्म संतुष्टि तो दे सकती है लेकिन आतंकवाद का स्थायी समाधान नहीं है, क्युकी अगर ऐसा होता तो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद आतंकवादी घटनाएँ नहीं घटती।


इसी वर्ष 14 फरवरी को पुलवामा में बी एस एफ (अर्ध-सैनिक बल) पर एक और आत्मघाती आतंकवादी हमला हुआ, जिसमे 40 जवान शहीद हुए। इस बार देश अति उन्माद और रोष से भर गया और एक बार फिर “बदला चाहिए” एक आम मांग बन गई। कई मीडिया हाउस पाकिस्तान को सबक सिखाने की कवायद में लग गये, जैश ए मुहम्मद (जिसने हमले की जिम्मेदारी ली) उसके खिलाफ कार्यवाही और पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग जबर्दस्त तरीके से उठाई जाने लगी। कई मीडिया हाउस वॉर रूम में बदल गये और लगभग रोज एक चर्चा “बदला चाहिए” पर होने लगी। वहीं दूसरी तरफ फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर “हिंदुस्तान मांगे बदला” के मेसेज या स्टेटस से भर गया। इन सभी पोस्ट में पाकिस्तान के खिलाफ, आतंकवादी संगठनों के खिलाफ एक स्थायी समाधान की मांग उठने लगी और मीडिया ने आग में घी डालने का काम किया। नफरत का माहौल चारों तरफ फ़ैल गया और जो लोग शांति की अपील करते दिखे उन्हें देशद्रोही, सेना विरोधी, देश के अंदर के गद्दार, जयचंद, पाकिस्तान परस्त, आतंकवादियों का हमदर्द इत्यादि उपमाएं दी जाने लगीं। देश उग्र राष्ट्रवाद के ज्वार में तप रहा था और “मजबूत सरकार, मजबूत प्रधानमंत्री” से बदले की उम्मीद लगाये बैठा था।





26 फरवरी को सुबह लगभग 3.30 बजे भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के बलालकोट पर हवाई हमला किया। भारत ने ये दावा किया के वायु सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर के जैश ए मुहम्मद के आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया और “काफी” आतंकवादी ठिकानों को खत्म करके वायु सेना के लड़ाकू विमान वापस आ गये। भारतीय वायु सेना की इस कार्यवाही का समर्थन कई विपक्षी दलों ने भी किया और सभी एकजुट होकर सरकार के साथ खड़े दिखे। इस परिस्थिति में सभी राजनीतिक दलों ने सरकार का समर्थन किया और वायु सेना के शौर्य की प्रशंसा की।


हालांकि भारत सरकार ने ये बात कई बार दुहराई के ये हमला पाकिस्तान पर नहीं बल्कि आतंकवादियों पर था लेकिन पकिस्तान में भारत की इस कार्यवाही की तीव्र प्रतिक्रिया हुई, और पाकिस्तानी संसद में प्रधानमन्त्री इमरान खान से सवाल पूछे जाने लगे। इस हमले को पाकिस्तान ने देश की सम्प्रभुता पर हमले से जोड़ा।


अगले दिन भारत में जश्न का माहौल था, कई जगह खुशियाँ मनाई गईं, “बदला पूरा हुआ” के नारे बुलंद किये गये, सोशल मीडिया मोदी को मजबूत प्रधानमंत्री सिद्ध करने में लग गई और देश के कई मीडिया हाउस ने दावा किया कि हमले में 300 से 400 आतंकवादियों को मारा गया। हालांकि ना सरकार ने और ना ही भारतीय वायु सेना ने अधिकारिक रूप से इस तरह का कोई वक्तव्य जारी किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने 3 मार्च को जैन इंटरनेशनल ट्रेड आर्गेनाइजेशन, गुजरात में आयोजित एक समारोह में ये दावा किया के हवाई हमले में 250 से अधिक आतंकवादी मारे गये। कई अतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसीज़ ने मीडिया के इन दावों पर सवाल खड़ा किया। पकिस्तान ने भी भारत के इस तरह के किसी भी दावे को सिरे से ख़ारिज किया। लेकिन भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रक्रम को मोदी विजय और पाकिस्तान के “नये भारत से डर” और “पकिस्तान का झूठ” की तरह पेश किया, जहाँ भारत सरकार बार बार युद्ध की किसी भी स्थिति को नकारती रही और हमले को आतंकवादीयों पर कार्यवाही बताती रही, वहीं दूसरी ओर मीडिया इस हमले को पाकिस्तान पर हमले की तरह प्रचारित करती रही, देश के कई लोग भी इसी बात से खुश थे के पाकिस्तान को सबक सिखा दिया गया, इसी बीच श्री मोदी ने भी इस मुद्दे पर सियासत शुरू की और 26 फरवरी 2019 को चुरू (राजस्थान) में हुई एक रैली में कहा के देश सुरक्षित हाथो में है और इसी तर्ज पर एक विडियो भी आया जिसमे मोदी को एक मजबूत नेता के रूप में दिखाया गया। अंततः श्री मोदी हवाई हमले को चुनावी राजनीति के लिए प्रयोग करते हुए दिखाई दिए, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, महिला सुरक्षा, देश की आर्थिक स्थिति, राफेल विमान विवाद इत्यादि पीछे छूट गये और मोदी ने उग्र राष्ट्रवाद को हवा दी।


सब ठीक चल रहा था, लेकिन पाकिस्तानी वायु सेना ने 27 फरवरी को सीमा रेखा पार कर भारत के पूँछ और राजौरी इलाके में हमला कर दिया, पाकिस्तान ने दावा किया के भारत के दो मिग 21 लड़ाकू विमानों को मार गिराया गया और दो पायलटो को गिरफ्तार किया गया। कुछ समय बाद ये साफ़ हुआ के एक मिग 21 लड़ाकू लड़ाकू विमान को पाकिस्तान ने मार गिराया गया और एक पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को गिरफ्तार किया। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढने लगा और युद्ध जैसे हालात पैदा हो गये।


हालांकि पाकिस्तान ने युद्ध की किसी भी स्थिति से इनकार किया और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने शांति की अपील की, वहीं दूसरी ओर भारत ने भी अपनी कार्यवाही को आतंकवादियों पर की गई कार्यवाही बताया और युद्ध की सम्भावना से इंकार किया। लेकिन भारत में उग्र राष्ट्रवाद चरम पर था और कई लोगों ने बुलंद की के एक बार युद्ध हो और सब कुछ ठीक कर लिया जाए, पाकिस्तान को एक बार सैनिक कार्यवाही के द्वारा सबक सीखा दिया जाए। कुल मिलाकर उग्र राष्ट्रवादी और इसके समर्थक पाकिस्तान पर सैनिक कार्यवाही का समर्थन करते दिखाई दिए और सोशल मीडिया इन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक बड़े हथियार के रूप में प्रयोग किया गया।


मेरे अपने वाट्सएप पर कई ऐसे मेसेज आये जिसमे लिखा था के कुछ और सैनिकों का बलिदान होने दो, लेकिन पाकिस्तान को सबक सिखाओ। इस वक्तव्य में सैनिकों के लिए प्रेम सम्मान से ज्यादा अपनी खुद की "संकीर्ण इच्छा" की पूर्ति ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आई, देश एक बार फिर उन्माद के ज्वार में आगे बढ़ रहा था लेकिन भारत सरकार की तरफ से किसी भी तरह की सैनिक कार्यवाही की बात नहीं की गयी बल्कि सरकार और मीडिया ने देश का सारा ध्यान “मोदी कूटनीति” की तरफ घुमा दिया और “बदला लो” की आवाजें अब विंग कमांडर अभिमन्यु की सुरक्षित रिहाई की मांग करने लगीं। देश का एक सिपाही "दुश्मन देश" के हाथों में था और उसकी रिहाई से बड़ी मांग कुछ और हो भी नहीं सकती थी।


पाकिस्तान की तरफ से शांति संदेश देने के लिए बिना शर्त विंग कमांडर को छोड़े जाने की पेशकश की गई, जिसे भारतीय मीडिया ने पाकिस्तान के “नये भारत से डर” की तरह दिखाया। साथ ही श्री मोदी का विंग कमांडर के लिए कोई अधिकारिक बयान नहीं आया और ना ही पाकिस्तान से कोई बातचीत की। इसी समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा के भारत और पाकिस्तान से कोई खुशखबरी आ सकती है, उनके इस बयान के बाद अगले दिन 1 मार्च 2019 को विंग कमांडर अभिनंदन को पकिस्तान द्वारा रिहा किया गया।

मीडिया ने इसे मोदी की कुटनीतिक विजय के रूप में दिखाया, साथ ही ये भी बताया के मोदी की वजह से पाकिस्तान बेनकाब हुआ और पूरे विश्व में अलग थलग पड़ गया, पाकिस्तान को किसी भी देश का समर्थन नहीं मिला और श्री मोदी भारत में एक मजबूत निर्भीक साहसी नेता के रूप में पेश किये गये।

इसी बीच भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के 46वें अधिवेशन में शिरकत करने गईं, और पकिस्तान को कटघरे में खड़ा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही ना करने का आरोप लगाईं। भारतीय मीडिया ने इसे भारत और मोदी की कूटनीतिक विजय के रूप में दिखाया। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में शिरकत करने से मना कर दिया। और जब इस सम्मेलन का समापन पत्र आया तो उसमे कश्मीर मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया गया और पाकिस्तान द्वारा भारतीय विंग कमांडर को बिना शर्त छोड़े जाने और शांति की पहल करने की तारीफ़ की गई।


इस पूरे प्रकरण से कुछ सवाल खड़े होते हैं। अमेरिका कैसे जानता था के भारत-पाकिस्तान से कोई खुशखबरी आ सकती है? ये मोदी की कूटनीतिक विजय मानी जाए या अमेरिका का हस्तक्षेप? अगर श्री मोदी वाकई में मजबूत शक्तिशाली निर्भीक प्रधानमंत्री हैं और देश सुरक्षित हाथो में है तो उनके पांच वर्ष के कार्यकाल में सैनिकों पर आतंकवादी हमले हुए ही क्यों? आतंकवादियों को क्या पता नहीं था के देश में अब एक निर्भीक, साहसी, शक्तिशाली दल का शासन है? क्या आतंकवादी हमलों का बदला लेने का मतलब देश सुरक्षित हाथों में है? या आतंकवादी हमलों के ना होने को देश सुरक्षित हाथों में माना जाए? 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद क्यों इसी साल तीन और आतंकवादी हमले हुए और तीनों हमले देश के जवानों पर, तो देश सुरक्षित हाथों में कैसे हुआ? इस वर्ष पुलवामा में हुए हमले का जवाब देने के बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्यवाही क्यों की? क्या शक्तिशाली, मजबूत नेता से उसे डर नहीं था? जवाबी कार्यवाही कर ली तो भारतीय लड़ाकू विमान को क्रेश करने के बाद विंग कमांडर को गिरफ्तार कैसे और क्यों किया? जब कर लिया तो “डर” की वजह से तुरंत वहीं क्यों नही छोड़ा, क्यों 24 घंटे तक विंग कमांडर पाकिस्तान के कब्जे रहे? और पाकिस्तान ने विंग कमांडर को छोड़ा भी बिना प्रधानमंत्री मोदी की अपील किये, या किसी भी तरह की बातचीत हुए, तो क्या पाकिस्तान में मोदी को लेकर कोई डर नहीं है, जैसे भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया प्रायोजित कर रहे हैं? फिर देश किस आधार पर मजबूत हाथों में है?

जिस पाकिस्तान को विभिन्न भारतीय सरकारें विश्व पटल पर आतंकवादियों का समर्थक बताते हुए अलग थलग करने का प्रयास करती आईं हैं वो पाकिस्तान इस हवाई हमले और उसके बाद के हुए घटनाक्रम की वजह से हीरो बन गया। लगभग सभी देश पाकिस्तान के शांति के लिए बढाये गये कदम की तारीफ करते देखे गये, विंग कमांडर को बिना शर्त वापस करने को पाकिस्तान अतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष में माहौल बनाने में सफल रहा।


भारत को क्या हासिल हुआ? पुलवामा में आतंकवादी हमला भारत पर हुआ, देश के 40 सैनिकों की जान गई। विंग कमांडर अभिमन्यु पकड़े गये और भारतीय वायु सेना की प्रतिष्ठा को आंच आई। अगर मोदी खौफ नाम की कोई चीज है तो इस पूरे प्रकरण में दिखी क्यों नहीं? देश का मीडिया किस बात का जश्न मना रहा था? जो 40 जवान शहीद हुए वो अब चर्चा का विषय क्यों नहीं हैं?


आखिर में एक सम्भावना, पाकिस्तान उस समय तक सबसे बुरे आर्थिक कमजोरी के हालातों से गुजर रहा था, अमेरिका ने, आई एम एफ (अतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने और कुछ अन्य देशों ने पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने से अभी कुछ समय पहले मना किया था। ये पूरा घटनाक्रम इन सभी देशो को और आई एम एफ को पाकिस्तान पर रुख बदलने के लिए पुनर्विचार करने को कहीं प्रेरित ना करे। क्युकी अगर ऐसा हुआ तो उसको अमेरिका से भी मदद मिलेगी, और आई एम एफ जो कल तक बेलआउट पैकेज पर आँख दिखा रहा था आज $6 बिलियन बेलआउट की आर्थिक मदद देने को राजी हो गया, कहीं पुलवामा हमला, भारत द्वारा एयर स्ट्राइक और उसके बाद की परिस्थितियाँ पाकिस्तान के लिए मददगार तो साबित नहीं हुईं? अगर ऐसा कुछ है तो भारत की चुनावी राजनीति, उग्र राष्ट्रवाद और देश में व्याप्त उन्माद पकिस्तान को सीधा फायदा पहुंचा गया। पाकिस्तान ने भारत के हवाई हमले को भारत में होने चुनाव से सीधे तौर पर जोड़ा पाकिस्तान की मीडिया ने भी हवाई हमले को भारत के चुनाव से जोड़ा और श्री येदुरप्पा के बयान को निशाना बनाया, (जिसमे उन्होंने कहा था के इस जवाबी कार्यवाही के बाद बी जे पी कर्नाटक में 25 में से 22 सीट जीतेगी), श्री मोदी के चुरू में दिए बयान की भी पाकिस्तानी मीडिया में बड़ी चर्चा हुई।


इस पूरे प्रकरण का बी जे पी को कोई चुनावी फायदा होता है या नहीं ये 23 मई को ही पता चल पायेगा, लेकिन अतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस पूरे प्रकरण से भारत के हाथ कुछ नहीं लगा, लेकिन पकिस्तान को कुछ मिला और कुछ मिलने की उम्मीद है।


डॉ अनुराग पाण्डेय

असिस्टेंट प्रोफेसर

दिल्ली विश्व विद्यालय

दिल्ली.

भारत

anuragspandey@yahoo.co.in



Important:

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.

0 views

©2019 by Indian Democracy. All Rights Reserved. 

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site and see our Terms and Condition page.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.