Anurag Pandey भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद की जिन्गोइस्ट अवधारणा "उपनिवेशकाल से अब तक"

Updated: Sep 12

राष्ट्रवाद का अर्थ सामान्यतः राष्ट्र के व्यक्तियों द्वारा राष्ट्र के साथ अपनी खुद की पहचान को जोड़ना होता हैं, राष्ट्र के प्रति लगाव एवं अपने राष्ट्र के हितों को एक राष्ट्रवादी हमेशा सर्वोपरी रखता/रखती हैं। राष्ट्रवाद अधिकतर मामलों में किसी दूसरे राज्य, उस राज्य के निवासियों का बहिष्कार या उनके तीक्ष्ण विरोध पर आधारित होता है। ये कहा जा सकता है के कई मामलों में राष्ट्रवाद किसी अन्य राज्य, उस राज्य के नागरिकों, नागरिक समाज एवं सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से नफ़रत, घृणा और उन्हें कमतर आंकने या उस राज्य को छोटा साबित करने के सिद्धांतों इत्यादि पर आधारित होता है। राष्ट्रवाद का ये स्वरुप विकृत होता है।


वहीं सच्चे अर्थों में राष्ट्रवाद अपने देश से प्रेम, नागरिकों के प्रति आपसी सम्मान, अपने देश की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से लगाव, अन्य राज्यों एवं उसके नागरिकों के प्रति सम्मान इत्यादि भावनाओं पर आधारित होता है।


उपरोक्त लिखित दोनों व्याख्याओं को एक संक्षिप्त उदहारण से समझा जा सकता है, हम अपने जीवन में अपने परिवार एवं पारिवारिक सदस्यों से कभी अलग नहीं होते, एक परिवार में प्यार, सम्मान, आत्मीयता की भावना होती है, हम सभी को अपने परिवार पर गर्व होता है, कुछ गलत हो तो गुस्सा आता है, कभी सफलता ना मिले या कोई ऐसा काम हो जाए (जैसे पड़ोसी से झगड़ा, बच्चे का किसी इम्तिहान में कम नम्बर आना या सफल ना होना इत्यादि), तो हमें ऐसी किसी भी या इससे इतर किसी भी परिस्थिति में शर्म भी आती है। अतः गर्व और शर्म के मिश्रण से ही एक आदर्श परिवार बनता है, जहाँ गर्व आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है वहीं शर्म गलतियों से सीखने की शिक्षा।


एक दूसरी बात भी कही जा सकती है परिवार में माँ-पिता, भाई-बहन का रिश्ता सबसे मजबूत होता है। एक दूसरे के साथ कितना भी वैचारिक मतभेद हो, किसी बाहरी के हस्तक्षेप करने से सभी परिवार के सदस्य एक हो जातें हैं, आपसी मतभेद होना हर परिवार की एक खूबसूरती होती है, लेकिन इन मतभेदों के साथ प्यार और लगाव एक परिवार को अटूट बनाता है।


उदहारणस्वरुप, मैं कभी कभी कहता हूँ के मुझे अपनी मम्मी के हाथ का खाना बहुत पसंद है, या दीदी के हाथ से बनी पराठा भुजिया, खीर, मझली दीदी के हाथ की दाल, छोटी बहनों के हाथ के आलू के पराठे, छोले-राजमा, बीवी के सत्तू के पराठे वगेरह, इसका अर्थ ये बिलकुल नहीं है के मुझे किसी दूसरे पारिवारिक सदस्य के द्वारा बनाया गया कोई खाना पसंद नहीं है, या पापा के हाथ से बना पुआ, दाल-पूरी, भिन्डी की सब्जी पसंद नहीं है, ये बात हम सभी परिवारिक सदस्य अच्छे से जानते हैं, इसलिए परिवार में एक दूसरे से नफरत की भावना विकसित नहीं हो पाती, बल्कि परिवार के सदस्य और ज्यादा एकजुट हो जाते हैं, इस प्रकार विविधता का सम्मान करना सबसे पहले हम सभी अपने परिवार से सीखते हैं।


इसी के साथ अपने इस वक्तव्य में मैं किसी दूसरे व्यक्ति से ये नहीं कह रहा के सिर्फ मेरी मम्मी, मेरी बहनें, मेरी बीवी और मेरे पापा ही अच्छा खाना बनाते हैं, और ना ही मेरे कहने का आशय ये है के तुम्हारी मम्मी, तुम्हारी बहनें, तुम्हारी बीवी और तुम्हारे पापा मेरे घर वालों से अच्छा खाना नहीं बना सकते, ये एक अहिंसक वक्तव्य है, जो किसी अन्य व्यक्ति को पीड़ा नहीं पंहुचा रहा। लेकिन ये अहिंसक वक्तव्य तब हिंसक हो जाता है जब मैं किसी व्यक्ति से कहता हूँ के तुम्हारे पारिवारिक सदस्य कुछ नहीं जानते, जो कुछ है सिर्फ और सिर्फ मेरा ही परिवार है। मेरा ये वक्तव्य किसी की परिवार के प्रति उसकी भावनाओं को आहत करता है, आघात पहुंचाता है।


एक दूसरी बात करते हैं, मैं बलिया का रहने वाला हूँ, उत्तर प्रदेश निवासी, मुझे अपना शहर अपना राज्य बहुत पसंद है, उस शहर और राज्य के मन्दिर, भाषाएँ, लोग, मार्केट, यातायात के साधन, रेलवे, विभिन्न संस्कृतियाँ इत्यादि पसंद हैं और गर्व करता हूँ, लेकिन मेरी इस पसंद में मैं ये बिल्कुल ये नहीं कह रहा के दूसरे शहर या राज्य खराब हैं, या मेरा शहर, राज्य, संस्कृति, भाषा इत्यादि दूसरे किसी भी राज्य से श्रेष्ठ है। मुझे अपने शहर और राज्य से प्यार है लेकिन अगर मेरे शहर या राज्य में कुछ गलत होता है तो मुझे शर्म भी आती है, इसी गर्व और शर्म के मिश्रण से व्यक्ति अपने राज्य, अपने शहर को और बेहतर बना सकते हैं। लेकिन अगर मैं ये कहना शुरू कर दूँ के जो है वो मेरा ही शहर है, जो है वो मेरा ही राज्य है और दूसरे शहरों-राज्यों की संस्कृति, भाषाएं, रहन-सहन, खान पान की आलोचना शुरू कर दूं तो ये वक्तव्य आपसी नफ़रत और घृणा को बढ़ाएगा और आपसी भाई-चारे को खत्म करेगा। सबका सम्मान करना और अपनी हर तरह की (पारिवारिक, राज्यीय, भाषाई, सांस्कृतिक इत्यादि) पहचान से प्यार करना एक अहिंसक और किसी को आघात नहीं पहुंचाने वाला विचार है।


अब इस विचार को अतर्राष्ट्रीय पटल पर ले जाते हैं, हम सभी को भारतीय होने पर गर्व है, हम सभी अपने देश से प्यार करते हैं, देश आगे बढ़ता है तो ख़ुशी होती है, देश के साथ कुछ गलत होता है तो दुःख होता है वगेरह, ये भाव बिल्कुल हानिरहित है, अहिंसक है, लेकिन जिस दिन हम ये कहना शुरू करते हैं, के जो है वो मेरा ही देश है, जितनी अच्छाईयाँ है वो हमारे ही देश में हैं, हमारी भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान इत्यादि बाकी सभी देशों से अच्छा और महान है, तब ये विचार उग्र हो जाता है, एकाकी हो जाता है और दूसरे राज्यों, वहां के निवासियों, उनके रहन-सहन, उनके खान पान, उनकी संस्कृति को सम्मान करने के बजाये एक तरह के नफरत के भाव से उन राज्यों को कमतर आंकना शुरू कर देता है।


किसी व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र-राज्य से नफ़रत के आधार पर जिस राष्ट्रवाद का उदय होता है उसे राष्ट्रवाद नहीं कहा जा सकता, इस तरह के विचार को संकीर्ण राष्ट्रवाद कहा जाता है। इस तरह का राष्ट्रवाद ‘जिन्गोइस्ट विचार’ (उग्र राष्ट्रवाद जो दूसरे देशों के साथ युद्धोन्मादी होता है और कई बार अपने खुद के देश की एक बड़ी जनसँख्या के विरुद्ध होता है) पर आधारित होता है। जिन्गोइस्ट अपने देश को सर्वोच्च, अपनी संस्कृति को महान, भाषा को अन्य भाषाओँ से सर्वश्रेष्ठ इत्यादि मानता है, लेकिन अन्य देश/देशों को, संस्कृतियों को, भाषाओं को निम्न और पिछड़ा हुआ मानता है, यहाँ तक की राष्ट्रवाद की ये जिन्गोइस्ट अवधारणा अपने खुद के देश की एक बड़ी जनसंख्या के विरुद्ध होता है क्योंकि वो जनसँख्या इन जिन्गोइस्ट से धर्म, भाषा, संस्कृति, खान-पान के मामलों में अलग होती है। जिन्गोइस्ट विश्व के लगभग हर देश में मौजूद हैं।


भारत भी जिन्गोइस्ट विचार से प्रभावित लोगों से अछूता नहीं है। जिन्गोइस्ट विचार देश, संस्कृति, भाषा, खान पान, इत्यादि के आधार पर एक राष्ट्रीय गर्व को जन्म देता है, जिसमे ‘मैं, मेरा देश, मेरी संस्कृति, मेरी भाषा ही महान है’ का विचार सर्वोपरी बन जाता है और दूसरे देशों के लिए अपमानजनक वक्तव्यों, नफ़रत इत्यादि को बढ़ावा देता है और उनकी संस्कृति एवं सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को अपने आगे नहीं रखता। जिन्गोइस्ट एक संकीर्ण राष्ट्रवाद है, जिसे भारत में पिछले पांच सालों से सत्ताधारी दल (भारतीय जनता पार्टी, जो संघ परिवार से जुड़ा एक राजनीतिक दल है, संघ परिवार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक सेवक संघ, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, राष्ट्रिय सेविका समिति इत्यादि आते हैं) द्वारा लगातार पाला पोसा जा रहा है, जिसमें कहा जा रहा है के भारत माता की जय बोलो, भारत में यदि रहना है, वन्दे मातरम कहना है, राष्ट्रध्वज कितना लंबा होगा, ये देश सिर्फ एक ही तरह के धर्म और संस्कृति का है, हिंदुत्व की अवधारणा (कृपया इसी साईट पर पिछला लेख जो उग्र राष्ट्रवाद पर है उसे देखें), दूसरे धर्म खासतौर से मुस्लिम्स पर अभद्र टिप्पणी, अल्पसंख्यकों की संस्कृति पर हमला, भीड़ द्वारा किसी नागरिक की हत्या इत्यादि को सामान्य बनाने की चेष्टा की जा रही है और सत्ताधारी दल को कुछ सफलता भी मिली। इसका नतीजा; जिन्गोइस्ट आक्रामक है, गर्व से भरा हुआ है, खोखला है, संकीर्ण है, लेकिन एक विजेता और परम सत्य की तरह से खड़ा है।


यहाँ ये बताना आवश्यक है के भारतीय राज्य की ये जिन्गोइस्ट अवधारणा, जिसे भारतीय राष्ट्रवाद बता कर फैलाया जा रहा है, उसे भारतीय राष्ट्रवाद कहा ही नहीं जा सकता। भारतीय राष्ट्रवाद की ये अवधारणा पूरी तरह से जर्मनी से आयातित है, कम शब्दों में उधार का राष्ट्रवाद। हिटलर के दौर में जो ‘जर्मन राष्ट्रवाद’ फैला था, जो नफरत के सिद्धांत पर आधारित था, जो देश की एक बड़ी जनसंख्या (यहूदी, Jews) के खिलाफ था, जो अन्य देशों से ‘जर्मन रेस’ को श्रेष्ठ मानता था, भारत में उस दौर के जर्मन राष्ट्रवाद की तर्ज पर आज का राष्ट्रवाद फैलाया जा रहा है। वर्तमान सत्ताधारी दल एवं इसके विभिन्न संगठन इसी उधार के आयातित राष्ट्रवाद को भारत पर थोप रहे हैं। नहीं, ये बात मेरे दिमाग की या मेरे मन की उपज नहीं है, आर एस एस या बी जे पी वगेरह जिनके सिद्धांतों पर चलती है उन्होंने खुद अपनी कई पुस्तकों में या लेखों में इस विचार का जिक्र किया है, सावरकर की Hindutva: Who is a Hindu, गोलवलकर की Bunch of Thoughts और We or Our Nationhood Defined इत्यादि में वही विचार लिखे हैं जिन्हें हिटलर का नाजी जर्मनी एक स्वीकृत राष्ट्रवाद की तरह से अपनाता था। गोलवलकर और सावरकर कहते भी हैं के हम भारतियों को जर्मनी से बहुत कुछ सीखना चाहिए, राष्ट्रीयता क्या होती है, राष्ट्रीय धर्म क्या होना चाहिए, राष्ट्रीय संस्कृति किसकी होनी चाहिए और क्यों बाकी सभी अन्य को इस राष्ट्रीय धर्म-संस्कृति एवं राष्ट्रीयता में अपने को समाहित करना चाहिए, वरना उन्हें द्वितीयक नागरिक की तरह रखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर जो राष्ट्रवाद 80 के दशक से लगातार परोसा जा रहा है और पिछले पांच सालों में जिसे गति मिली है, वो राष्ट्रवाद यूरोपियन है, जो यूरोप के एक राज्य जर्मनी के नाज़ी राष्ट्रवाद से प्रभावित है, कम शब्दों में ये राष्ट्रवाद उस भारतीय जमीन को नहीं देख पा रहा, जिस पर वो खड़ा है। बड़ा अजीब लगता है ये सुनना के हाँ कोई आर एस एस या बी जे पी के राष्ट्रवाद से प्रभावित है, उसे असली भारतीय राष्ट्रवाद मान रहा है, और ये राष्ट्रवाद किसी दूसरे देश से आयातित उधार के राष्ट्रवाद पर टिका है।

आजादी से पूर्व भारत में राष्ट्रवाद


जब यूरोपियन उपनिवेशवाद (मुख्यतः ब्रिटिश) भारत आता है तब वो भारतियों से कुछ सवाल पूछते हैं, “आप भारतीय कैसे एक राष्ट्र बन सकते हैं? ना आपके पास एक भाषा है, ना एक धर्म है, ना एक संस्कृति है, ना एक तरह का खान-पान है इत्यादि तो भारत को एक राष्ट्र कैसे माना जाए? हमे (ब्रिटिश) देखिये, हमारे पास एक धर्म है, एक भाषा है, एक संस्कृति है, इसलिए हम एक राष्ट्र हैं, और क्युकी आपके पास एक जैसा कुछ नहीं है, आप राष्ट्र नहीं हो सकते। अब क्युकी आप एक राष्ट्र नहीं है तो राष्ट्रवाद कैसे आएगा और आप आजादी की मांग कैसे कर सकते हैं। (इस सवाल ने 1857 की क्रांति के बाद जोर पकड़ा) ।


भारतियों द्वारा इस सवाल के दो तरह से जवाब दिए गये, पहला वर्ग (नरमपंथी राष्ट्रवादी और कुछ सांस्कृतिक विचारक जो एक धर्म विशेष (हिन्दू) से प्रभावित थे) ने जवाब दिया के हाँ हम एक राष्ट्र हैं, हमारे पास एक प्रमुख भाषा है (हिंदी), एक प्रमुख धर्म है (हिन्दू) और एक प्रमुख संस्कृति है (हिन्दू), हमारे पास भी बाइबिल की तरह वेद हैं, हम भारतीय भी बिलकुल आपकी (ब्रिटिश) की तरह एक है, इसलिए हम भी एक राष्ट्र हैं। ये सबसे पहला रेस्पोंसे था जिसमे भारत ने यूरोपियन शैली की तरह देश में एकरूपता दिखाने का प्रयास किया, ताकि ये सिद्ध किया जा सके के भारत भी एक राष्ट्र है। ब्रिटिश राष्ट्रवाद के सामने जो ये राष्ट्रवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया इसने भारत को ब्रिटिश राष्ट्र की तरह दिखाने का प्रयास किया, ताकि एक राष्ट्रवादी संकल्पना को खड़ा किया जा सके। इस तरह के राष्ट्र का सृजन ब्रिटिशर्स द्वारा खड़े किये गये सवाल पर सिर्फ एक प्रतिक्रिया मात्र थी, ये घबराहट में की गई प्रतिक्रिया थी, ये एक डर से उपजी प्रितिक्रिया थी, जिसमे भारतीय विचारकों ने ब्रिटिश राष्ट्र की तर्ज पर ये सिद्ध करने का प्रयास किया के भारत में भी ब्रिटेन के सामान एकता है, एक प्रमुख धर्म, संस्कृति और भाषा है, भारत ने ब्रिटिश की तरह एकरूपता प्रदर्शित करने का प्रयास किया। ये शुरूआती प्रयास था, जिसमे ये भावना प्रबल थी के हम भारतीय भी ब्रिटिश के समान एक राष्ट्र हैं, कुल मिलाकर ब्रिटिश राष्ट्र जैसा दिखने की चाहत। ये राष्ट्रवाद आज भी आर एस एस, बी जे पी या संघ परिवार के रूप में मौजूद है, जहां आजादी से पहले का शुरूआती राष्ट्रवाद ब्रिटिशर्स के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी, आज का संघ परिवार का राष्ट्रवाद अपने ही देश के अल्पसंख्यकों, दलित-बहुजन के विरुद्ध प्रतिक्रिया दे रहा है, जिसमें हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान का नारा लगता है, मानों देश में कोई और धर्म, भाषा है ही नहीं, ये नारा उपनिवेश काल की ‘भारतीय प्रतिक्रिया’ से प्रभावित है। ध्यान रहे भारत एक बहुसंस्कृति राष्ट्र है और यहाँ एक भाषा, एक संस्कृति या एक धर्म की मान्यताओं को किसी अन्य भाषाई समूह, सांस्कृतिक समूह और धार्मिक समूह पर थोपा नहीं जा सकता।

हालांकि नरमपंथी जो यूरोपियन शैली से बहुत प्रभावित थे और ब्रिटिश शासन को भारत के लिए अच्छा मानते थे, राष्ट्रवाद की इस विचारधारा से अलग थे। नरमपंथियों ने कभी उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया और ना ही उन्होंने कभी भारत की विविधता को चुनौती दी। कुछ समय बाद एक दूसरा वर्ग आया (गरमपंथी राष्ट्रवादी, गांधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह इत्यादि), इस दूसरे वर्ग ने ब्रिटिशर्स से ही सवाल कर दिया, जैसे कहाँ लिखा है के एक राष्ट्र बनने के लिए भारत को आपके राज्य जैसा होना पड़ेगा? जो परिभाषा आपने दी है उस परिभाषा को हम भारतीय सार्वभौमिक सत्य क्यों मानें? हम एक राष्ट्र हैं, और आपके राष्ट्र से बिलकुल अलग हैं, हमे राष्ट्र बनने के लिए आप जैसा बनने की जरूरत नहीं है, हम आपसे बिल्कुल अलग एक अनोखे और अद्वितीय राष्ट्र हैं। हम एक जैसे नहीं हैं, ना ही हम एक जैसा बनना चाहते हैं, आपके देश जैसा हमारे यहाँ एक धर्म की प्रधानता नहीं है, हम एक धर्म की प्रधानता को स्वीकार भी नहीं करना चाहते, हमारे यहाँ कई भाषाएँ हैं, हम आपके जैसे एक भाषा वाले राष्ट्र बनना भी नहीं चाहते और हम एक जैसी संस्कृति वाले राष्ट्र नहीं हैं, हमे एक जैसी संस्कृति वाला राष्ट्र बनना भी नहीं है। हमारा राष्ट्र विविधता के सिद्धांत पर आधारित है और ये विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करता है।


ब्रिटिश शासन और राष्ट्रवाद


औपनिवेशिक काल में शुरुआत के राष्ट्रवादी (नरमपंथी) अंग्रेजो के शासन को वरदान मानते थे, किसी मुद्दे पर अंग्रेजों से प्रार्थना किया करते थे एवं उनका विरोध नहीं करते थे, नरमपंथी ब्रिटिश शासन को भारतियों के लिए सर्वोत्तम मानते थे क्यूंकि उनका ये विश्वास था के ब्रिटिश भारत को अपने जैसा एक सभ्य देश बनाने आये हैं। वो ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे, ये हमें पता है, लेकिन क्यों मानते थे ये कम लोग जानते हैं। इसका जवाब Orientalism में है, Orientalism को हिंदी में प्राच्यवाद कहतें हैं। प्राच्यवाद विश्व को दो गुटों में बांटता है, एक ओरिएंट और दूसरा ओक्सिडेंट। Orientalist या प्राच्यवादी विचारकों ने पूर्वी राज्यों को ओरिएंट कहा, जो पिछड़े हैं, जिनमे तार्किकता का अभाव है, आधुनिकता से कोसो दूर हैं, परम्परावादी हैं, धर्मांध हैं इत्यादि, वहीं दूसरी और इन्हीं विचारकों ने पश्चिमी और यूरोपियन राज्यों को ओक्सिडेंट कहा, जो विकसित हैं, तार्किक हैं, आधुनिक हैं, विवेकशील हैं, धर्मांध नहीं हैं इत्यादि। इन नरमपंथियों पर इसी Orientalist या प्राच्यवादी विचारों का गहरा असर था और इसीलिए ये सभी ब्रिटिश शासन को भारत पर एक वरदान माना करते थे।


प्राच्यवाद और भारत


जब ब्रिटिश भारत आये तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी के इस विभिन्नताओं वाले देश पर शासन कैसे किया जाए? युद्ध या तलवार के दम पर ब्रिटिश बहुत समय तक राज नहीं कर कर सकते थे और ना व्यापार (लूट) । तब कुछ प्राच्यवादी विचारक भारत आये जिन्होंने संस्कृत, उर्दू, फारसी, पाली इत्यादि भाषाओँ का गहन अध्ययन किया और वेद, पुराण, स्मृतियाँ, कुरान इत्यादि धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। प्राच्यवादी विचारकों में विलियम जोन्स, जे एस मिल इत्यादि प्रमुख विचारक थे, जिन्होंने भारत का अध्ययन किया और भारतियों को अपने लेखों के जरिये ये अहसास कराया के वो वाकई में पिछड़े हैं, इनमे जे एस मिल का भारतीय इतिहास का तीन भागों में विभाजन आज भी प्रयोग किया जाता है, मिल ने प्राचीन भारत को हिन्दू भारत कहा और उसे भारत का स्वर्ण युग बोला, मध्यकालीन भारत को मुस्लिम भारत और आधुनिक भारत को ब्रिटिश भारत या संक्रमण कालीन भारत कहा, मजेदार बात ये के आधुनिक भारत को क्रिस्चियन भारत नहीं कहा गया।


भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में विभाजन को भारत में आज भी कई संकीर्ण विचारधारा के लोग सत्य मानते हैं, जिनमे संघ परिवार प्रमुख है, वो प्राचीन भारत को स्वर्ण युग, मध्यकालीन भारत को अन्धकार युग और आधुनिक भारत को चेतना युग मानते हैं, जबकि ये विचार एक विदेशी (जे एस मिल) द्वारा दिया गया ताकि भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा सके और इतनी बड़ी, विविधताओं वाली जनसँख्या पर आसानी से शासन किया जा सके।


इस प्राच्यवादी विचार का भी विरोध हुआ और गरमपंथी राष्ट्रवादी, गाँधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह, अम्बेडकर इत्यादि ने सवाल खड़े किये। लेकिन तब तक प्राच्यवाद पढ़े लिखे भारतियों के मध्य अपनी पैठ बना चुका था जिसे धीरे धीरे गांधी, नेहरु, भगत सिंह इत्यादि स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने तरीके से हटाने की कोशिश की। गांधी का स्वदेशी अभियान, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन इत्यादि ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरुद्ध और आजादी प्राप्त करने के लिए एक संघर्ष तो था ही, कहीं ना कहीं इन आंदोलनों ने प्राच्यवादी विचारधारा पर हमला भी किया और देश के लोगों में देश से प्यार और भाईचारे की भावना को बढ़ाया और इसी आधार पर जनता को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों को लामबंद भी किया।


लेकिन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी प्राच्यावादियों द्वारा सम्पादित इतिहास के वर्गीकरण से हमेशा प्रभावित रहे। और आज भी हिन्दू राष्ट्रवाद इसी वर्गीकरण से प्रभावित हैं। कुल मिलाकर आज का हिन्दू राष्ट्रवाद यूरोपियन विचारों, उनके राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर दिए विचारों से ज्यादा प्रभावित है, जहाँ एक ओर ये नाजी जर्मनी से राष्ट्रवाद सीखने की वकालत करता है वहीं दूसरी ओर ये ब्रिटिश/यूरोपियन प्राच्यवादियों के इतिहास विभाजन को पूरी तरह से आत्मसात करता है। तभी प्राचीन काल की उन्नत वैज्ञानिक तकनीक, पुष्पक विमान, मिसाइल तकनीक, टेस्ट ट्यूब बेबी, ब्रह्मास्त्र को आज का परमाणु बम मानना इत्यादि इनके विचार में शामिल हैं जो वास्तविक रूप में इन ब्रिटिश प्राच्यवादी लेखकों द्वारा सम्पादित और प्रचारित किये गये और जिसको हिन्दू राष्ट्रवादियों ने थोडा बहुत फेर बदल करके आत्मसात कर लिया। (विलियम जोन्स की 1824 में लिखित पुस्तक Discourses delivered before the Asiatic Society: and miscellaneous papers, on the religion, poetry, literature, etc., of the nations of India और जे एस मिल की The History of British India पुस्तके पढ़े) । संस्कृत को महान और सबसे प्राचीन भाषा का तमगा दिलाने वाले भी विलयम जोन्स ही थे। जोन्स और मिल ने ये कार्य ब्रिटिश सरकार की मदद करने के लिए किया और हिन्दू राष्ट्रवादियों ने अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जोन्स और मिल का सहारा लिया जो अनवरत आज तक चला आ रहा है।


लेकिन आजादी से पहले गांधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह इत्यादि के विचार ही फैले और हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्रवाद अपनी जगह नहीं बना पाया। उस दौर के राष्ट्रवाद की खूबसूरती इसी बात में थी के जो भी ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन चलाया गया या आजादी के लिए जो संघर्ष किया गया वो सिद्धांतों पर आधारित था, अफ्रीकन राष्ट्रवाद की तरह भारत ने कभी ये नही कहा के ब्रिटिश की और हमारी स्किन का रंग अलग है, इसलिए ब्रिटिश के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, उनको देश से भगाना चाहिए, बल्कि इंडियन नेशनल कांग्रेस, बोस, भगत सिंह, टेगोर इत्यादि ने ब्रिटिश शासन को सम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी मानते हुए इसका इसका विरोध किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन का इस आधार पर विरोध किया के एक इन्सान किसी दूसरे इन्सान को अपना गुलाम नहीं बना सकता, इस आधार पर आजादी की लड़ाई लड़ी के एक देश किसी दूसरे देश को अपना गुलाम नहीं बना सकता। भारत की आजादी की लड़ाई स्वतंत्रता, समानता, न्याय, विश्व-बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित थी, किसी संकीर्ण विचार पर नहीं। यहीं से भारतीय राष्ट्रवाद की नींव पड़ी, जो ब्रिटिश से नफरत पर आधारित नहीं था बल्कि इनका विरोध ब्रिटिश उपनिवेशवाद और प्राच्यवादी विचारों से था।




आज का जिन्गोइस्ट राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद


अब ऊपर लिखी हुई बातों पर वापस आते हैं, जिनसे कुछ सवाल खड़े होते हैं, क्या हम भारतवासी एक दूसरे से प्यार करते हैं? क्या किसी गरीब, दिन हीन व्यक्ति को देखकर हमारे मन में ये विचार आता है के मेरे देश के नागरिक को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं, क्या जब हम किसी किसान के बारे में कुछ अप्रिय सुनते हैं तो हमारा मन व्यथित होता है? अगर इन सब सवालों का या इनसे मिलते जुलते सवालों का जवाब ना है तो हम राष्ट्रवादी नहीं हैं। आजकल जो राष्ट्रवाद हम भारतीयों को परोसा जा रहा है और जिसकी जड़ यूरोप में है, वो राष्ट्रवाद किसी से नफरत पर आधारित है। कुछ लोग राष्ट्रवादी हैं क्युकी वो पकिस्तान से नफरत करतें हैं, देश के अल्पसंख्यको से नफरत करते हैं, देश में दलित पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण से उन्हें नफरत है, ऐसा राष्ट्रवाद नफरत पर आधारित होता है, प्रेम पर नहीं, और ये भारतीय राष्ट्रवाद बिल्कुल भी नहीं है, हालांकि इसे भारतीय राष्ट्रवाद बोलकर ही परोसा जा रहा है, ये राष्ट्रवाद की जिन्गोइस्ट अवधारणा है।


दूसरी बात में कुछ सवाल; क्या हम किसी से नफरत करते हैं? बिहार vs हरियाणा, पंजाब vs उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र vs उत्तर भारतीय, साउथ vs नार्थ, ईस्ट vs नार्थ, वगेरह हम सभी इस क्षेत्रवाद से घिरे हुए हैं और अपने राज्य, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने खान पान इत्यादि को दूसरे राज्यों से कई गुना बेहतर मानते हैं, एक दूसरे के प्रति नफरत को पालते हैं। वहीं दूसरी ओर हिन्दू-मुस्लिम बाइनरी, साम्प्रदायिक दंगे, जाति आधारित दंगे, महिलाओं पर अत्याचार इत्यादि पर या तो एक तरफा राय रखते हैं या आँखे बंद कर लेते हैं। अब अगर इनका जवाब हाँ है तब हम भारतीय राष्ट्रवादी नहीं हैं, जिन्गोइस्ट हैं।


किसान, कुछ समय पहले तमिलनाडू के किसान दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे, क्युकी उस समय तमिलनाडू में भीषण अकाल जैसी स्थिति थी, वहां बारिश नहीं होने की वजह से किसानो को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना पड़ा, सवाल ये है के हममे से कितने लोग ये बात जानते हैं? और जो लोग जानते हैं उनमें से कितने लोग उन किसानों से मिलने गये के ये मेरे देश के नागरिक हैं और किसी परेशानी से घिरे हुए है, हमें इनकी आवाज के साथ अपनी आवाज मिलानी है ताकि इन किसानों को न्याय मिल सके? अगर नहीं गये या उनकी परेशानी नहीं सुनी, या उनकी परेशानी जानकार हमें कोई फर्क नहीं पड़ा तो हम राष्ट्रवादी नहीं हैं। यही बात देश के अन्य किसानों और उनकी समस्याओं पर भी लागू होती है।


जल विवाद, हम जानते हैं के पंजाब और हरियाणा में जल विवाद कई साल पुराना है, अभी सन 2016 में जब दोनों राज्यों में बी जे पी की सरकार थी, तब ये विवाद और गहराया, पंजाब ने हरियाणा को नदियों का जल देनें से फिर से साफ़ मना किया और विवाद गहरा गया, दोनों ही राज्यों में उस समय बी जे पी का शासन था, केंद्र में बी जे पी थी, लेकिन अपने को राष्ट्रवादी घोषित करने वाले दल के मुखिया ने एक शब्द नहीं बोला, यही नहीं कर्नाटक और तमिलनाडू में भी जल विवाद कई सालों से चला आ रहा है और सन 2016 में ही विवाद और ज्यादा गहराया, लेकिन केंद्र में सत्ताधारी सरकार ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जो दल, जिस दल का नेता अपने को राष्ट्रवादी घोषित करते हों वो इन दोनों मुद्दों पर चुप क्यों रहे? हमारे देश के नेता ने विवादित जगहों पर जाकर बयान क्यों जारी नहीं किया के ये मेरा देश, मेरा राष्ट्र है और मेरे राष्ट्र में ऐसी किसी भी विवाद के लिए कोई जगह नहीं है? तो इन विवादों में भी राष्ट्रवाद की झलक तक नहीं दिखी।


मॉब लिंचिंग एवं अन्य दंगे, देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएँ होती हैं, साम्प्रदायिक या जातिगत दंगे होते हैं, महिलाओं पर अत्याचार होता है, किसान मजबूर हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, और हमारे देश के नेता चुप रहते हैं जो ये दावा करते हैं के वो राष्ट्रवादी हैं, जो ये दावा करते हैं के उनके लिए राष्ट्र पहले आता है, फिर इतने राष्ट्रिय मुद्दों पर चुप्पी क्यों? ये सारी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं के हममें से कई भारतीय आपस में प्यार नहीं नफरत करते हैं, और इसी नफरत की वजह से ऐसी घटनाएँ होती है, फिर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप होता है, लेकिन समस्याओं को खत्म करने के लिए कोई सटीक कदम नहीं उठाया जाता। अगर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले सच्चे राष्ट्रवादी होते तो ऐसी घटनाएँ होती ही नहीं, इस तरह की घटनाओं को जिन्गोइस्ट ही अंजाम देते हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवाद में ऐसी किसी अप्रिय घटना के लिए कोई जगह नहीं है।

फिर ये कैसा राष्ट्रवाद है? और भारत का राष्ट्रवाद आखिर है क्या? जो हमे पिछले पांच सालों से परोसा जा रहा है क्या वही भारत का राष्ट्रवाद है? नहीं, ये भारत का राष्ट्रवाद नहीं है। और जैसा ऊपर कहा गया, ये उधार का राष्ट्रवाद है, जो यूरोप के राष्ट्र और राष्ट्रवादी सिद्धांतों से प्रभावित है और आयातित है।


भारत के राष्ट्रवाद को समझने के लिए शुरुआत राष्ट्रगान से करते हैं, हमारे देश का राष्ट्रगान किसी भी अन्य देश के राष्ट्रगान से ज्यादा वृहत्तर है, समावेशी है। हमारा राष्ट्रगान देश के हर राज्य को अपने में सम्मिलित करता है, ये भारत देश को एक यूनिट नहीं मानता बल्कि ये राष्ट्रगान वास्तविक रूप में देश की विविधता का सम्मान करता है। बाकी देशो के राष्ट्रगान सिर्फ देश की बात करते हैं, देश के विभिन्न राज्यों की नहीं, ये राष्ट्रगान उम्मीद करते हैं के सभी राज्य के निवासी एक राष्ट्र में आकर मिल जाएँ, ये देश अपने विभिन्न राज्यों का नाम लेने से घबराते हैं के कहीं से अलगाव की भावना ना उठने लगे, इसलिए देश या राष्ट्र के लिए समर्पण भाव इनके राष्ट्रगान में प्रदर्शित होता है, लेकिन भारतीय राष्ट्रगान सभी राज्यों को उनकी विविधता के साथ भारतीय राज्य में समाहित करता है, सभी राज्यों उनकी संस्कृति, भाषा इत्यादि को पूरा सम्मान देता है और इसी वजह से हमारा राष्ट्रगान ज्यादा समावेशी है।


दूसरे, भारतीय राष्ट्रवाद एकता के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद इस एकता को धर्म, जाति, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रीय पहचान इत्यादि के आधार पर स्वीकार नहीं करता, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद मूल्यों के आधार पर इस एकता को स्वीकार करता है, ये विविधता का सम्मान करता है और सभी तरह की संस्कृतियों को, धर्म को, भाषाओँ को, क्षेत्रीय पहचान को अपने में समाहित करता है। भारतीय राष्ट्रवाद किसी एक ख़ास संस्कृति को, किसी एक ख़ास भाषा को, किसी एक ख़ास धर्म को या किसी क्षेत्र विशेष को बाकी सब पर थोपता नहीं हैं। लेकिन अगर कोई व्यक्ति या समूह या कोई संगठन किसी ख़ास पहचान को बाकी सभी पर थोपने का प्रयास करते है, या बाकी संस्कृतियों को भाषाओँ इत्यादि को अपने से कमतर समझते हैं तब ये भारत का राष्ट्रवाद नहीं है, ये व्यक्ति, समूह या संगठन उधार के यूरोपियन राष्ट्रवाद (Borrowed Nationalism) से प्रभावित हैं। कम शब्दों में जिन्गोइस्ट।


तीसरा, भारतीय राष्ट्रवाद शुरू से कुछ सिद्धांतों पर आधारित रहा है, जो एकता एवं समरूपता के सिद्धांत पर आधारित था, भारतीय औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश के खिलाफ इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे थे क्युकी उनका रंग हमारे रंग से अलग है, बल्कि आजादी की लड़ाई इस आधार पे लड़ी जा रही थी क्युकी ब्रिटिश शासन अत्याचारी था, क्युकी औपनिवेशवाद अन्यायी था, और किसी देश को गुलाम बनाना समानता, स्वतंत्रता, न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था। आज का भारतीय राष्ट्रवाद भी सिद्धांतों पर ही आधारित है, ये हमें देश और देशवासियों से प्यार करना सिखाता है, भले ही देशवासी किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, या संस्कृति का हो। भारतीय राष्ट्रवाद में किसी के प्रति नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति, समूह या संगठन किसी अन्य से नफरत के भाव रखता है तो यहाँ भी वो सभी भारतीय राष्ट्रवाद के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध जा रहे हैं। 80 के दशक से भारतवासियों को यही विचार राष्ट्रवाद के नाम पर संघ परिवार द्वारा परोसा जा रहा है,जिसकी गति पिछले पांच सालों में बढ़ गई है। और ये कतई भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है, ये उधार का यूरोपियन राष्ट्रवाद है जो सिर्फ जिन्गोइस्ट भावनाओं को भड़काता है।


चौथा, भारतीय राष्ट्रवाद के उपरोक्त गुणों की वजह से ही हम भारतीय सभी देशों का, उनकी संस्कृति का सम्मान करते हैं। यही राष्ट्रवाद हमें विभिन्न देशों से जोड़ता है, उनसे अलग नही करता। आजादी के संघर्ष के समय भी इसी राष्ट्रवाद ने हमे दूसरे विदेशी देशों से जोड़ा, चाहे वो अफ्रीका हो या लैटिन अमेरिका हो या जापान हो, रूस हो वगेरह।


पांचवा, भारत का राष्ट्रवाद आतंरिक रूप से एकजुटता पर बल देता है, भारतीय राष्ट्रवाद किसी व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म, भाषा इत्यादि के आधार पर अलग नहीं करता, बल्कि सभी का सम्मान करता है और समाहित करता है।


भारतीय राष्ट्रवाद सभी भारतियों को उनके धर्म, भाषाई, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक इत्यादि पहचानों के आधार पर उन्हें बांटता नहीं है, बल्कि जोड़ता है। अब पिछले पांच सालो से जो राष्ट्रवाद के नाम पर हम भारतियों को परोसा जा रहा है, उसकी तुलना यहाँ की जाए, क्या आप मानेंगे के जो राष्ट्रवाद हमे दिखाया जा रहा है वही असली भारतीय राष्ट्रवाद है? नहीं, इसे संकीर्ण या उधार का यूरोपियन राष्ट्रवाद कहना ज्यादा उचित होगा, जो अपने देश की जमीन से कोसो दूर है, जो खड़ा तो भारत में है लेकिन बड़ी आशा से यूरोप के राष्ट्र के सिद्धांत को देख रहा है, वो सिद्धांत जो आज खुद यूरोप मेें प्रासंगिक नहीं रहा। यूरोप में आज अगर कोई कहे के वो राष्ट्रवादी है, तो सुनने वाले उस व्यक्ति को शक की नज़र से देखेंगे, ये सोचते हुए के ये शक्स किसी समुदाय, संस्कृति, भाषा या रंग के खिलाफ है और कभी भी आक्रामक हो सकता है और शायद किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस भी बुला लें। आज कोई भी यूरोपियन अपने को राष्ट्रवादी नहीं कहता/कहती क्यूंकि यूरोप के राष्ट्रवाद ने एक दूसरे से नफरत का पाठ ही पढ़ाया, इसीलिए सभी यूरोपियन देश राष्ट्रवाद के सिद्धांत को पीछे छोडकर एक साथ मिल गये और यूरोपियन यूनियन बनाई ताकि सभी यूरोपियन राज्य एकजुट होकर रह सके।


वहीं दूसरी ओर यूरोप से बिलकुल अलग भारतीय राष्ट्रवाद विविधता में एकता की बात करता है, ये किसी धर्म, जाति, सम्प्रदाय या संस्कृति के विरुद्ध नहीं है। लेकिन जिन्गोइस्ट आज भी यूरोप के बीते हुए इतिहस में राष्ट्रवाद को खोजते हैं, भारतीय राष्ट्रवाद नकारात्मक नहीं है लेकिन जिस राष्ट्रवाद को भारतवासियों को परोसा जा रहा है वो नकारात्मक है, हिंसक है, द्वेष से भरा है और आपसी भाई चारा खत्म करना चाहता है।


अगर इस देश में साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, और कोई दल या संगठन इसका चुनावी फायदा लेना चाहता है तो क्या आप इसे राष्ट्रवाद कहेंगे? अगर आपका जवाब हाँ है तो आप जिन्गोइस्ट है, और आपको श्रीलंका को देखना होगा, श्रीलंका, एक ऐसा देश जो मानव विकास दर में दक्षिण एशिया में एक समय सर्वश्रेष्ठ था, जो एक सशक्त देश था, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था, ये देश आज कहाँ है? इस देश में 50 के दशक में एक आन्दोलन शुरू हुआ, जिसका नारा था, श्री लंका में रहना है तो सिंहला सिंहला कहना है वगेरह, और नतीजा, सिंहला-तमिल जनसँख्या के मध्य संघर्ष। इस संघर्ष ने श्री लंका को अंदर तक तोड़ दिया। हमारे देश में भी कुछ ऐसे ही विचार हमारे दैनिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, जैसे भारत में यदि रहना है वन्दे मातरम कहना है, जय श्री राम सबको बोलना है, हिंदुस्तान जिंदाबाद नहीं, भारत माता की जय बोलो वगेरह। दो देशों (नाजी जर्मनी और श्रीलंका) का हाल इतिहास में छिपा है, अब हमें तय करना है के देश को किस दिशा में ले जाना है।


पाकिस्तान या बांग्लादेश को आँख दिखाना राष्ट्रवाद नहीं हो सकता, उन पर आतंकवादी घटना की वजह से की गई सैनिक कार्यवाही भी राष्ट्रवाद की श्रेणी में नही आती, इसे विदेश संबंध के परिप्रेक्ष्य में रखा जा सकता है, लेकिन अगर किसी दल का नेता सैनिकों की शहादत के नाम पर वोट मांगता है तो क्या आप इसे राष्ट्रवाद कहेंगे? अगर आपका जवाब हाँ है, तो यही दल, यही नेता अमेरिका को आँख क्यों नहीं दिखा पाते? अमेरिका से हुए विभिन्न व्यापार समझोतों में भारत अपनी आवाज क्यों नही बुलंद कर पाता है, क्यों अमेरिका की सही गलत हर बात मान लेता है? इस राष्ट्रवाद को उस समय क्या हो जाता है जब अमेरिका सामने होता है? अभी कुछ ही दिन पहले भारत ने इरान पर अमेरिकी शर्तों को मान लिया है, राष्ट्रवाद ये सिखाता है के देश किसी के आगे नहीं झुकेगा और देशहित में जो सही होगा वो किया जायेगा, फिर ईरान के मामले में ये देशहित/राष्ट्रहित कहाँ गया? या नेरोबी में हुए आर्थिक सम्मेलन में क्यों भारत अमेरिका की सभी शर्तें मानने पर विवश हुआ? क्यों भारत ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आवाज नही उठाई?


अंत में; मुझे भारतीय होने पर गर्व है, क्युकी भारत एक ऐसा देश है जिसने दुनिया को ये दिखाया के एक गरीब देश में सच्चा राष्ट्रवाद आ सकता है, जो किसी से नफरत नहीं करता बल्कि सबका सम्मान करता है, जो ये दिखा सकता है के एक गरीब देश भी सबसे बड़ा प्रजातंत्र बन सकता है, एक समय प्रजातंत्र के बारे में ये माना जाता था के ये सिर्फ विकसित देशो में ही फल फूल सकता है, भारत ने आजादी के बाद से अब तक प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाया और उसको मजबूती दी। ये देश के इसी राष्ट्रवाद का परिणाम है जिसकी यहाँ चर्चा की गई, जो विविधताओं का सम्मान करता है। उस दौर में कई विचारक ये मानते थे के गहरी विविधताओं वाला देश कभी मजबूत नहीं हो सकता और विभिन्न टुकड़ों में बंट जाता है, भारत को आजादी मिलने के बाद भी कुछ विचारकों ने ये माना था के भारत बहुत समय तक एक आजाद एवं संगठित राज्य के रूप में नही रह पायेगा और कई टुकड़ों में बंट जायेगा, क्युकी ये विविधताओं से भरा हुआ है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है। ये भी इसी राष्ट्रवाद का परिणाम है, जो सभी को समाहित करता है, खुद भारतीय प्रजातंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा सभी मतों, धर्मों, संस्कृतियों इत्यादि को अपने में समाहित करते हैं। ये भारत की खूबसूरती है, भारत कई भागों में टूटने से इसलिए नहीं बचा क्युकी भारतीय राष्ट्रवाद ने देश पर भारतीयता की पहचान थोपी या किसी धर्म विशेष की पहचान सभी पर थोपी या किसी एक क्षेत्र विशेष की संस्कृति, भाषा सभी भारतियों पर थोपी, भारत बचा रहा क्युकी भारतीय राष्ट्रवाद ने सभी संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओँ, क्षेत्र, इत्यादि को पूरा सम्मान दिया, अपने में सबको समाहित किया। एक व्यक्ति भारत में तमिल या बंगाली या गुजरती या मराठी होने के साथ साथ भारतीय भी है, इन सभी की विभिन्नताओं का सम्मान भारतीय राष्ट्रवाद ने किया। मुझे गर्व है भारतीय होने पर, लेकिन साथ ही साथ जब देश में कुछ गलत होता है तो मुझे शर्म भी आती है। किसी भी व्यक्ति को अगर अपने देश पर गर्व है तो उसे कुछ गलत होने पर शर्म भी आनी चाहिए, अगर शर्म नहीं आती तो हम राष्ट्रवादी होने का ढोंग कर रहे हैं, और देश को आगे बढने से रोक रहे हैं। भारत ने विश्व को विभिन्नताओं (धर्म, संस्कृति, भाषा इत्यादि) का सम्मान करना सिखाया है, विभिन्नताओं को राष्ट्र में समाहित करना सिखाया है, विभिन्नताओं को किस तरह देश की धारा में जोड़ते हैं, ये सिखाया है। ये बात अक्षरशः सही है के आने वाले समय में भारत विश्व गुरु बनेगा, लेकिन उस आधार पर नहीं जिस आधार पर आर एस एस या संघ परिवार का जिन्गोइस्ट राष्ट्रवाद कहता है, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद विश्व को ये सिखाएगा के विभिन्नताओं का, अलग पहचान का, सभी संस्कृतियों का सम्मान कैसे किया जाता है और इन सभी को एक राष्ट्र में एक साथ पिरोकर कैसे रखा जाता है। पिछले कुछ वर्षो में भारत के इस राष्ट्रवाद पर जो जिन्गोइस्ट द्वारा हमले किये गये हैं, उससे भारतीय राष्ट्रवाद विचलित नहीं होगा।


परेशानी यही है, कुछ दल या तो यूरोपियन अनुभव देखकर राष्ट्रवाद से डरे हुए हैं, और इसे हिंसक, नकारात्मक मानते हैं या कुछ दल संघ परिवार की ही तरह एक समानांतर राष्ट्रवाद को खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, ये दोनों ही गलत हैं, और ये दोनों ही संघ परिवार को सीधा फायदा पहुंचा रहे हैैं, आज के समय में भारत के असली राष्ट्रवाद को जनता तक पहुचाने की जरूरत है और यही संघ परिवार के एकाकी उधार के जिन्गोइस्ट राष्ट्रवाद का प्रभावकारी जवाब होगा। संकीर्णता या संकीर्ण विचारों की उम्र बहुत छोटी होती है और और संकीर्ण विचार हमेशा विजयी मुद्रा में खड़ा नहीं रह सकता।



Dr Anurag Pandey

Assistant Professor

University of Delhi

India

Nationalism vs Jingoism




Important:

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site.


The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.

193 views

©2019 by Indian Democracy. All Rights Reserved. 

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site and see our Terms and Condition page.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.