Anurag Pandey "और नीरो बांसुरी बजा रहा था"

Updated: Mar 9

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भारत एक ऐसा देश है जो दंगो, अल्पसंख्यक वर्ग के विरुद्ध नफरत, इत्यादि को नकारता है, ये देश विवधताओं का सम्मान करने के लिए विश्व में जाना जाता है। लेकिन  भारतीय राज्य की तरह इस देश के कुछ राजनीतिक दल नहीं हैं, जहाँ भारतीय राज्य समावेशी प्रवर्ती का है, वहीं कई राजनीतिक दल अपवर्जी प्रवर्ती के हैं, जहाँ भारतीय राज्य अत्यंत आधुनिक है, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज और कई राजनीतिक दल उतने ही पारम्परिक हैं। और ये राजनीतिक दल भारतीय समाज के आधुनिक ना होने का फायदा उठाते है, अपने संकीर्ण विचार समाज पर थोपते हैं और समाज का एक बड़ा तबका पारम्परिक होने की वजह इन्हें हाथों हाथ लेता है। इसी आधुनिकता और पारम्परिकता के पशोपेश में देश के कई नागरिक फंसे रहते हैं, उन्हें ये समझ ही नहीं आता के भारतीय राज्य के आधुनिक द्रष्टिकोण को अपनाएँ या अपने दकियानूसी, धर्मांध, जातिगत, लैंगिक सामाजिक सोच को सही मानें। और यही सब साम्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद इत्यादि संकीर्ण विचारों को फलने फूलने का साधन बनता है और धर्मनिरपेक्षता, स्त्री अधिकार, लैंगिक समानता, जातिगत समानता इत्यादि का विरोध करता है, और ऐसे विचारों को जनता के मन मस्तिक्ष में भरने का कार्य कई संकीर्ण विचार वाले दल, नागरिक समाज या कोई संस्था करती है, जिसका नतीजा प्रजातंत्र मजबूत नहीं हो पाता, संकीर्ण विचार सत्य बन जाते हैं, और लोग तार्किकता को ताक पर रख देते हैं, दकियानूसी सोच, साम्प्रदायिक विचार, जातिगत संकीर्णता, लैंगिक असमानता इत्यादि समाज में गहरी पैठ बना लेते हैं।


इन्हीं संकीर्ण विचारों को परम सत्य मानकर देश के कई व्यक्ति हाल के वर्षों में दंगे, मोब लीचिंग, अल्पसंख्यकों पर हमला करने में पीछे नहीं रहते, और जो हमले में शामिल नहीं हो पाते, उनमें से बहुसंख्यक इनका समर्थन करते हैं, ऐसे कृत्यों को वैधानिकता देते हैं, मानों भारतीय समाज इन सब बातों को नया नोर्मल मानने लगा है, एक तो हमारा समाज पहले से ही पारम्परिक है, उसपर साम्प्रदायिकता का जहर घर घर तक पहुँचाया जा रहा है। शायद यही नया भारत है, इस नये भारत में भाई चारे, धर्मनिरपेक्षता, धर्मों का सम्मान इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं बची है। इसके साथ ही साथ हर एक वर्ग जो सरकार की जबरदस्ती थोपी गईं नीतियों का विरोध करता/ती है, दकियानूसी सोच या पारम्परिकता के स्थान पर आधुनिक विचारों की पैरोकारी करता है, तो सरकार उन्हें देशविरोधी, गद्दार, अर्बन नक्सल इत्यादि कई नामों से नवाजती है और सरकार के पैरोकार, अपनी पारम्परिक मानसिकता की वजह से इन आधुनिक विचारों को समझ नहीं पाते, अपना नहीं पाते और जब ऐसे विचार इनके व्हाट्सएप या फेसबुक पर आते हैं, इन मेसेजेस की सच्चाई जाने बिना तुरंत आगे भेजते हैं या शेयर करते हैं ये ऐसा करते हैं क्योंकि ऐसे सभी व्यक्ति व्यवस्था विरोधी होते हैं, संविधान विरोधी होते हैं, आधुनिकता के विरोधी होते हैं। वो इन मेसेजेस को सच मानते हैं क्योंकि उनका अतार्किक मस्तिष्क किसी धर्म से नफरत करता है, वो लैंगिक समानता का विरोधी है, वो जातिवादी है, क्षेत्रवादी है, भाषावादी है, और यही अतार्किक मस्तिष्क वर्तमान सरकार का विरोध करने वालो को देशद्रोही, गद्दार होने का तमगा देता है, हालांकि ऐसे सभी व्यक्तियों को ये लगता है के दुनिया की सारी तार्किकता इन्हीं के पास है। वर्तमान सरकार के सही गलत सभी विचारों पर आँख कान बंद करके यकीन करने वाले ये सभी व्यक्ति तार्किक नागरिक होने का परिचय दें या ना दें लेकिन खुद को सबसे बड़ा देशप्रेमी और राष्ट्रभक्त जरुर घोषित करते हैं, जबकि वास्तविक रूप में ये सिर्फ साम्प्रदायिक होते हैं, जिन्गोइस्ट होते हैं, जातिवादी होते हैं, क्षेत्रवादी होते हैं और भाषावादी होते है, राष्ट्रवादी या देशप्रेमी नहीं।


अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलना, किसी को अकारण देशद्रोही, गद्दार या अर्बन नक्सल कहना देशप्रेम नहीं होता, ना राष्ट्रभक्ति होती है, ये उस दल विशेष की गुलामी ज्यादा लगती है जो समाज को बाँट कर राजनीति करती है। तो ऐसे सभी व्यक्ति सबसे पहले अपने को देशप्रेमी और राष्ट्रवादी कहना बंद करें, पारम्परिक समाज तो है ही, ये सभी व्यक्ति खुद को इस विचारधारा का गुलाम घोषित करें, पारम्परिक समाज और दकियानूसी सोच रखने वाले इन सभी व्यक्तियों के लिए ये वक्तव्य ही ज्यादा तार्किक होगा।


इसी नये भारत में अभी कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति आए हुए थे, ऐसा लग रहा था मानों पूरा देश जगमग हो गया, ताजमहल को धुलवाया गया, झुग्गी झोपडी छुपाने के लिए अहमदाबाद में बड़ी दिवार बनाई गई, करोड़ों रूपये खर्च किये गये, सभी गौरवान्वित महसूस कर रहे थे, हों भी क्यों ना, अपना देश सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र के राष्टपति का स्वागत जो करने वाला था।


लेकिन इसी बीच स्वागत करने वाले देश की राजधानी के कुछ इलाकों में कुछ घटा, कुछ ऐसा जिसकी सभ्य, आधुनिक और प्रजातांत्रिक समाज में कोई जगह नहीं है, लेकिन ये घटना घटी, ये एक ऐसी घटना है जिसका दर्द बरसों तक याद रखा जायेगा, जो जख्म मिले वो पता नहीं कब भर पाएंगे, सिर्फ इस वजह से क्योंकि दो सम्प्रदायों के जिन्गोइस्ट आपस में भिड़ गये, जानमाल का नुकसान हुआ, कई जिन्दगियाँ जो कल तक हंस खेल रही थीं, आज इस दुनिया में नहीं हैं, कई अस्पताल में जिन्दगी की लड़ाई लड़ रहे हैं, कई घायल हैं। ये कुकृत्य 24 फरवरी से शुरू हुआ और आज ये दावा किया जा रहा है के सब नियंत्रण में किया जा चुका है, नियन्त्रण में किया गया उस वक्त जब ना जाने कितने परिवार तबाह हो गये, कितनी सम्पत्ति का नुकसान हुआ और कितनी जानें गईं। नीरो बंसी बजाने में व्यस्त थे, रोम जल रहा था, नीरो ने शांति व्यवस्था बनाने के लिए कुछ नहीं किया, नीरो दोषमुक्त रहेंगे, वो बांसुरी बजाने में व्यस्त थे। जब बंसी की मधुर धुन बंद हुई तब नीरो ने एक ट्वीट किया 26 फरवरी को दोपहर लगभग 2 बजे, नीरो जो खुद को राष्ट्रवादी घोषित करते नहीं थकते, उनके लिए बंसी जरूरी थी या राष्ट्र? नीरो बंसी छोड़ने के बाद भी उन जगहों पर नहीं गये जहाँ दंगे हुए, नीरो ने अपने किसी सिपहसलार को शांति बनाने और दंगे रोकने के लिए कोई आदेश नहीं दिया, कई जगहों पर ये सिपहसलार ही दंगाईयों का साथ देते नजर आये, या कुछ लोगों को अधमरा करके उनसे जय जयकार करवाते नजर आए।[1] नीरो उस वक्त बंसी बजा रहे थे, नीरो राष्ट्रवादी हैं।


इन दंगो को समझने के लिए आपको मुझे सबको काफी पीछे जाना पड़ेगा, देखना पड़ेगा के ये पटकथा कब से लिखी जा रही थी और उस पटकथा के शिकार बने उत्तरी पूर्वी दिल्ली के वासी। समाज तो पारम्परिक था ही, इस पारम्परिक सोच को पिछले लगभग 6 सालों में और बढ़ा दिया गया, राज्य तर्क तर्क चिल्लाता रहा और सत्ताधारी दल संकीर्णता, साम्प्रदायिकता, जातिवाद इत्यादि को बढाने में लगा रहा। यकीन नहीं हो तो अपने व्हाट्सएप फेसबुक को खंगालिए, भाषणों की गिरती मर्यादा देखिये।


सन 2014 में बी जे पी की सरकार बनती है, सरकार बनने के कुछ ही समय बाद अल्पसंख्यक समूह पर हमले होने शुरू होते हैं, ये नये भारत की शुरुआत थी, जिसमें सबसे पहले व्हाट्सएप फेसबुक ने अमूल्य योगदान दिया, कई तरह के ग्रुप बनाये गये, इन सभी ग्रुप्स को आप खगालेंगे तो आपको सिर्फ कुछ मुख्य बातों पर ही फोकस दिखाई देगा, सबसे पहले मुस्लिम्स के प्रति घृणा, फिर मुस्लिम देशों के प्रति घृणा, फिर सीधे या घुमाफिराकर सभी मुस्लिम को संशय की दृष्टि से पेश करना, मानो मुस्लिम होना ही गद्दारी या देशद्रोही होने की पहली निशानी है, उसके बाद जब ये घृणा धीरे धीरे आपके मन मस्तिष्क में गहरी पैठ बना लेती है, जब आप मुस्लिम्स को संशय की दृष्टि से देखना शुरू कर देते हैं, अब आपको मुस्लिम्स की पवित्र पुस्तक में भी कमियां नज़र आने लगती हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है, फिर आपके पास सुबह दोपहर या शाम को नाश्ते, लंच या चाय के समय कुछ विडियो परोसे जाते हैं, जिसमें कोई मुस्लिम धर्मगुरु ये बता रहा होता है के काफिरों को मारना इस्लाम है, हिन्दुओं से दोस्ती करना इस्लाम के खिलाफ है, काफिरों को मारने से जन्नत मिलती है वगेरह, आपके मेरे व्हाट्सएप या फेसबुक पर ऐसे मेसेजेस लगातार आते हैं, आपको मुझे मुस्लिम्स का डर दिखाया जाता है, आपको मुझे दारुल हर्ब और दारुल इस्लाम समझाया जाता है[2] और बताया जाता है के कैसे मुस्लिम्स भारत को जनसंख्या वृद्धि के जरिये या आक्रामकता के जरिये भारत को दारुल इस्लाम बस बनाने ही वाले हैं। अगर आप सहिष्णु रहे हों अपनी पूरी जिंदगी, ऐसे मेसेजेस रोज या समय समय पर पढ़कर धीरे धीरे मुस्लिम के विरुद्ध सोचने पर मजबूर हो जाते हैं या यूं कहें के आप सोच नहीं रहे होते आपको सोचवाया जाता है। अगर आप यूथ हैं तो आपका खून धीरे धीरे उबलने लगता है, आप नफरत के भंवर में फंस चुके होते हैं, आप डरना शुरू कर देते हैं, आप गुस्से और नफरत के ज्वार भाटे में खुद को देखते हैं, आप भारत के भविष्य को लेकर आप डरते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचकर आप डरते हैं, ये एक ऐसा डर है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है, ये बात आप नही जानते क्योंकि आप व्हाट्सएप या फेसबुक पर आये किसी मेसेज पर अपने पड़ोसी से ज्यादा भरोसा करने लगते हैं।[3] मैं इन सब के लिए सबसे पहले आपकी, अपनी पारम्परिक सोच को सबसे पहले दोष दूंगा, फिर वर्तमान परिस्थितियों को, ये पारम्परिक सोच का बीज ही था जो आज पेड़ बन गया है या बना दिया गया है, इस सोच को खाद पानी व्हाट्सएप, फेसबुक से मिलता रहता है, ताकि पेड़ मुरझाये नहीं, कड़वे फल या कांटेदार फूल देता रहे।


फिर इसी समय 2014 से 16 के बीच गौ रक्षा दल बनते हैं और धर्म की रक्षा के नाम पर या गऊ माता को बचाने की मुहीम शुरू होती है, इसका शिकार कई मुस्लिम्स कई दलित बनते हैं, भीड़ ने न्याय करना शुरू किया और मोब लिंचिंग की शुरुआत हुई, इंसानी जीवन की कीमत इस नये भारत में क्या है, इसकी झलक देखने को मिली, हम सभी शांत थे, बहुत कम लोगों ने विरोध किया, जिन्होंने विरोध किया, वो हिन्दू विरोधी, देशद्रोही, सिकुलर गैंग, दरबारी इत्यादि कई नामों से पहचाने जाने लगे। पारम्परिक-दकियानूसी सोच और आधुनिक सोच में टकराहट हुई और पारम्परिक-दकियानूसी सोच विजयी मुद्रा में खड़ी रही।


इन सब परिस्थितियों के बीच अचानक से उपरोक्त लिखित मेसेजेस के साथ एक अलग तरह के मेसेजेस आने शुरू हुए जिसमें (नीरो और उसकी बांसुरी को छोडकर) बाकी सभी दलों को हिन्दू विरोधी घोषित किया जाने लगा, कांग्रेस प्रमुखता से निशाने पर रही, राहुल, सोनिया को देशविरोधी, पाकिस्तान प्रेमी, मुस्लिम प्रेमी और हिन्दू विरोधी का दर्जा दिया जाने लगा, यहाँ तक की फिरोज गाँधी को फिरोज खान, मोतीलाल नेहरु को मोईनुद्दीन बताया गया, नेहरु को कश्मीरी पंडित ना मानकर मुस्लिम बताने का षड्यंत्र रचा गया, ये सब इसलिए किया गया क्योंकि व्हाट्सएप फेसबुक पर शुरुआत मुस्लिम्स से नफरत करने या मुस्लिम्स के प्रति नफरत को बढ़ाने से करी गई थी, इसलिए नेहरु, गांधी परिवार को मुस्लिम बताया गया ताकि इस परिवार से और कांग्रेस से आप नाउम्मीद हो जाएँ, ताकि आप यकीन करें के क्योंकि ये मुस्लिम हैं तो पाकिस्तान प्रेमी होंगे ही, आप कांग्रेस विरोधी बन गये, क्योंकि आपको पहले मुस्लिम विरोधी बनाया गया।[4] क्योंकि आपकी दकियानूसी सोच को हवा दी गई।


अब जब कांग्रेस देशविरोधी, सभी गैर भाजपाई दल जो NDA में शामिल नहीं वो देशद्रोही या हिन्दू विरोधी या अर्बन नक्सल, सारे मुस्लिम देशविरोधी और अंत में सरकार का विरोध करने वाले, मोब लीचिंग का विरोध करने वाले, काले कानूनों का विरोध करने वाले, कुछ भी गलत को गलत बोलने वाले सभी गद्दार, देशद्रोही हो गये। आपने यकीन भी किया वरना 2019 का चुनाव नतीजा वैसा नहीं होता जैसा आया। अब जब बाकी सभी दल और सरकार का, उसकी नीतियों का विरोध करने वाले देशद्रोही या अर्बन नक्सल हो गये तो इनकी जगह नये भारत में नये देश प्रेमी, नये नायक, नये राष्ट्रवादी आएंगे ही। देखिये, आ भी गये हैं, गोडसे आज देशभक्त हैं, सावरकर अंग्रेजों की मुखबिरी नहीं करते थे, वो आज महान क्रांतिकारी हैं और आपने मान भी लिया।[5] तर्को को स्वच्छ भारत मिशन के जरिये साफ़ कर दिया गया है और उसकी जगह पारम्परिक सोच और दकियानूसी विचारों को आपने मैंने हम सभी ने अपने मन मस्तिष्क में जगह दी, उसे सम्हाल के रखा। आधुनिकता फिर हारी, तार्किकता फिर हारी।


2019 में जब बी जे पी दुबारा सता हासिल करती है तब एक के बाद एक बिना रुके कई फैसले लेती है, कुछ कानून लाती है, जैसे धारा 370 का निर्जीव किया जाना, (The Jammu and Kashmir Reorganisation Bill), तीन तलाक कानून, (The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Bill, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), इसके अलावा भी कई बिल पास हुए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इन्हीं एक्ट या बिल पर हुई। कई लेख लिखे गये, बहुत से बुद्धिजीवियों ने इन सभी एक्ट या बिल का विरोध किया, क्योंकि या तो ये एक्ट/बिल संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थे/हैं, या किसी धर्म विशेष पर सीधा हमला कर रहे थे/हैं।


इनमे सबसे ज्यादा और मुखर विरोध नागरिकता संशोधन कानून का हुआ जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर भारत आये हिन्दू, बौद्ध, जैन, इसाई एवं सिक्ख शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान रखा गया। इस एक्ट का विरोध सबसे ज्यादा रहा और जनता खुद बिना नेतृत्व के सडकों पर आन्दोलन करने पर विवश हुई, दो वजहों से विरोध हुआ, पहला हमारे देश में पहले से नागरिकता देने का प्रावधान है जो संविधान की मूल भावना के साथ चलता है, लेकिन इस नये बिल ने धर्म को आधार माना नागरिकता देने के लिए, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यहाँ धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान संसद से पास किया जाना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है, दूसरे मुस्लिम समुदाय जो ऊपर लिखे हुए कारणों की वजह से तथा विभिन्न कानूनों के पास होने से एक डर के माहोल में पहले से ही था और जब नागरिकता कानून पास होता है और क्रोनोलोजी समझाई जाती है NRC और NPR की[6] तब उसके मन में एक नया डर भर दिया गया के अब वो इस देश के नागरिक नहीं रहेंगे, सरकार ये कानून उनकी नागरिकता छीनने के लिए लाई है, 2014 से अब तक मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध पैदा हुई परिस्थितियों को/घटनाओं को देखते हुए उनका ये डर स्वाभाविक भी है। इस नागरिकता कानून के विरोध में कई राज्यों/शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, शाहीन बाग़ का विरोध सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरा, ये विरोध पिछले लगभग तीन महीनों से चल रहा है और देश के विभिन्न राज्यों/शहरों में शाहीन बाग़ की तर्ज पर आन्दोलन हुए और उनमें से कई आंदोलनों को पुलिस दमन द्वारा रातों रात खत्म किया गया, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा किया गया दमन सबसे अच्छा उदाहरण बनके उभरा जहाँ पुलिस द्वारा लगभग 20 के करीब लोगों मारे गये और हजारों घायल हुए।[7] लेकिन फिर भी आन्दोलनकारियों ने शांतिपूर्ण आन्दोलन का रास्ता नहीं छोड़ा।[8] इन सब घटनाओं ने मुस्लिम के अंदर जो डर घर चुका था, (नागरिकता खोने का और बी जे पी की मंशा को लेकर), उसे और बढ़ा दिया।


हालांकि इस नागरिकता/NRC के दायरे में वो सभी आएंगे जिनके पास नागरिकता साबित करने के दस्तावेज नहीं होंगे, जिनमें दलित, भूमिहीन व्यक्ति, मजदूर, ट्राईबल, अनपढ़ व्यक्ति इत्यादि हैं, वो चाहें किसी भी धर्म के क्यों ना हों। तो जिस दिन NPR और NRC लागू होगा उस समय कई हिन्दू जातियां भी संदिग्ध नागरिक की श्रेणी में आ जाएँगी, शायद वो लोग भी जो आज इस कानून का समर्थन आँख कान बंद करके कर रहें हैं। सडकों पर भीड़ बनकर लीचिंग कर रहे हैं, या शाहीन बाग़ में, जामिया के छात्रों पर गोली चलाने निकलते हैं या ऐसी सोच रखते हैं। ऐसी सोच उनकी अपनी नहीं है, ये सब उनको सोचवाया जाता है, घृणा भरी जाती है, उन्हें सभी जो सरकार का विरोध कर रहे हैं देशद्रोही नजर आते हैं, जिनको सिर्फ जान से मार देना चाहिए, ऐसा उनको सोचवाया जाता है, परम्परावादी समाज, घृणा को थोड़ा और बढ़ाता है, क्योंकि कोई दल ऐसा चाहता है।[9]


वर्तमान सरकार को शुरू से विरोध नापसंद रहा है और जिस विरोध को ये छोटा समझ रही थी, चुनावी फायदे के लिए प्रयोग करना चाह रही थी, कुछ दिनों में सभी वर्गों के आने से ये विरोध अब सरकार के लिए सरदर्द बन गया, क्योंकि लोग तब तक समझ गये थे के ये एक काला कानून है।[10] दिल्ली, झारखंड इत्यादि चुनावों में भी विरोध करने वालों पर तीक्ष्ण प्रतिक्रिया करने का भी कोई चुनावी फायदा बी जे पी को नहीं हुआ और ये आन्दोलन सरकार के लिए एक मुसीबत की तरह से दिखने लगे। सरकार के लिए ये सभी आन्दोलन, जिसकी जड़ वो शाहीन बाग़ में समझ रही है, एक पहेली की तरह से आये, और सरकार नहीं समझ पाई के आन्दोलन की वैधानिकता कैसे खत्म के जाए या आन्दोलन कैसे खत्म किये जाएँ ताकि वो NPA-NRC पर आगे बढ़ सके। कई तरह के षड्यंत्रों का सहारा लिया गया, कई आधे अधूरे वीडियो वायरल किये गये, ये साबित करने के लिए के ये आन्दोलन देश विरोधी है[11], हिन्दू विरोधी है, इस आन्दोलन के जरिये मुस्लिम्स जिन्नाह वाली आजादी मांग रहे हैं वगैरह, लेकिन आन्दोलन को बदनाम करने की सारी साजिशें विफल हो गईं, दिल्ली चुनाव में तो बी जे पी ने शाहीन बाग़ और नागरिकता कानून को ही प्रमुख मुद्दा बनाया, और इस दल के कई प्रमुख नेताओं ने भड़काऊ बयानबाजी भी करी, घर घर जाकर जो बी जे पी ने पर्चे बांटे, उसमे नागरिकता कानून का जिक्र था और जो लोग इसका विरोध कर रहें हैं उन्हें देशद्रोही साबित करने की साजिश, लेकिन जनता ने बी जे पी की इस घृणा की राजनीति को नकार दिया, और दिल्ली चुनाव में बी जे पी की करारी हार हुई। दिल्ली चुनाव में हार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग़ आन्दोलन किसी दूसरी जगह करवाने के लिए प्रयास किये, लेकिन उसके वार्ताकार विफल रहे।[12] सबसे मजेदार बात ये हुई के वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार के पास अपनी ही जनता से मिलने का समय नहीं है। खुद सोचिये, जिस नीरो से मिलने हजारों किलोमीटर दूर से विश्व के सबसे शक्तिशाली देश का प्रमुख सपरिवार आता हो, वो नीरो इन आम लोगों से मिलने जायेगा या अपने किसी दरबारी को भेजेगा? नहीं? नीरो यहाँ भी बांसुरी ही बजा रहा है।


अब आप ऊपर लिखी गई बातों की क्रोनोलोजी समझिये.

1. सबसे पहले मुस्लिम के मन में डर बैठाया जायेगा, लिंचिंग करके, या उन्हें देशद्रोही बोलके या उनसे जबरन जय श्री राम बुलवाकर या जबरन वन्दे मातरम बुलवाकर। उनके मन में हिन्दू डर बैठा कर और उनको सबक सिखाकर, किस अपराध का सबक? कोई नहीं जानता, बस वो मुस्लिम हैं तो सभी जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्ति दल मानते हैं, के वो हिन्दू विरोधी हैं, देशद्रोही हैं और उनका इस नये भारत बस यही एकमात्र अपराध है के वो मुस्लिम हैं। हमें अपने पारम्परिक समाज को, दकियानूसी सोच को और व्हाट्सएप फेसबुक को शुक्रिया कहना चाहिए, इन सभी ने सरकार का पांचवे पिलर के रूप में साथ दिया और हमें आधुनिक विचारों, तार्किकता, विकास की राजनीति से कोसो दूर कर दिया।    

2. फिर कश्मीर, तीन तलाक, बाबरी मस्जिद पर जो निर्णय आया, और नागरिकता कानून लाकर मुस्लिम्स डर बढ़ाया गया, सरकार में उनके अविश्वास को पुख्ता किया गया, भले मुस्लिम ने भी विकास के नाम पे बी जे पी को वोट दिया हो। लेकिन टारगेट इन्हीं को बनाया गया।

3. फिर अंत में जब मुस्लिम का डर बढ़ा हुआ दिखने लगेगा तब वो कुछ करेंगे कुछ ऐसा जिसका आराम से फायदा उठाया जा सके क्योंकि वो ना दबेंगे और ना झुकेंगे तो दंगे ही करेंगे। हर उस जगह जहाँ बी जे पी की स्थिति मजबूत है या स्थिति पहले से सुधरी है, या स्थिति सुधारना चाहती है वहां ऐसा माहौल बनाया जायेगा के मुस्लिम कुछ करें, सक्रिय हों, सरकार की नीतियों और जगह जगह हो रहे अत्याचार, लिंचिंग वगेरह से चिढ़े हुए, डरे हुए मुस्लिम्स आगजनी करें, मार काट करें और सरकार हिन्दुओं के तथाकथित डर को जो व्हाट्सएप फेसबुक ने इंजेक्ट किया उसको बढ़ाए। हिन्दू को खतरा सामने दिखने लगेगा और दंगे होंगे, इन दंगो को चलने दिया जायेगा ताकि नीरो की वैधानिकता और ज्यादा मजबूत की जा सके और निर्विवाद रूप से देश का महानायक घोषित किया जा सके। उसकी बांसुरी की जय जय कार होगी। गद्दारों को सबक सिखाया जा चुका होगा।


लेकिन ये क्रोनोलोजी फ़ैल हो गई और दांव उल्टा पड़ गया, क्योंकि मुस्लिम ने शांतिपूर्ण ढंग से आन्दोलन का सहारा लिया, संविधान का सम्मान किया, तिरंगा लहराया, एकता का नारा बुलंद किया। चाहे वो शाहीन बाग़ हो या लखनऊ का घंटाघर हो या कहीं और। धीरे धीरे जब इस नये नागरिकता कानून की NRC की, NPA की सच्चाई फैली तब इन मुस्लिम आन्दोलनकारियों के साथ हिन्दू, सिक्ख, जैन, इसाई और बड़ी संख्या में जुड़े और पहले से आन्दोलनरत नागरिकों का साथ दिया। आन्दोलन थोडा और मजबूत हुआ, और जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्ति परेशान हुए।  इसे सत्याग्रह कहा जाता है, इस सत्याग्रह का जवाब तो अंग्रेजों के पास नहीं था तो वर्तमान सरकार कहाँ से लाती?


इन्हीं सब के बीच मुस्लिम्स के मध्य भी एक ऐसे वर्ग ने जगह बनाने की कोशिश करी जो कहीं छुपा रहता था, जो खुद जिन्गोइस्ट है, साम्प्रदायिक है, शुरू से। उसके मन में भारत में हुए आजादी के बाद से लेकर अब तक जितने भी घटनाक्रम हुए हैं उनकी एकमात्र वजह सारे हिन्दू हैं, साम्प्रदायिक हिन्दू नहीं और मुस्लिम्स के बीच का ये तबका सभी हिन्दुओं से नफरत करता है, बदला लेना चाहता है। ये जो जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक मुस्लिम है, जो मुट्ठी भर होंगे, इनमे से कुछ से मेरी बात हुई, कम शब्दों में बताना चाहूँगा के इनकी नजरों में भारत में अत्याचार सिर्फ और सिर्फ़ मुस्लिम्स पर ही हुए हैं, कभी किसी महिला पर नहीं हुए, दलित पर नहीं हुए, ओबीसी पर नहीं हए, किसान-मजदूर पर नहीं हुए, जितने अत्याचार हुए वो मुस्लिम्स पर हुए और सभी हिन्दू एक जैसे हैं, कम शब्दों में मुस्लिम विरोधी। ये मुस्लिम जिन्गोइस्ट भी फेसबुक व्हाट्सएप के शेर है, जमीन से गायब रहते है, कभी किसी मुस्लिम के लिए कुछ नहीं किया जिनकी बात ये कर रहे होते हैं और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भडकाऊ पोस्ट लिखते है या किसी पोस्ट पर भड़काऊ बयानबाजी करते है। ये तबका सभी हिन्दुओं पर खुदा के कहर की वकालत करता है और आमीन बोलकर ऐसी दुआ करता है के सभी हिन्दू बर्बाद हो जाएँ, मार दिए जाएँ वगेरह, ये तबका धमकी भरे अंदाज में बोलता है “जिस दिन हम निकल आये, ऐसे काटेंगे जैसे कसाई जानवर काटता है।[13]


जब मेरी बात हुई और मैंने कारण जानना चाहा तो मुझे भी सबक सिखाने की धमकी मिली, क्योंकि मैं या मेरे जैसे लोग सिर्फ दिखावा करते हैं, इनके अनुसार मुस्लिम के साथ कुछ अप्रिय होता है तो मैं या मेरे जैसे लोग रात में खुशियाँ मनाते हैं, दिन में सहानुभूति दिखाने चले आते है। जबकी मैं इनसे रात के एक बजे के लगभग बात कर रहा था। हिन्दू जिन्गोइस्ट तो धमकियां देते ही रहते हैं, मुस्लिम जिन्गोइस्ट की धमकियां सुनकर लगा, दोनों जुड़वाँ ही हैं।


2014 से अब तक इन मुस्लिम साम्प्रदायिक/जिन्गोइस्ट लोगों ने मुस्लिम समुदाय में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करी, लेकिन वो सफल नहीं हुए, इसके कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख है नई उभरती हुई मिडल क्लास, जो पढ़ी लिखी है, उसने इनके विचारों को नकार दिया, फिर दूसरा तबका गरीब है, उसने भी अपनी रोजी रोटी को इनके विचारों से ज्यादा तरजीह दी, इसी वजह से ये मुस्लिम साम्प्रदायिक या जिन्गोइस्ट सफल नहीं रहे, मोईन शाकिर की एक किताब है अगर उसे पढ़ा जाए तो पता चलेगा के ये मुस्लिम साम्प्रदायिक/जिन्गोइस्ट आजादी के बाद से ही अस्तित्व में हैं, लेकिन आजतक उनकी सुनी नहीं गई,[14] हालाँकि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से कुछ लोग इनके विचारों से प्रभावित जरुर हुए। ये वही लोग है जो बी जे पी के लिए कैनन फोडर का काम करते हैं, जहाँ भी इन्होने कुछ साम्प्रदायिक वक्तव्य दिया, जहाँ कुछ ऐसा बोला जो हिन्दू विरोधी हो, बी जे पी इसे सारे मुस्लिम्स पर लागू करती है, और बताना चाहती है के सारे मुस्लिम्स ऐसे ही हैं। भले मुस्लिम सड़क पर निकलकर इनके वक्तव्यों का विरोध करें, किसी आतंकवादी घटना का विरोध करें, लेकिन बी जे पी फायदा उठाने में सफल हो जाती है, बिना अपने खुद की गिरेबान में झांके के वो या उसके नेता शुरू से क्या क्या करते, बोलते आएं हैं।[15] जहाँ एक ओर मुस्लिम ने अपने बीच के जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्ति, दलों को कोई वैधानिकता नहीं दी, वहीं दूसरी ओर कई हिन्दूओं ने अपने समुदाय में बैठे जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्तियों, दलों को पूर्ण वैधानिकता दी।


जब बी जे पी के सभी प्रयास बेकार हो गये और वो समझ पाने में असफल रही के जो नागरिकता कानून के खिलाफ आन्दोलन चल रहें हैं, उन्हें खत्म कैसे किया जाए, कैसे ये बात पुख्ता की जाए के मुस्लिम देश विरोधी हैं तब शाहीन बाग़ में आंदोलनरत महिलाओं का महिमामंडन किया गया, कोई मुस्लिम नहीं भड़का, शाहीन बाग़ को हिन्दू विरोधी, पाकिस्तान परस्त कहा गया, कोई फायदा नहीं हुआ, दिल्ली चुनाव के दौरान कुछ भाषण सुने गये, कुछ रेली निकाली गई, नागरिकता कानून के समर्थन में मिस्ड काल करने से लेकर सडकों पर अभियान तक चलाया गया, देश के गद्दारों को, गोली मारो जैसे स्लोगन बी जे पी के लगभग हर रेली या प्रोग्राम में नजर आये,[16] दिल्ली चुनाव के दौरान भी ऐसे भडकाऊ बयान सुनने को मिले।[17] लेकिन मुस्लिम नहीं भडके, वो तिरंगा हाथों में लेकर संविधान का पाठ करते रहे, बी जे पी की ये योजना भी विफल हुई। फिर एक पुराना स्लोगन नये तरीके से आया, “इनके लिए धर्म पहले है, देश बाद में, तिरंगा या संविधान का पाठ एक छलावा है, दिखावा है, दिल से ये सभी पाकिस्तान परस्त और आतंकवादियों के समर्थक हैं, भले इन सभी मुस्लिम्स ने पाकिस्तान के कुकृत्यों का खुले रूप में विरोध किया हो और आतंकवाद पर खुले रूप से आलोचना करी हो, लेकिन जब बहुसंख्यक जनता अपनी तार्किकता को दफन कर चुकी हो तो वो व्हाट्सएप और फेसबुक पर आये मेसेजेस को ही सच मानेगी।


अब इन सबमें असफल होने के बाद जब जाफराबाद में नागरिकता कानून विरोधियों ने सडक पर आन्दोलन करने का प्रयास किया तब बी जे पी के विधान सभा हारे हुए प्रत्याक्षी जो पहले आम आदमी पार्टी में थे, श्री कपिल मिश्रा, ने ये बयान दिया के जाफराबाद को दूसर शाहीन बाग़ नहीं बनने देंगे, और धमकी भी दी के अगर पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती तो वो अपने समर्थकों के साथ खुद आन्दोलन खत्म करवाने पर मजबूर होंगे, इस घ्रणित और संविधान विरोधी वक्तव्य के बाद जाफराबाद के आन्दोलनकारी जगह खाली करके वापस चले गये। ये वक्तव्य इतवार 23 फरवरी को दिया गया।[18] इसी बीच वारिस पठान का एक विडियो वायरल हुआ जिसमें वो एंटी हिन्दू वक्तव्य दिए के 15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे। बी जे पी ने इस बयान को हाथों हाथ लिया और देश के कई “जिम्मेदार” न्यूज़ चेनल्स ने इस वक्तव्य को ऐसे दिखाया जैसे सारे देश के मुस्लिम की सोच ऐसी ही है[19], हालाँकि यहाँ भी दांव उल्टा पड़ा और कई मुस्लिम सडक पर उतरकर वारिस पठान के वक्तव्य का विरोध किये।[20] ये वक्तव्य 15 फरवरी को कर्नाटक के गुलबर्ग में नागरिकता कानून के विरोध में आयोजित एक रेली में दिया गया था, जिसे खुद मुस्लिम ने नकार दिया और वारिस पठान को कटघरे में खड़ा किया। किसी ने सुना के अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा या जो भी बी जे पी के नेता भडकाऊ बयान देते हैं, उनके विरोध में किसी ऐसे हिन्दू (जो मुस्लिम्स के ऐसे ही बयानों पर हल्ला मचाते हैं), को सड़क पर आकर इन सभी नेताओं का विरोध करते हुए? वारिस पठान पर तो केस हो गया, इनमें से किसी भी नेता पर कोई केस दर्ज हुआ? ऐसे बयानों का विरोध तो हुआ लेकिन उसमें हिन्दू-मुस्लिम सभी शामिल थे।[21]


इसी वजह से मुझे ऐसे जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्तियों से एक अपील करनी है, “ऐसे किसी भी वक्तव्य या कार्यों का जो किसी से नफरत पर आधारित है, जो युद्धोन्मादी है, जो दंगाई है, या इनका समर्थक है, ऐसे किसी भी व्यक्ति का सेलेक्टिव होकर विरोध करना बेमानी है, क्योंकि वो खुद ऐसे हैं, इसलिए ये काम सिर्फ ऐसे लोग को ही करने दिया जाए जो धर्म से ज्यादा इंसानियत को मानते हैं, जो डेमोक्रेटिक हैं, सेक्युलर हैं, युद्ध के खिलाफ हैं, विश्व में शांति चाहते हैं, दंगे, साम्प्रदायिकता विरोधी हैं। तो विरोध सिर्फ वही करेंगे जो जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक नहीं हैं, आवाज वही उठाएंगे जो जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक नहीं हैं, जरूरत पड़ी तो सड़क पर उतरेंगे वो जो जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक नहीं हैं। अमन शांति लाकर जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक व्यक्तियों को इंसानियत-देशप्रेम का पाठ पढ़ाएंगे वो जो जिन्गोइस्ट/साम्प्रदायिक नहीं हैं।


खैर, कपिल मिश्रा या दूसरे बी जे पी नेताओं को नागरिकता कानून या NPR, NRC पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों से परेशानी है, उनके समर्थकों को भी परेशानी है, उन्हें कुछ समझना होगा, उन्हें कुछ बातें समझनी जरूरी हैं, उन्हें ये जानना होगा के देश में कई कानूनों का विरोध हुआ है, कई आन्दोलन हुए है, उन्हें "विरोध का अधिकार" समझना होगा।


किसी भी देश की विधायिका कोई कानून बनाती है, इस बात को ध्यान में रखकर के ये कानून देश के भले के लिए है, और ये कानून संविधान पर ही आधारित होते हैं। भारत में कानून भारतीय संसद बनाती है, जो स्वाभाविक रूप से संविधान पर आधारित होने चाहिए या होते हैं, इसे अंग्रेजी में Law कहते हैं, अब ये कानून या Law न्यायसंगत हैं या नहीं ये तय करने का कार्य सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसे अंग्रेजी में Just कहा जाता है, तो कोई भी कानून जो संसद द्वारा पास किया गया है वो न्यायसंगत है या नहीं ये तय करने का अधिकार सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के पास होता है, अगर सर्वोच्च न्यायलय ने किसी कानून को न्यायसंगत नहीं माना, तो ऐसा कानून खत्म हो जाता है या संसद जरूरी कमियां पूरी करके इसे न्यायसंगत बनाती है, अब मान लीजिये के कानून पास हो गया और सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न्यायसंगत भी बता दिया, लेकिन जनता इस कानून के विरोध में है, क्योंकि वो इसे निष्पक्ष (Fair) नहीं मानती या किसी समुदाय, वर्ग, जेंडर इत्यादि के विरुद्ध मानती है, भले ही विरोध करने वाली जनता अल्पसंख्यक हो, (हिन्दू-मुस्लिम इसाई सिक्ख मत सोचियेगा), तब सरकार और न्यायपालिका दोनों को स्वतः संज्ञान लेते हुए कानून न्याय संगत है या नहीं ये देखना होता है, जनता द्वारा किया गया ये विरोध सविनय अवज्ञा कहा जाता है, जहाँ जनता आन्दोलन करके विनय के साथ अनुरोध करती है के कानून में उसको कुछ कमी लग रही है या कानून ही काला है, इसे वापस लीजिये या जरूरी संशोधन कीजिये। ये करना किसी भी प्रजातान्त्रिक राज्य में जनता का अधिकार होता है, देशद्रोह नहीं। क्योंकि कानून जनता के लिए ही बनाये जाते हैं और अगर जनता का छोटा या बड़ा हिस्सा इसका विरोध कर रहा हो तब राज्य के सभी तंत्रों को जनता की आवाज सुननी पड़ती है। अगर सरकार नहीं सुन रही, दूसरे तंत्र अपना काम ठीक से नहीं कर रहे तो ये मान लीजिये के आप प्रजातंत्र में सांस नहीं ले रहे, अगला कोई कानून आपके लिए आ सकता है, कैसे करेंगे विरोध? कल कैसे बतायेंगे के आपका विरोध सही है उनका गलत था?


संसद जनता की सुनती है और सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेते हुए या किसी जनहित याचिका को स्वीकार करके वाद विवाद करती है ताकि ये ज्ञात किया जा सके के पास हुआ कानून न्यायसंगत है अथवा नहीं, क्योंकि कानून का न्यायसंगत होना जरूरी होता है ताकि कानून निष्पक्ष (fair) बने। इसे न्यायसंगत निष्पक्ष कानून कहा जाता है या अंग्रेजी में Justice as Fairness की संज्ञा दी जाती है। क्योंकि पास किया गया कानून अगर न्यायसंगत (Just) नहीं है तो वो निष्पक्ष (Fair) नहीं हो सकता, और ऐसा कानून किसी ना किसी के खिलाफ या एक या कई समुदायों के खिलाफ होगा। नागरिकता कानून, NPR, NRC का विरोध भी इसी आधार पर हो रहा है के क्या ये कानून  निष्पक्ष (fair) है? सर्वोच्च न्यायालय शाहीन बाग़ के आन्दोलन को किसी और जगह शिफ्ट कराने के बजाये अगर ये देखे के ये कानून जस्ट यानी न्यायसंगत है या नहीं तो ज्यादा अच्छा होता और सरकार विरोध करने वालों को देशद्रोही गद्दार पाकिस्तान परस्त कहने से बेहतर ये जानने की कोशिश करे के जो कानून उसने संसद में पास किया है क्या वो निष्पक्ष कानून (Justice as Fairness) की श्रेणी में आता है या नहीं, आन्दोलनकारियों से बात करे तो ऐसा करना प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा करना होगा। अब खुद सोचिये, सर्वोच्च न्यायालय ने क्या किया? सरकार ने क्या किया? अगर ऊपर लिखी बातें नहीं हुईं तो मान लीजिये के आपसे विरोध करने का अधिकार छीना जा रहा है, और आपको हिन्दू-मुस्लिम में बांटा जा रहा है ताकि सरकार आपसी नफरत का फायदा उठा के मनचाहे कानून बना सके, भले वो जनता का भला ना कर रहे हों।


वापस कपिल मिश्रा पर आते हैं, इतवार 23 फरवरी को मिश्रा जी भडकाऊ भाषा का प्रयोग करते हैं, उनकी भाषा गैर क़ानूनी है, कोई केस दर्ज हुआ क्या? उनका नागरिकता कानून के समर्थन में रेली करना भी निष्पक्ष (fair) नहीं है, क्योंकि ये कानून पास हो चुका है, पास हुए कानून का समर्थन के लिए आन्दोलन? क्यों? और जो कानून पास हो चुका है, जिस पर सरकार आगे बढ़ रही है, उस कानून का विरोध करने वालों का विरोध? क्यों? एक ना एक दिन ये कानून जनता के दरवाजे तक जायेगा ही, जनता को पेपर्स दिखाने ही पड़ेंगे, फिर मिश्रा जी को ये सब करने की जरूरत ही क्या थी? या बी जे पी के किसी भी नेता को? तो ये सब कानून के समर्थन में नहीं था, ये सब उन लोगों के विरोध में था जो इस कानून के खिलाफ सड़क पर बैठे हैं और सरकार इस आन्दोलन की वैधता खत्म करना चाह रही है, इसीलिए भडकाऊ बयान, किसी एक समुदाय को देशद्रोही इत्यादि तमगों से नवाज रही है, लेकिन वो काम नहीं कर रही जो प्रजातंत्र में एक प्रजातांत्रिक सरकार करती है। क्योंकि ये कुछ और चाह रही थी, जिसकी पटकथा 2014 से लिखी जा रही थी, लेकिन असमंजस की स्थिति हुई जब इतना सब कुछ करने के बाद भी मुस्लिम्स भड़के नहीं, उन्होंने दंगों के बदले सत्याग्रह का सहारा लिया, कपिल मिश्रा या कोई भी उसी मानसिकता का हिस्सा हैं जो 2014 से पाली पोसी जा रही है, जिसे झूठ और दुष्प्रचार के दम पर जिन्दा रखा जा रहा है, वो मानसिकता जो अल्पसंख्यक विरोधी है।


इतवार को मिश्रा जी धमकी देते हैं और सोमवार 24 फरवरी को पत्थरबाजी होने लगती है, किसने शुरू करी, ये किसी को नहीं पता, लेकिन सभी के व्हाट्सएप में मेसेज आ गये होंगे, पत्थरबाजी के दौरान दोनों समुदाय के लोग बाबरपुर-मौजपुर मेट्रो लाइन पर इकठ्ठे हो गये, और पत्थरबाजी करी गई, इसी इलाके के मन्दिरों में पत्थरबाजी हुई, दावा किया जा रहा है के मुस्लिम की भीड़ ने ऐसा किया। इसके बाद हिन्दुओं ने मुस्लिम्स पर पत्थरबाजी करी और एक दुकान को आग लगा दिया।[22] ये भीड़ कौन थी, कहाँ से आई, इसी इलाके की थी या बाहरी थे, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इसके बाद दंगे भजनपुरा, गोविन्द विहार, चाँद बाग़, करावल नगर, सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, कर्दमपूरी, गोकुलपुरी तथा शिवपुरी में फ़ैल गये, ये एरिया उत्तर पूर्वी दिल्ली में आता है, मीडिया में कुछ नामों की चर्चा हो रही है, लेकिन ये कुछ लोग कैसे इतना बड़ा दंगा सुनियोजित तरीके से करवा सकते हैं, समझ से परे है। ना जाने कितने हिन्दू मारे गये, कितने मुस्लिम मारे गये बस एक बात सत्य है जो भी मारा गया उनमें अधिकतर गरीब तबके का हिन्दू या मुस्लिम था, मस्जिद विखंडित करी गई और हनुमान जी का झंडा लहराया गया, मन्दिर पर पत्थर बाजी हुई[23], करीब 40 से ज्यादा लोगों की जान गई और कई सौ घायल हुए, दंगो का दावानल सभी को निगल गया, क्या हिन्दू क्या मुस्लिम, इंसानियत तक को तार तार कर गया, फेसबुक, व्हाट्सएप पर हिन्दू जिन्गोइस्ट खुशियाँ मनाते दिखे, उन्हें क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत आया, बिना ये जाने के दंगा किसने शुरू किया, वो खुश हैं के नागरिकता कानून के विरोधियों को, सरकार के लिए बने सरदर्द को सबक सिखाया जा रहा है। किसी मुस्लिम की दूकान जला दी गई, किसी की शादी हाल ही में हुई थी, उसे मार दिया गया, किसी की शादी होने वाली थी, उसे भी मार दिया गया, स्कूल जला दिए गये, मुस्लिम घरों पर पेट्रोल बम, पत्थर फैंके गये, कई मुस्लिम्स के घरों को आग के हवाले किया गया, मस्जिद, मजार को छतिग्रस्त किया गया, मुस्लिम बी एस एफ के जवान का घर जला दिया गया, उसके घर के आस पास जितने मुस्लिम घर थे, सबको जलाया गया। दंगो के दावानल ने सबको निगल लिया, इसमें पुलिस का रोल भी संदेहास्पद है, किसी भी दंगाग्रस्त इलाके में पुलिस की सक्रियता देखने को नहीं मिली, कई जगह पुलिस CCTV कैमरे तोड़ते हुए दिखी, दंगाइयों के साथ पत्थर बटोरते हए दिखी, दंगाइयों को संरक्षण देते हुए नजर आई या कहीं कुछ मुस्लिम्स से जबरन भारत माता की जय बुलवाई, आजादी देने की धमकी देते हुए मार पीट करती हुई दिखी, इस पुलिस ने गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बक्शा इत्यादि, ये दंगा सुनियोजित था, अचानक से नहीं हुआ, सारे दंगाइयों का मकसद शांति पूर्ण प्रदर्शन को खत्म करना और मुस्लिम समुदाय को दिल्ली में सबक सिखाना था।[24] ना दिल्ली सरकार, ना केंद्र सरकार ने कोई जरूरी कदम उठाया ताकि दंगो को रोका जा सके।


हिन्दू परिवारों पर भी पत्थर चले, उनकी दुकानों को भी आग लगाया गया, उनके स्कूल को भी जलाया गया, उनके घरों के लाल को भी इस दंगे की भेंट चढना पड़ा, उनके घरों को भी आग के हवाले किया गया। जानें दोनों तरफ से गईं, सम्पत्ति का नुकसान दोनों को हुआ, डर के साए में दोनों समुदाय आ गए, दोनों समुदायों के बीच विश्वास कम या खत्म हुआ, कौन इसकी जिम्मेदारी लेगा? दिल्ली सरकार या केंद्र सरकार? या दिल्ली पुलिस?

इन्ही दंगो के बीच में आपसी भाई चारा भी देखने को मिला, कई जगह हिन्दुओं ने मुस्लिम्स की जान बचाई, तो कई जगह मुस्लिम्स हिन्दुओं के लिए दिवार बनकर खड़े हो गए। जानमाल का तो नुकसान हुआ और ये एक ऐसी त्रासदी है जिसका जख्म भरने में शायद बहुत वक्त लग जाए, लेकिन इस त्रासदी में भी कई जगह मानवता जिन्दा रही, दंगो का दावानल हुआ, लेकिन आपसी भाईचारे की मिसाल भी देखने को मिली चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम।[25]


जो भी विचारक या व्यक्ति ये मानते हैं के ये दंगे कुछ महीनों की साजिश का परिणाम है, या हाल के महीनों में जो हेट स्पीच दी जा रही थी या अल्पसंख्यकों द्वारा किये जा रहे आंदोलनों की वजह से जो भडकाऊ बयान या नफरत की राजनीति की जा रही थी, उसकी वजह से हुआ, मैं इन सभी को गलत मानता हूँ, मैं ये मानने को तैयार नहीं के कुछ भाषणों से, या कुछ महीनों की हेट स्पीच या अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध आम हिन्दुओं को भड़का कर इस तरह का कोई भी दंगा इतनी सुनियोजित तरीके से कराया जा सकता है। गुजरात 2002 भी वर्षों की नफ़रत जो तत्कालीन सत्ताधारी दल ने अपने कुछ और संगठनों के साथ भरी थी, उसका परिणाम था, दिल्ली में हुए दंगे भी पिछले लगभग 6 सालों से अनवरत जारी नफ़रत की राजनीति का परिणाम है। मैं ये मानता हूँ के दंगे अगर 2 घंटे से ज्यादा हो गये तो ये सुनियोजित है, करवाये गये है, स्वतः स्फूर्त नहीं, इसलिए दिल्ली के दंगे को भी मैं सुनियोजित मानता हूँ। दंगे अगर 2 घंटे से ज्यादा हो गये तो ये हुए नहीं हैं, करवाए गये हैं। क्योंकि देश की पुलिस और प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति को कुछ ही घंटों में नियंत्रित करने की क्षमता रखते हैं। और अगर आप दंगो को सुनियोजित नहीं मानते हैं तो वास्तविक रूप में आप देश के पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर मानते हैं, आलसी और अकर्मण्य (Mandarin or Irresponsible) मानते हैं।


आप खोजिए ताहिर हुसैन को, आप मानिये के दंगे हुसैन ने, या पूरे विपक्ष ने मिलकर करवाए, आप सरकार पर सवाल खड़े मत कीजिये, आप उनपर भी सवाल मत खड़े कीजिये जिन्होंने नागरिकता कानून के समर्थन में आन्दोलन किया, पर एक दिन आपको ये जरुर पता चलेगा के दंगे से किसको फायदा होता है और दंगे क्यों करवाए जाते हैं और दंगों का सबसे ज्यादा फायदा कौन उठाता है, मुझे यकीन है, एक दिन आपको जरुर पता चलेगा।


अंत में मैं कुछ अपील करना चाहूँगा, उन लोगों से जो साम्प्रदायिक हैं, उन लोगों से जो जिन्गोइस्ट हैं, नाज़ी जर्मनी से जो उधार का राष्ट्रवाद आपको भारतीय बताकर परोसा गया है उससे आजादी पाइए, निकलिए बाहर, मत बनिये रक्त पिपासु, देशप्रेमी बनिये, प्रेम करिये अपने ही देश के वासियों से, अपने पड़ोसी से, मत बटने दीजिये इस समाज को हिन्दू-मुस्लिम में, आज के समय ये सबसे बड़ा देशप्रेम होगा, सबसे बड़ी राष्ट्रभक्ति होगी, छोड़िये इस क्रिया प्रतिक्रिया के सिद्धांत को, क्योंकि ये सच नहीं, झूठ और नफरत पर आधारित है, छोड़िये किसी इन्सान के मारे जाने पर जश्न मनाना, चाहे वो किसी भी धर्म जाति का हो। विरोध कीजिये, जो विरोध कर रहे हैं उनका साथ दीजिये, यही सोचकर साथ दीजिये जैसे आप अपने बच्चों या रिश्तेदार का साथ देते हैं, जिन्दा रखिये प्रजातंत्र को, इसके मूल्यों को, तार्किक बनिये।


अगर आज आप ऐसा नहीं करते तो तैयार रहिये, आज गरीब, कम पढ़े लिखे या अनपढ़ व्यक्ति या उनके बच्चे हाथों में पत्थर है, जबान पर जय श्री राम या अल्लाह हू अकबर है। आज जय श्री राम बोलकर युवा अन्दोलनकारी जनता पर बन्दूक तान रहे हैं, आप चुप हैं, अगर इसे यहीं नहीं रोका गया तो कल ये आपके मेरे घर की कहानी होगी, क्योंकि कल ये सारा समाज, राज्य, नागरिक संगठन, स्कूल, कॉलेज सब जगह ऐसे ही विचारों का बोलबाला होगा, अगर आज आप इन सबके साथ खड़े हैं तो तैयार रहिये कल आपके बच्चे हाथों में पत्थर, बन्दूक, और दिल में नफरत लेकर सडकों पर होंगे, किसी का क़त्ल कर रहे होंगे, आप भले ही उनके सफल जीवन की कामना कर रहे हों, आप भले ही उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक बनते हुए देखना चाह रहे हों, अगर आज आप इस उधार के हिटलर के नाजी जर्मन राष्ट्रवाद (इसी साईट पर लेख है) के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर नहीं लड़ेंगे, अगर आज आप इस विचारधारा को नहीं नकारेंगे, अगर आज आप इस विचारधारा के मानने वालों को समर्थन देना बंद नहीं करेंगे तो कल की तैयारी आज से शुरू कर दीजिये, अपने दिमाग को समझाना शुरू कर दीजिये के आपका लाडला या लाडली किसी भी दिन किसी भी “देशद्रोही” को जान से मार सकता/ती है, घायल कर सकता है, वगैरह, आज मत सोचिये, आने वाला कल आपको खुद सोचने पर मजबूर कर देगा और इन सबके जिम्मेदार आप खुद होंगे, आपका साम्प्रदायिक/जिन्गोइस्ट दिमाग होगा, कोई और नहीं, उस वक्त आप किसी और को दोष दे भी नहीं पाएंगे। अभी वक्त है, सम्हल जाइये, सम्हाल लीजिये इस देश को, इस समाज को, इस राज्य को। नीरो को बांसुरी बजाने दीजिये, आप अपनी धुन बनाइए, प्यार की धुन बजाइए। देश की फिजाओं में नफरत नहीं, प्यार घोलिये, आपसी समझ को जिन्दा रहने दीजिये, आपसी भाई चारे को मजबूत कीजिये, ये देश अपने आप मजबूत हो जाएगा।

[1]https://www.thelallantop.com/news/delhi-violence-in-viral-video-police-gear-telling-five-boys-to-sing-national-anthem-and-vande-mataram-one-of-them-dies/

[2] https://www.brown.edu/Departments/Joukowsky_Institute/courses/islamiccivilizations/7968.html

[3] https://www.youtube.com/watch?v=_voAXVntjIE,

https://www.dailyo.in/variety/muslim-population-muslim-population-growth-rss-census-2011-hadith-quran/story/1/26183.html

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/12347748

[4] https://www.youtube.com/watch?v=z9REiKNMXfw

[5] https://www.youtube.com/watch?v=koV4u9-XnYY,

https://economictimes.indiatimes.com/news/elections/lok-sabha/india/pragya-thakur-calls-godse-a-patriot-bjp-to-ask-her-to-publicly-apologise/articleshow/69358538.cms?from=mdr

[6]https://timesofindia.indiatimes.com/india/jdu-leader-prashant-kishor-dares-amit-shah-to-implement-caa-nrc-in-the-same-chronology-that-he-announced/articleshow/73523568.cms

https://timesofindia.indiatimes.com/india/caa-nrc-npr-chronology-will-make-people-spend-lifetime-securing-papers-yechury/articleshow/74247500.cms

[7] https://www.indiatoday.in/india/story/caa-protests-uttar-pradesh-numbers-1631855-2019-12-27

[8]https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/uttar-pradesh-women-continue-to-protest-against-caa-nrc-at-lucknows-clock-tower/videoshow/73372259.cms?from=mdr

[9]https://www.indiatoday.in/india/story/jamia-firing-shooter-injured-student-police-inaction-amit-shah-kejriwal-1641789-2020-01-30

https://www.indiatoday.in/india/story/watch-man-with-pistol-enters-shaheen-bagh-caught-by-protesters-1641007-2020-01-28

https://www.firstpost.com/india/anti-caa-protests-man-fires-gun-near-delhis-shaheen-bagh-taken-into-custody-no-one-injured-7988981.html

[10]https://www.aljazeera.com/news/2020/02/indian-protesters-hold-interfaith-prayers-shaheen-bagh-200207132713227.html

https://www.hindustantimes.com/india-news/bengal-christians-joining-anti-caa-protests-invites-wrath-of-the-bjp-and-vhp/story-LkbuN5KLr4WLB7syG3ERLL.html

https://www.siasat.com/muslims-sikhs-hindus-join-massive-anti-caa-rally-malerkotla-1829579/

[11]https://www.thehindu.com/news/national/who-is-sharjeel-imam-and-why-is-he-charged-with-sedition/article30691202.ece

[12]https://www.outlookindia.com/website/story/india-news-supreme-court-appointed-mediators-to-hold-another-round-of-dialogue-with-shaheen-bagh-protesters-today/347573

https://timesofindia.indiatimes.com/india/no-solution-on-day-1-of-dialogue-at-shaheen-bagh/articleshow/74216653.cms

https://www.news18.com/news/india/there-are-no-favourites-say-sc-appointed-mediators-at-meeting-with-shaheen-bagh-protesters-2507237.html

[13] ये वक्तव्य मेरे द्वारा दिल्ली दंगो से पहले शाहीन बाग़ में कुछ मुस्लिम्स से बात चीत किये गये अंश और सवाल जवाबो पर आधारित है, साथ ही फेसबुक पर कुछ मुस्लिम मित्रों की वाल पर किये गये कमेन्ट के बाद इन जिन्गोइस्ट मुस्लिम्स के साथ हुए डिबेट पर आधारित है, इनके कई वक्तव्य साम्प्रदायिकता और जिन्गोइस्म की सारी हदें पार जाते है, और कई बार चिढ कर मुझे अपने कमेन्ट डिलीट करने पड़े या जहाँ मैं इनसे बात कर रहा था, वहाँ से हट गया, क्योंकि जैसे संघ का व्यक्ति बर्दाश्त के बहार होता है वैसे ही ये भी डिबेट या बहस करने लायक नहीं होते। सम्प्रदायिकता और जिन्गोइस्म दोनों तरफ है, हालाँकि ये मुस्लिम्स में कम है और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता और जिन्गोइस्म ज्यादा खतरनाक है।

[14] Shakir, Moin.  (1975) ‘The Muslim Political Elite’, in Zafar. Imam (ed.) Muslims of India, pp. 169–73. New Delhi: Uppal Publishing House.

[15] https://www.saveindiandemocracy.com/post/terrorism-or-communalism-in-contemporary-india-1

https://www.scribd.com/document/102242483/Terrorism-or-Communalism-in-Contemporary-India-Pandey

[16]https://scroll.in/video/947739/watch-children-wearing-bjp-caps-were-made-to-shout-goli-maaro-saalon-ko-at-pro-caa-rally

https://www.thenewsminute.com/article/dont-forget-gujarat-hateful-slogans-bjps-pro-caa-rally-kerala-116137

https://www.news18.com/news/politics/bjp-workers-at-pro-caa-rally-in-mangaluru-threaten-to-behead-cong-mla-he-says-not-keen-on-action-2477309.html

[17]https://www.livemint.com/politics/news/bjp-leaders-should-not-have-uttered-hate-remarks-during-delhi-assembly-polls-amit-shah-11581604924637.html

https://www.hindustantimes.com/india-news/bjp-may-have-suffered-in-delhi-polls-due-to-hate-statements-by-party-leaders-says-amit-shah/story-fTIXUAPgjfQjlVYMN3oEHO.html

[18]https://www.hindustantimes.com/delhi-news/won-t-be-another-shaheen-bagh-in-delhi-kapil-mishra-on-twitter/story-LCBDc4jumB2B5ygTBK9u7O.html

https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/kapil-mishra-sets-3-day-deadline-for-cops/articleshow/74274754.cms

[19]https://www.livehindustan.com/national/story-aimim-leader-waris-pathan-refuse-to-apologize-for-15-cr-muslims-will-be-tough-on-100-cr-hindus-telangana-bjp-mla-raja-singh-said-try-it-out-3040006.html

[20] https://www.siasat.com/waris-pathan-under-fire-his-remarks-aimim-seek-explanation-1833491/

https://www.siasat.com/indian-muslims-reject-waris-pathans-controversial-remark-1832185/

https://www.jansatta.com/trending-news/aimim-leader-waris-pathan-trolled-brutally-by-muslims-over-his-controversial-statement-in-support-of-caa-nrc/1325480/

[21]https://citytoday.news/facing-intense-criticism-aimim-leader-waris-pathan-apologises-for-15-crore-muslims-remark/

https://www.thequint.com/news/politics/quoted-out-of-context-says-waris-pathan-on-15-crore-muslims-remark

[22] https://indianexpress.com/article/cities/delhi/delhi-maujpur-babarpur-violence-kapil-mishra-warning-6284978/

[23]https://theprint.in/india/desecration-of-mosque-damaged-harmony-delhis-ashok-nagar-stood-for-says-hindu-resident/371432/

https://indianexpress.com/article/cities/delhi/delhi-maujpur-babarpur-violence-kapil-mishra-warning-6284978/

[24]https://www.bbc.com/hindi/india-51640856?xtor=CS3-33-%5Bwshindi%7EC%7EA14B12C15D11E11F12G11ad1image%7EAEP-Ashok+Nagar%5D-%5BFacebook%5D-%5B6173212275382%5D-%5B6173212278582%5D

https://www.indiatimes.com/news/india/delhi-cops-kicked-us-in-private-parts-tore-hijabs-women-share-gory-details-from-caa-protests-506322.html

https://hindi.sabrangindia.in/article/man-beaten-to-death-north-east-delhi

https://janchowk.com/art-cultur-society/chand-bagh-muslim-area-three-hundred-rioters-no-police/

https://twocircles.net/2020feb29/434949.html

https://indianexpress.com/article/cities/delhi/northeast-delhi-violence-death-6291788/

https://www.thelallantop.com/news/delhi-violence-in-viral-video-police-gear-telling-five-boys-to-sing-national-anthem-and-vande-mataram-one-of-them-dies/

https://theprint.in/india/among-delhi-riot-victims-a-22-year-old-auto-driver-bihar-labourer-and-father-of-six/370993/

[25]https://jobsvacancy.in/muslims-became-shields-of-temple-during-violence-in-chand-bagh-both-communities-in-vijay-park-chased-out-rioters/

https://www.aljazeera.com/news/2020/02/lost-brother-hindu-muslim-families-delhi-share-grief-200227051613459.html

https://www.scoopwhoop.com/news/instances-of-unity-from-riot-hit-delhi-giving-us-hope-in-dark-times/

https://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/hindu-teen-recounts-how-muslim-neighbours-stood-guard-for-him/article30937191.ece

https://www.indiatoday.in/india/story/delhi-violence-hindus-muslims-join-forces-to-guard-their-colonies-from-outside-rioters-1650967-2020-02-28

https://www.news18.com/news/buzz/how-these-hindus-and-muslims-in-delhi-are-waging-a-united-battle-against-violence-2516169.html





Dr Anurag Pandey is Assistant Professor in University of Delhi. India.

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