Anurag Pandey "अगर हिंदी में ठीक से पढ़े होते तो इंग्लिश में लिखा भी समझ जाते"

Updated: Feb 17

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(एक कटु व्यंग, किन्तु सत्य )


काफी रिसर्च करके, हिंदी इंग्लिश में पढ़ के, देश के कई राज्यों में फील्ड सर्वे करके, जो कुछ गंभीर शोधार्थी/छात्र थोडा बहुत ज्ञान हासिल करने की कोशिश करते हैं, वो समझना सबके बस की बात नहीं, ये सिर्फ वही समझ सकता/ती है जिसने इतनी मेहनत करके कुछ ज्ञान अर्जित कर लिया है या ज्ञान अर्जन करने की प्रक्रिया में है। इसे ज्ञान लेने की पारम्परिक प्रकिया कहा जाता है, जहाँ किसी शोधार्थी/छात्र को वर्षों लग जाते हैं किसी एक विषय पर कुछ सटीक बोलने या लिखने के लिए। इस पारम्परिक शिक्षा में भी दो तरह के लोग आते हैं, “प्रथम वर्ग”, डिग्री जमा कर लो, फलां नौकरी के लिए जरूरी है, उद्देश साफ़ और सीधा क्युकी डिग्री लेना मजबूरी है इसलिए छात्र बनते हैं, ताकि पैसा कमा सकें, अच्छी शादी हो जाए फिर परिवार फिर कुछ और। इनका उद्देश्य शिक्षित होना नहीं होता, डिग्री लेना होता है। इस लेख में मैं इन्हें “प्रथम वर्ग” "डिग्री धारक" व्यक्ति या छात्र के नाम से सम्बोधित करूंगा।


वहीं दूसरी ओर कुछ छात्र शिक्षित होने के लिए शिक्षा लेते हैं, ताकि ज्ञान ले सकें, ये जिज्ञासु प्रवर्ति के होते हैं, शिक्षा लेने का इनका उद्देश्य कुछ और होता है। कम शब्दों में दोनों में वही अंतर होता है जो Three Idiots में चतुर रामलिंगम और फुनसुख वांगणु में था। ऐसे छात्रों को मै इस लेख में “दूसरी श्रेणी” के नाम से सम्बोधित करूंगा।


अब कहने की जरूरत नहीं इसी पारम्परिक शिक्षा प्राप्त प्रथम वर्ग वाले अपने सीमित दायरों की वजह से उतना ही तर्क प्रयोग करते हैं जितना इनके बस में होता है, जबकि दूसरी श्रेणी वाले तर्कपूर्ण सोच रखते हैं और तार्किक सवाल पूछते हैं। शिक्षा व्यवस्था में प्रथम वर्ग के व्यक्ति/छात्र किसी भी सरकार के लिए वरदान होते हैं, जबकि दूसरी श्रेणी के व्यक्ति/छात्र खतरा। तार्किक नागरिक से सभी सरकारों को डर लगता है, कारण बताने की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि प्रथम वर्ग के छात्र समझ ही नहीं पाएंगे और दूसरी श्रेणी के छात्रों के लिए यही एक लाइन काफी है। अंतिम श्रेणी में कम पढ़े लिखे या अनपढ़ व्यक्ति आते हैं। इनके तर्क परिस्थितिजन्य होते हैं और वास्तविक रूप से देखा जाए तो कई मामलों में ये प्रथम वर्ग से ज्यादा तार्किक साबित होते हैं। क्यों?


दरअसल प्रथम वर्ग वाले दूसरी श्रेणी में आ नहीं पाते हैं, लेकिन लालसा या विश्वास होता है के “बस हम ही हैं” लेकिन कहीं ना कहीं तार्किक सोच ना रख पाने की कुंठा भी होती है, और दूसरी श्रेणी का बनने की चाहत, और अंतिम श्रेणी में ये खुद को रखना नहीं चाहेंगे, डिग्री धारक हैं आखिर। बस इसी पशोपेश में पहचान की राजनीति हावी होना शुरू होती है। अब तार्किक सोच वाले दूसरी श्रेणी के छात्र या व्यक्ति इस पहचान की राजनीति को जानते हैं समझते हैं, दिक्कत पहले वर्ग की है और ये उनकी समझ से बाहर की बात है। मैं यहाँ लिख तो दूं लेकिन दूसरी श्रेणी के छात्र या व्यक्ति को इस व्याख्या की जरूरत नहीं, और प्रथम वर्ग के छात्र या व्यक्ति व्याख्या करने के बाद भी समझ नहीं पाएंगे क्योंकि वो उतना ही समझ सकते हैं जितना उनकी शक्ति है और दायरा है, उससे बहार ये निकल ही नहीं सकते, फिर व्याख्या किसके लिए करी जाए? चलिए प्रथम श्रेणी वाले गूगल पर पहचान की राजनीति खोज लेंगे या इंग्लिश में Identity Politics या Politics of Identity, लेकिन मानेंगे उसी बात को जो इसी पहचान की राजनीति ने उनके अर्ध विकसित डिग्री धारक दिमाग में भरा है, खुद की सोच नहीं होती इनकी, इनको सोचवाया जाता है, लेकिन इन्हें लगता है के सारी सोच इनकी अपनी है और तार्किक है।











नये भारत की बात करते हैं, इतिहास की बात करी तो प्रथम वर्ग के ये छात्र या व्यक्ति कंफ्यूज हो सकते हैं। इस नये भारत में ज्ञान का स्रोत पारम्परिक ज्ञान लेने के तरीके से काफी अलग और विकसित है। विकसित इसलिए क्योंकि इस नये भारत में ज्ञान व्यक्ति के हाथ में ही मौजूद है। और ये ज्ञान पिछले 5 या 6 सालों से घर घर से निकल रहा है, डिजिटल इंडिया के दौर में हैं हम सभी, आखिर ज्ञानी बनने के लिए मेहनत क्यों करें, डिग्री तो है ना और तर्क डिजिटल इंडिया रोज सुबह सुप्रभात करते हुए दे रहा है। सरकार ने इतनी यूनिवर्सिटी खोल दी हैं जितनी 70 सालों में नहीं खुली और खुल भी नहीं पाती, ये महान काम सिर्फ और सिर्फ सदी का महान दल और उसका नेता ही कर सकता है। इन यूनिवर्सिटीज़ में पढने या ज्ञान लेने के लिए आपके पास वैसे तो किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अगर आप डिग्री धारक हैं तो सोने पे सुहागा, बचा खुचा काम पहचान की राजनीति कर देती है। बस आपके हाथ में एक स्मार्ट फोन होना चाहिए और वाट्सएप-फेसबुक इंस्टाल्ड होना चाहिए और चलाना भी आना चाहिए। मिल गया आपको एडमिशन वाट्सएप-फेसबुक यूनिवर्सिटी में, और कुछ ही घंटों में आप महान ज्ञानी बन गये। पहचान की राजनीति का डिजिटलाईजेशन भी हो गया।


सुबह सुबह जो गुड मॉर्निंग मैसेज आते हैं, वो मैसेज कहाँ से आते हैं? उन मैसेजेस का सोर्स क्या है? सच्चाई कितनी है? ये जानने की जरूरत ही नहीं इन्हें, दो वजहें हैं, क्योंकि गुड मॉर्निंग मैसेज दो तरीके से आते हैं, पहले में महान नेता ने मुस्लिम की कोई पोल खोल दी या सबक सिखा दिया (अजब बात ये के ये सब ज़ी न्यूज़, रिपब्लिक इंडिया, न्यूज़18इंडिया, इंडिया टी वी (गोदी मीडिया) वगेरह को क्यों नहीं दिखता? जबकि ऐसी “खबरें” तो सदी की सबसे बड़ी “न्यूज़” होनी चाहिए, ब्रेकिंग से लेकर प्राइम टाइम तक ऐसी न्यूज़ इस गोदी मीडिया से बची रहती है, लेकिन वाट्सएप और फेसबुक पर वायरल होती हैं, Alt News करता रहे सच्चाई का पता, डिग्री धारक तो उसी को सच मानेंगे जो वाट्सएप-फेसबुक यूनिवर्सिटी से प्राप्त होता है), दूसरे में महान सरकार की उपलब्धियां आती हैं, हालाँकि जमीनी सच्चाई से कोसो दूर होती हैं ये उपलब्धियां। खुद सरकार मानती है बस डिग्री धारक वाट्सएप फेसबुक पे ज्यादा भरोसा करते हैं। पहचान की राजनीति भी कुछ होती है के नहीं।

अब इसका असर देखिये, ट्रिपल तलाक लागू होने से पहले और लागू होने के बाद, सारी मुस्लिम औरतें इन डिग्री धारकों की बहनें थीं, इनकी चिंता, इनके भविष्य की चिंता इन डिग्री धारकों को जीने नहीं दे रही थी, चैन नहीं लेने दे रही थी, लेकिन अब शाहीन बाग़ और दूसरे राज्यों में CAA, NRC या NPA (इनकी फुल फॉर्म तो पता होगी ही ना?) में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं का महिमामंडन करने में एक कदम पीछे नहीं हैं, वजह सुबह सुबह जो गुड मॉर्निंग मैसेजेस आते हैं, खुद कहीं नहीं गये होंगे, लेकिन शाहीन बाग़ में बिरयानी कौन दे रहा है, कहाँ से दे रहा है, कैसे दे रहा है, फण्ड कहाँ से आ रहा है, सब जानकारी है, ऐसी जानकारी जो सरकार खुद नहीं जानती, इन्हें पता चल गई है, ये शब्द अगर डिग्री धारकों ने पढ़ लिए तो PFI, AAP, Congress का कोई सुबूत पढने के लिए तैयार रहिये, दरअसल ये सभी एकजुटता भूल गये हैं, ये भूल गये हैं के कैसे मुहल्ले के सभी लोग पैसे इकट्टा करके कोई धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन करवाते थे, या हैं, कम शब्दों में मानवता। समय और परिस्थिति के हिसाब से ये डिग्री धारक अपना नजरिया बदलते रहते हैं, इसलिए नहीं के ये तार्किक रूप से सोच सकते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि इनकी राजनीतिक पहचान को कभी ये सूट करता है, कभी नहीं। क्योंकि ये फेक्ट, लॉजिक और झूठ में अंतर नहीं कर पाते।


दूसरी वजह इनकी पहचान को थोड़ी राहत मिलती है और इनके तीव्र एवं तीक्ष्ण बुद्धि को सूट करता है, और इन मेसेजेज से इन्हें लगता है देश में सब चंगा सी। जिससे इन्हें शांति और चिंता दोनों एक साथ मिलती है। शांति मन और दिमाग को, चिंता देश और हिन्दुओं की। अब हिन्दू कहाँ से आ गये, यही सवाल आ रहा होगा ना “डिग्री धारक” दिमाग में? कई मैसेजेस हैं जो सन 2016 से लगातार सर्कुलेशन में हैं, चाहें वो किसी मदरसे की बात हो, चाहें मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जहर उगला जा रहा हो, चाहें राजपूत (हिन्दू गायब रहता है, जाति यहाँ प्रधान हो जाती है) राजाओं या मराठा या सिक्ख राजाओं और मुस्लिम राजाओं के मध्य सत्ता के लिए संघर्ष हो, चाहें सरकार के महान काम हों जो 70 सालों में ना किये जा सके वगैरह। इन मैसेजेस को ऐसे भेजते हैं जैसे खुद फील्ड सर्वे करके, जानकारी इकट्ठा करके और कई महीनों की रिसर्च के बाद कुछ भेज रहे हैं, डिग्री धारक दिमाग शांत हो जाता है, लगता है आज कुछ किया महान काम।










हाँ दूसरी श्रेणी के व्यक्ति इन दोनों को सिर्फ एक एप या सोशल नेटवर्किंग साईट ही मानते हैं, जहाँ सूचनाओं का आदान प्रदान अच्छे तरीके से किया जा सकता है या सरकार की नीतियों की आलोचना करी जा सकती है या किसी से एक सार्थक बहस करके प्रजातंत्र को मजबूती दी जा सकती है या सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं, या पुराने दोस्तों को खोजा जा सकता है, या किसी दूर रहने वाले प्रिय या दोस्त का हालचाल लिया सकता है। किसी भी सरकार को ऐसे नागरिकों से सबसे ज्यादा डर लगता है। अब मैं इस बात की भी व्याख्या नही करूंगा, क्योंकि जो दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र हैं, उन्हें व्याख्या की जरूरत नहीं, वो समझ गये होंगे और प्रथम वर्ग (अरे डिग्री धारक) के व्यक्ति या छात्र पढ़ तो लेंगे लेकिन समझेंगे वही जो पहचान की राजनीति ने भरा है।


अब अगर आप प्रथम वर्ग के छात्र या व्यक्ति से कुछ डिबेट कर रहे हैं तो सावधान हो जाइये हो सकता है आप वाट्सएप-फेसबुक, फेक न्यूज़, फ़ॉर्वर्डेड फेक मेसेज पर आँख बंद करके यकीन करने वाले किसी टॉपर से बात कर रहे हों। ऐसे व्यक्ति या छात्र अति योग्य होते हैं। जहाँ दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र वर्षों की मेहनत के बाद किसी एक विषय पर कुछ जान पाते हैं और फिर भी उन्हें लगता है के अभी बहुत कुछ जानना बाकी है, वहीं दूसरी ओर वाट्सएप-फेसबुक यूनिवर्सिटी, फेक मेसेज पर आँख बंद करके यकीन करने वाले छात्र या व्यक्ति कई विषयों में पारंगत होते हैं, इन्हें भारतीय राजनीति के हर मुद्दे की “तार्किक”(थेथरई) समझ होती है, ये विदेश नीति के विशेषज्ञ होते हैं, इन्हें हर धर्म के बारे में गूढ़ ज्ञान होता है, ये चाहें तो ट्रम्प, पुतिन, मोदी “जी”, नेहरु, गाँधी, बोस, भगत सिंह, अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, चाणक्य, प्लेटो, अरस्तु, कार्ल मार्क्स, विवेकानंद इत्यादि पर कुछ ही घंटों या मिनटों में एक बायोग्राफी लिख सकते हैं। वर्तमान सरकार अगर वाकई में भारत को विश्व गुरु बनाना चाहती है तो ऐसे सभी डिग्री धारक व्यक्तियों या छात्रों को विश्व के हर राज्य में बसा देना चाहिए, और वहां की नागरिकता दिलवानी चाहिए, बस शुरुआत पाकिस्तान भेजने से करे। ये मुल्क एक सर दर्द है, रोज कुछ ना कुछ करता है, और इस मक्कार देश को यही प्रथम वर्ग के डिग्री धारक व्यक्ति या छात्र कुछ ज्ञान दे सकते हैं। मोदी जी अकेले कितना करें? इन डिग्री धारक छात्रों या व्यक्तियों का देश के लिए कोई कर्तव्य है के नहीं?


ना ना दूसरी श्रेणी के छात्र या व्यक्तियों पर ऊँगली मत उठाइए, (अरे जो सरकार के विरोध में लगे रहते हैं) उन्हें इतना गहन और गूढ़ ज्ञान नहीं होता, उनका तो बस एक ही इलाज है, लाठी चार्ज या आजकल सीधे पिस्तौल लेकर जाइये गोली मारिये या इन सब शैक्षणिक संस्थाओं को बंद करवा दीजिये, क्योंकि कोई फीस वृद्धि का विरोध कर रहा है, क्योंकि किसी यूनिवर्सिटी में पुलिस जबरन घुस के बिना वजह तोड़ फोड़ से लेकर छात्रों पर हमला तक करती है। और जावेद अख्तर को जवाब देती है के पुलिस बिना आज्ञा लिए कहीं भी घुस सकती है, लेकिन यही जबरन घुसने वाली पुलिस JNU में नहीं जाती, वहां प्रशासन की आज्ञा का इंतजार करती है, वहाँ जावेद अख्तर को दिए कानून के ज्ञान को भी भूल जाती है और गुंडों को सेफ पैसेज भी देती है, सुना है शरजील इमाम को बड़ी जल्दी पकड़ लिया, लेकिन JNU के हमलावरों का प्रूफ मिलने के बाद भी खोज नहीं पाई है। अब डिग्री धारक पुलिस को महान बतायेंगे लेकिन समस्या “दूसरी श्रेणी” वालों से है, वो सवाल खड़ा कर देंगे।


अब JNU पर ये डिग्री धारक हमला करते हैं, ना ना जाकर नहीं, सिर्फ वाट्सएप-फेसबुक पर, क्योंकि इन डिग्री धारकों का मानना है के JNU के छात्र 10 रुपए में ही रहना चाहते हैं, 300 नहीं देंगे, क्योंकि किसी ने काँचा इलाहिया (Kancha Ilaiah) का फोटो JNU का छात्र बताकर वायरल किया जाता है, और ये मान लेते हैं के JNU में माँ बाप बेटा बेटी सब पढ़ाई कर रहे हैं, इनके दिए टैक्स से, टैक्स कितना देते होंगे वैसे ये डिग्री धारक? क्योंकि इन्हें पता ही नहीं है के JNU, Jamia, DU के दूसरी श्रेणी के छात्र सिर्फ फीस वृद्धि का विरोध नहीं कर रहे। चलिए फीस पर बता देता हूँ, ये फीस 10 रूपये या 300 रूपये नहीं है, बिना बढ़ी हुई फीस JNU में 27600 से 32000 तक है और फीस वृद्धि होती है तो ये 55000 से 61000 तक हो जाएगी। गरीब कैसे पढ़ेंगे, हमारे प्रधान सेवक गरीब हैं और गरीबों के खिलाफ कोई नियम आने पर चुप? क्यों? बस यही तार्किक सवाल पूछ लिया इन दूसरी श्रेणी वालो ने, मैं इनका पुरजोर विरोध करता हूँ, कहाँ एक तरफ प्रथम वर्ग के डिग्री धारक व्यक्ति या छात्र देश को विश्व गुरु बनाने के लिए सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं और कहाँ ये दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र सरकार से ही सवाल जवाब कर रहे हैं। वैसे इन डिग्री धारकों ने शिक्षा सब्सिडी वाली ली थी या बिना सब्सिडी के? कितनी फीस दिए होंगे ये डिग्री धारक?



Bhakts are always BLIND
















कटु सत्य

महंगाई, बेरोजगारी, बेरोजगारी की वजह से यूथ की आत्महत्या के मामले, देश की गिरती हुई अर्थव्यवस्था, रूपये का डॉलर के सामने सबसे बुरा हाल, किसान आत्महत्या, शिक्षा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च, NRC, CAA, वर्तमान NPA पर देश की प्रतिक्रिया, धारा 370 और 35a की सच्चाई, ट्रिपल तलाक की असलियत वगेरह, और कोई The Print, The Wire, Scroll, NewsClick, Youth Kee Awaaj, Newslaundary, Alt News, Indian Democracy वगैरह जर्नलिज्म के नाम पर न्यूज़ साईट या लेख-विचार अभिव्यक्त करने की साईट खोलकर बैठे हैं, ताकि भ्रष्टाचार के मामले, रेप के मामले, या हाल में पकड़े गये दविंदर सिंह का मामला या 2017 में मध्य प्रदेश से ISI के लिए जासूसी करते गये पकड़े गए व्यक्ति (सभी हिन्दू), नोटबन्दी या जी एस टी की विफलता, उज्ज्वला योजना की विफलता, स्वच्छ भारत मिशन की विफलता, मेक इन इंडिया की विफलता, पी एम सी बैंक, बीमा कम्पनी का बेचा जाना, एयर इंडिया का बेचा जाना, रिटायर्ड बुजुर्गों की पेंशन खत्म करना, सरकारी नौकरी खत्म हो रही हैं, और मजबूत सरकार ये नहीं कह रही है के आपका पैसा डूबने नहीं देंगे, वो कह रही है के अगर डूबेगा तो पांच लाख तक दे देंगे, घर में कैश रख नहीं सकते, बैंक में पैसा सुरक्षित नहीं, पेंशन खत्म, बीमा कंपनी कभी भी अपने को दिवालिया घोषित करके हाथ खड़े कर देगी, सरकार बोलेगी टर्म्स एंड कंडिशन पे तो आपने ही साइन किये थे, इत्यादि, ये सब बातें बताकर ये साइट्स देश को जागरूक बनाना चाहती हैं, प्रजातंत्र को मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं, सिर्फ यही नहीं, ये सभी साईट भ्रष्टाचार भी उजागर करती हैं, जैसे NULM घोटाला, व्यापम घोटाला, मोदीगेट घोटाला, गौतम अडानी और विलमार पल्स घोटाला, KG गैस घोटाला, गुजरात फिशरीज घोटाला, अडानी पॉवर घोटाला, गुजरात स्टेट पट्रोलियम कॉर्पोरशन घोटाला, इंडिगो रेफाईनरी घोटाला, मेट्रो रेल घोटाला, NH24 घोटाला, PDS घोटाला (उत्तराखंड, छत्तीसगढ़), PGI भर्ती घोटाला, MPLAD घोटाला, Kharghar जमीन घोटाला, फड़नवीस सरकार का 500 करोड़ का घोटाला, चिकन घोटाला, Cayman Island घोटाला (अजित डोवाल), RKW Developers (ऐसी फर्म जो 1993 बम ब्लास्ट के आरोपी इक़बाल मिर्ची से आर्थिक लेन देन के आरोप से घिरी है) ने बी जे पी को हाल ही में एक बड़ी रकम चंदे के रूप में दी, राष्ट्रीय राजमार्ग घोटाला (अडानी) आदि, इन सब घोटालों की जानकारी इन्हीं तार्किक न्यूज़ साइट्स से मिली, वहीं दूसरी ओर देश की मुख्यधारा की मीडिया पाकिस्तान को सबक सिखाने में व्यस्त है और डिग्री धारक ज्ञान लेने में।

प्रथम श्रेणी (अरे डिग्री धारक) के व्यक्ति या छात्र तो इन सभी पर इतनी मजबूत सरकार के खिलाफ, मजबूत नेता के खिलाफ षडयंत्र करने तक का आरोप लगाते हैं, क्योंकि ये सरकार ये नेता ईमानदार और भ्रष्टाचार मुक्त हैं, ऐसा सिर्फ ये प्रथम श्रेणी के व्यक्ति या छात्र मानते हैं, ये मानते हैं, इसलिए इनकी बातें ही सही। विमर्श का कोई फायदा? साथ ही साथ इनकी नजरों में हिन्दुओं की सरकार बनी है, और "दूसरी श्रेणी" के व्यक्ति या छात्र तो विरोध करेंगे ही। बस इन्हें सरकार को चैन से बैठने नहीं देना, भले सरकार काम करे या ना करे, आलोचना क्यों हो रही है इसका सटीक जवाब जानना हो तो प्रथम वर्ग के व्यक्ति या छात्र से बहस कर लीजिये, जवाब मिल जाएगा। सर्व ज्ञानी जो हैं।

ये जो डिग्री धारक हैं, चलते चलते सोचा इनसे कुछ अपील कर दूं, या कुछ मांग लूं देश के लिए, शायद दे दे। अभी दो गोली काण्ड हुए हैं, दिल्ली में, एक जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों पर, दूसरा शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों पर, इससे पहले कर्नाटक के एक स्कूल में बाबरी मस्जिद तोड़ने के दृश्य को रिक्रिएट किया गया, छोटे बच्चे हैं सब, शाहीन बाग़ के बच्चे क्या बोल रहे हैं ये सबको पता है, लेकिन बी जे पी की CAA रेली में बच्चे गोली मारने की बात कर रहे हैं, इसपर इन डिग्री धारकों का सीना चौड़ा हो जाता होगा, हो क्यों ना, गद्दारों को जो मारने की बात कर रहे हैं, छोटे बच्चे, अब दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र बी जे पी की रैली में आये बच्चों की भाषा का विरोध करें तो देशद्रोही, शाहीन बाग़ के बच्चों पर कुछ बोलेंगे तो दिखावा।

कितना अच्छा हो जब इन डिग्री धारकों के बच्चे कुछ सालों बाद जब घर लौट कर आएं स्कूल से और कहें पापा मैने आज एक देश के गदार को मार दिया, क्योंकि वो मीट लाया था, या प्रेयर कर रहा था, या टोपी लगा रखी थी, डिग्री धारक पापा का सीना चौड़ा होगा या कुछ और सोचेंगे? कुछ और सोचे तो किस बात के लिए आज हल्ला मचा रखे हैं? आज अगर बच्चों को सहिष्णुता नहीं सिखाई, आज अगर बच्चों को मानवता नहीं सिखाई, आज अगर बच्चों के कोमल मन में हिन्दू मुस्लिम का जहर भर रहे हैं, तो कल के लिए आज ही तैयार रहिये। तो डिग्री धारकों तय कर लो, अपने बच्चों को किस दिशा में ले जाना है।

सैनिकों की शहादत पर खूब विडियो शेयर करते हैं ये डिग्री धारक, हमला, युद्ध की बात करते हैं। लेकिन सवाल यहाँ ये आता है के क्या यही डिग्री धारक अपने खुद के बच्चों को सेना में जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, भेजेंगे सेना में? या शहीद होने के लिए दूसरों के बच्चे ही चाहिए? सेना का सम्मान सभी भारतवासी करते हैं, लेकिन सेना का राजनीतिकरण कुछ, और सेना का राजनीतिकरण का विरोध अगर "दूसरी श्रेणी" के व्यक्ति या छात्र कर दें तो वो देशद्रोही।

एक काम और हो सकता है, सरकार से कहकर कानून में बदलाव लायें, और हर भारतवासी को कम से कम 5 साल सेना में भर्ती होने का कानून पास करवाएं, 6 महीने या एक साल की ट्रेनिंग लें और कर दे हमला पाकिस्तान पर या देश के गद्दारों पर या आतंकवादियों पर, इससे बड़ी राष्ट्रसेवा क्या होगी? अपने मुख्य सैनिक भी सिर्फ आपातकाल के लिए सुरक्षित रहेंगे या कोई बड़ी कार्यवाही के लिए तैयार रहेंगे।

अगर ये डिग्री धारक इसपर भी तैयार नहीं होते तो ये मान लेना चाहिए के ये सिर्फ और सिर्फ वाट्सएप और फेसबुक के शेर हैं, जमीन पर जीरो।

अब अगर डिग्री धारक अगर इसे पढ़ लेंगे तो उनके पास कुछ रटे रटाये शब्द मौजूद रहते हैं, जो वास्तविक रूप में इनको पहचान की राजनीति की वजह से मिलें हैं, ये शब्द रुपी ज्ञान इनको वाट्सएप या फेसबुक से मिला हैं, तुरंत सवाल खड़ा करेंगे 70 सालों में क्या हुआ, 70 सालों में ऐसा क्यों हुआ, 70 सालों में वैसा क्यों हुआ, 70 सालों में ऐसा क्यों नहीं हुआ जो आज हो रहा है वगैरह? स्यूडो-सेकुलरिज्म से शुरू होकर सिक्ख के खिलाफ दंगे और कश्मीरी पंडित पर आकर रूक जाते हैं।

अब अगर ये बता दिया जाए के ये आपकी सोच नहीं है ये सोच आपको सोचवाई गई है, इन्हें बताया जाए के आप तार्किक नहीं हैं, ज्ञान का आभाव है तो फिर बताने वाले ने खुद के पैर को कुल्हाड़ी पर मार दिया है, सुनिए अच्छे अच्छे शब्द, जो इनके अपने ओरिजनल होते हैं, डिग्री लेते समय वो इन (अप) शब्दों को सुनते हैं, सीखते हैं और इन (अप) शब्दों में कोई अपना नया निकाल लाते हैं। बोलिए कोई भी सरकार ऐसे नागरिकों पर खुश होगी के नहीं? गर्व करेगी के नहीं।

इन 70 सालों की कहानी मैं खुद पिछले 6 सालों से सुन रहा हूँ, पता नहीं कब 71, 72, 73, पर आयेंगे, कब इन सालों का हिसाब सरकार से लेंगे? डिग्री धारक दिमाग है, घड़ी की सुई अटकी हुई है।

चलिए सिक्ख दंगो की बात करते हैं, दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र ये बात अच्छे से जानते हैं के जब सिक्ख अलगाववादी आन्दोलन चल रहा था तब आर एस एस और बी जे पी सिक्खों से चिढ़ी हुई थी, सिक्ख अलगाव वादी आन्दोलन, हिन्दुओं की हत्या और जगह जगह बम विस्फोट से सबसे ज्यादा आर एस एस और जन संघ (बाद में बी जे पी) ही परेशान थे, (जो हिन्दू मारे गए उनके लिए 70 सालों में क्या किया? या 71, 72, 73 सालों में? कोई जवाब?)।

जनाब एल के आडवाणी और श्री अटल जी 3 मई 1984 को दिल्ली में धरने पर बैठे थे अपने समर्थकों के साथ क्योकि वो चाहते थे के अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में सेना भेजी जाए, अमृतसर के गोल्डन टेम्पल के पास जन संघ (बी जे पी की पूर्ववर्ती पार्टी) ने ऐसे सभी व्यक्तियों का पूर्ण समर्थन किया था जो गोल्डन टेम्पल के आस पास बीड़ी, पान, गुटखा की दुकानें लगायें और इन पदार्थों को बैचे, ये जानते हुए के सिक्ख धर्म में इन सब पदार्थों के सेवन या धार्मिक परिसर के आस पास बिक्री तक पर रोक है, लेकिन किया तो किया, कौन आज पूछने वाला है। बात यहीं नहीं रूकती, हरबंस लाल खुराना जो उस वक्त बी जे पी के राष्ट्रिय नेता थे उन्होंने अमृतसर के गोल्डन टेम्पल के एक मॉडल को अमृतसर रेलवे स्टेशन के काफी नजदीक एक जगह पर ही तोड़ दिया था। जब इंदिरा गाँधी ने ऑपेरशन ब्लू स्टार किया तब पूरे संघ परिवार ने इसका पूर्ण समर्थन किया था। इंदिरा गांधी को आयरन लेडी कहते नहीं थकते थे, तभी आज नेहरु ही निशाने पर रहते हैं, या राजीव जी, इंदिरा गांधी को बस आपातकाल पर घेरते हैं।

अब दंगो की बात करते हैं, जो दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र हैं, उन्हें पता है के 80 का दशक आते आते कांग्रेस अपना सांगठनिक ढांचा खो चुकी थी, उसके कैडर इंदिरा जी की अति केन्द्रीयकरण की नीति से अलग हो चुके थे और देश में क्षेत्रीय दलों का उदय हो चुका था, फिर जब श्रीमती गांधी की हत्या हुई तो रातों रात कांग्रेस इतने हिन्दू कहाँ से इकट्ठा कर ली? जिसकी जमीन ही नहीं बची थी? तो डिग्री धारकों को बताना चाहूँगा के आर एस एस के एक नेता हुआ करते थे, नाना भाई देशमुख, उन्होंने बकायदा पत्र लिखकर इंदिरा जी की हत्या की निंदा करी थी और सिक्ख के खिलाफ दंगों को सही ठहराया था, किसी ने खोजबीन करी आर एस एस क्या कर रही थी सिक्ख दंगो के समय? क्यों देशमुख ने हत्याओं का समर्थन किया, क्यों अडवाणी, अटल जी चुप रहे इस बयान पर? डिग्री धारक जवाब ले आएंगे, लेकिन दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र कहेंगे के कांग्रेस और आर एस एस दोनों सिक्ख के विरुद्ध दंगो में शामिल थे। 71, 72, 73वें जो वर्ष आये उसमें क्या सिक्ख समुदाय को न्याय मिल गया? कोई नई इन्क्वायरी करी गई? नहीं? क्यों? बस इसीलिए दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्रों से डर लगता है, खोज के सवाल ले आएंगे।

कश्मीरी पंडितों पर इसी साईट पर एक लेख लिखा है, वहीं से ले रहा हूँ, “किसी को एक पल में उसके घर से बेघर कर देने का दर्द कश्मीरी पंडितों से ज़्यादा किसी ने शायद ही अनुभव किया हो। 80 के दशक का अंत और 90 के दशक तक जो दौर चला वो त्रासदी, दुख, अवसाद से भरा था, आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाया, अत्याचार किया, मार काट की। आज तक कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी मे बसाने के लिए किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। 6 साल में भी कोई कदम नहीं उठाया गया।

आतंकवाद को कश्मीर में उपजाऊ ज़मीन 80 के दशक में मिली। उस समय केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन दिया था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (कश्मीर का एक आतंकवादी संगठन) ने कश्मीर में आज़ादी का नारा दिया और कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला गया। यह एक पागलपन था, इस पागलपन में सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं, जो भी भारत के समर्थक थे उन्हें मारा गया। दूरदर्शन को सरकार का प्रवक्ता माना जाता था, इसलिए लासा कौल जो दूरदर्शन के निदेशक थे, मार दिये गए। मुसलमानों के धर्मगुरु मीर वाइज़ भी मारे गए क्योंकि उन्होने आतंकवादियों का समर्थन करने से मना कर दिया था।

जज नीलकांत को मारा गया तो उसी समय मौलाना मदूदी भी मारे गए। बीजेपी के टीका लाल टपलू को मारा गया तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुहम्मद युसुफ भी आतंकवाद की भेट चढ़े। कश्मीरी पंडितों को मारा गया, सूचना विभाग के निदेशक पुष्कर नाथ हांडू मारे गए, पंडितों के विस्थापन का विरोध कर रहे हृदयनाथ को भी मार दिया गया, इन्हीं के साथ साथ इंस्पेक्टर अली मुहम्मद वटाली, कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुशीरूल हक़, पूर्व विधायक मीर मुस्तफा, अब्दुल गनी लोन भी आतंकवादियों द्वारा मारे गए।

हज़ारों कश्मीरी पंडितों को मारा गया तो हजारों कश्मीरी मुसलमानों को भी मारा गया लेकिन क्या सारे कश्मीरी मुसलमान कश्मीरी पंडितों के विरोधी थे, जैसा भ्रम फैलाया जाता है? अगर ऐसा होता तो घाटी में मुस्लिम आबादी लगभग 96 प्रतिशत थी और कश्मीरी पंडित सिर्फ 4 प्रतिशत। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अगर यह दावा सही होता तो कितने कश्मीरी पंडित बच पाते। पलायन क्यों हुआ? जबकि कई जगहों पर मुस्लिम कश्मीरी पंडितों के घरों के बाहर पहरा दे रहे थे और जब आतंकवादियों ने उन मुस्लिम्स को भी मारना शुरू किया जो पंडितों को बचा रहे थे तब कश्मीरी पंडितो ने पलायन शुरू किया। 

इस आतंकवादी घटना में हज़ारों मुसलमानो को भी मारा गया। 50 से 60 हज़ार मुसलमान घाटी छोड़ने पर विवश हुए। कुछ हज़ार मुसलमान परिवारों को आतंकवादियों ने बंधक बनाया, उन परिवारों के साथ क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं। जो 50 या 60 हज़ार मुस्लिम कश्मीर से बाहर आए उन्हें शक की नज़रों से देखा गया। हालांकि वो आतंकवाद के दबाव में या सरकारो की बेरुखी से भी कभी विद्रोही नहीं बने। कश्मीरी पंडितों को तो सरकार की सहानुभूति मिल गई, सरपरस्ती मिल गई लेकिन इन मुस्लिम परिवारों की आवाज़ आज तक कोई नहीं बन पाया। वे पार्टियां भी नहीं जो अपने को मुस्लिम की हितेशी घोषित करती हैं।

कश्मीर से जब कश्मीरी पंडितो का और मुस्लिम परिवारों का पलायन हो रहा था, तब उस दौर में बीजेपी समर्थित विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। बीजेपी ने श्री जगमोहन को (जो बी जे पी के सक्रिय सदस्य थे और कई मुख्य पदों पर रह चुके थे साथ ही कुछ चुनाव भी जीते थे) कश्मीर का गवर्नर बनाया। लेकिन कश्मीरी पंडितों को बचाने के लिए ना केंद्र में बैठी बी जे पी ने कुछ किया और ना ही कश्मीर के राज्यपाल श्री जगमोहन जी ने, बल्कि इन्होंने कश्मीरी पंडितों का जम्मू मे पलायन करने में मदद की। जिन कैंपों में कश्मीरी पंडितों को रखा गया, उन कैंपों के हालात आज भी बद्दतर है, पिछले 6 सालों में कोई सुधार भी नहीं किया गया।

पलायन किए हुए मुस्लिम्स तो शायद कश्मीर को भूल चुके हैं क्योंकि देश उन्हें भूल चुका है। जिन कश्मीरी पंडितों का मुद्दा बीजेपी उठाती रहती है, वह समस्या दी हुई इसी दल की है। सवाल कायदे से ये होना चाहिए के उस दौर में बी जे पी, आर एस एस क्या कर रहे थे? आर एस एस ने अपने कैडर क्यों नहीं भेजे कश्मीरी पंडितों को बचाने के लिए और आतंकवादियों से लोहा लेने के लिए, जबकि उस समय केंद्र में बी जे पी समर्थित सरकार थी और श्री जगमोहन जो बी जे पी के बड़े नेता थे, कश्मीर के गवर्नर थे? अब देखिये, दूसरी श्रेणी के व्यक्ति या छात्र सरदर्द हुए के नहीं? अब डिग्री धारक को ये समझाया जाएगा के नहीं के JNU, Jamia, DU को बंद कर देना चाहिए? जो तार्किक हैं उन्हें अर्बन नक्सल कहा जाएगा या नहीं? अंत में डिग्री धारकों से अपील है, तार्किक मत बनिये, कम से कम समझदार तो बन जाइये, कम से कम देश के भविष्य के बारे में सोचिये, कम से कम आज जो सरकार द्वारा गलत हो रहा है उसपर समर्थन मत दीजिये, तटस्थ ही हो जाइये, तटस्थ होकर भी आप आज देशभक्ति का परिचय ही देंगे, आप ऐसे देश के काम आइये। काम आइये तो सही देश के।

हिंदी में लिखा है ये लेख, इसे ठीक से पढिये, जो लिखा उस पर यकीन ना हो तो सत्यता खोजिए, फिर आप इंग्लिश में भी अगर कुछ लिखा गया हो, तुरंत समझ जाएंगे, जरूरत इतिहास को पढने की है, समझने की है, हिंदी-इंग्लिश करने की नहीं। आँख बंद करके किसी भी बात पर यकीन मत कीजिये, अपने अंदर के छात्र को जिन्दा रखिये, वरना हिंदी में पढ़कर भी आप डिग्री धारक ही बने रहेंगे, और इंग्लिश में लिखा कभी समझ नहीं पाएंगे, तार्किक बनिये, सिर्फ डिग्री धारक नहीं।


Dr Anurag Pandey is Assistant Professor at University of Delhi. India. The Views are personal.


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