Anurag Pandey कश्मीर, धारा 370 और संविधान: तथ्य और मिथक (भाग 1)

बचपन में लगभग हम सभी को एक दाढ़ी वाले बाबा की कहानी सुनाई जाती थी, उस कहानी में ये दाढ़ी वाले बाबा (जिनको हममे से किसी ने कभी नहीं देखा और किसी भी बूढ़े व्यक्ति को बाबा मान लेते थे) बच्चों को अपने बड़े से थैले में बंद करके ले जाते थे, ये कहानी सुनाने वाले सामान्यतः हमारे नजदीकी रिश्तेदार या पड़ोस के अंकल आंटी हुआ करते थे, इसीलिए हमारा दिमाग उस कहानी को सच मान लेता था और इस कहानी को सच मान कर हम डर जाते थे।


धीरे धीरे हम बड़े होते हैं और दाढ़ी वाले बाबा की झूठी कहानी बचपन की मीठी याद में बदल जाती है, कुछ इस तरह की ही कहानी भारत में जिन्गोईसट काफी अरसे से सुनाते आ रहे हैं और हममे से कई उन कहानियों पर आँख बंद करके भरोसा कर लेते हैं क्यूंकि वो कहानी हमें कोई ऐसा समूह, दल या व्यक्ति सुनाता है जिसको हमने वैधानिकता दे रखी होती है। देश में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है जिनका बचपन खत्म ही नहीं हो रहा और वो आज भी ऐसी कहानियाँ सुनते हैं, विश्वास करते हैं और दूसरों को भी सुनाते हैं। बिना अपने देश का इतिहास जाने।


बचपन में ही कुछ ऐसे बच्चे हुआ करते थे जो दाढ़ी वाले बाबा की कहानी का पुरजोर विरोध करते थे और समझाते थे के ऐसा कोई बाबा नहीं होता, तो जवाब आता था जब बाबा उठा के ले जायेगा तभी अक्ल आयेगी। आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो सच्चाई सामने लाना चाहते हैं, लेकिन कुछ लोग इन कहानियों से अभिभूत होते हैं, आकर्षित होते हैं और सच्चाई बताने वाले को वो डर दिखाते हैं, बाबा से नफरत करने की सीख देते हैं, जिस डर और नफरत में वो खुद रहते हैं। बचपन के बाबा की कहानी कई रूपों में हमारे सामने जीवन भर आती रहती है और हम विश्वास कर लेते हैं क्यूंकि हम डरे हुए हैं, क्युकी हम नफरत करते हैं।


इनमें लव जिहाद, मुस्लिम की जनसंख्याँ, चार शादियां, मोब लिंचिंग, दंगे, तीन तलाक, कश्मीर, धारा 370, 35a इत्यादि प्रमुख है, ध्यान देने वाली बात यहाँ ये है के ये सभी मुद्दे एक धर्म विशेष को निशाना बनाते हैं। इसी धर्म विशेष का डर दिखा के आज की राजनीति चल रही है, कोई भी कदम जो इस धर्म विशेष पर हमला करता हो, उसका स्वागत किया जाता है, खुशियाँ मनाई जाती हैं और नफरत का माहौल थोड़ा और बढ़ा दिया जाता है। हम खुश होते हैं क्यूंकि बचपन के उस बाबा को आज “ठीक” किया जा रहा है, जिस बाबा पर कोई लगाम नहीं लगा सका, जिसने ना जाने कितने काल्पनिक बच्चे अपने बड़े से थैले में बंद करके अगवा किये, उस बाबा को अब सुधारा जा रहा है, उस बाबा से नफरत बढ़ जाती है। तो आप समझदार हैं, समझ ही गये होंगे के आज का बाबा कौन है और उसका डर और उससे नफरत क्या है?


इस बाबा को नियंत्रित करने के लिए कभी गाय के नाम पे मारा जाता है, कभी दंगों में मारा जाता है, कभी गर्भवती महिला को जान से मार दिया जाता है, कभी महिलाओं, बच्चियों से सामूहिक दुष्कर्म किया जाता है, बाबा चार शादियाँ करते हैं, तीन तलाक देते हैं, अत्याचारी हैं और आज कश्मीर का मुद्दा प्रमुखता से छाया हुआ है, तीन तलाक वाले मुद्दे की चर्चा किसी और लेख में करेंगे,यहाँ आज के सबसे ज्वलंत मुद्दे कश्मीर और धारा 370 पर बात करते हैं। और इस कश्मीर रूपी बाबा के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं, ठीक उस बच्चे की तरह जो बचपन में समझाते थे के बाबा का वास्तविक रूप में कोई अस्तित्व है ही नहीं है। और आप स्वतंत्र हैं अभद्र भाषा बोलने के लिए, देशद्रोही, गद्दार इत्यादि तमगे देने के लिए, आप ऐसा करेंगे क्यूंकि आप डरे हुए हैं, नफरत से भरे हुए हैं, जो हमारा देश या उसकी संस्कृति नहीं सिखाती, आप ऐसा करेंगे क्युकी आप राष्ट्रवादी नहीं हैं, जिन्गोइस्ट हैं, या बना दिए गये हैं।

कश्मीर: इतिहास

कश्मीर भारत के सुदूर उत्तर का एक राज्य है 19 वीं शताब्दी के मध्य तक कश्मीर सिर्फ अपने एक हिस्से की वजह से जाना गया जिसे कश्मीर घाटी या सिर्फ घाटी कहा जाता है, इस घाटी में हिमालय और पीर पंजाल रेंज शामिल हुआ करती थीं, लेकिन आज का कश्मीर या घाटी में जम्मू, कश्मीर, लद्दाख के भाग शामिल होते हैं। इसी के साथ साथ ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (जिसे आजाद कश्मीर कहा जाता है और जिसमे गिलगिट-बाल्टिस्तान के प्रान्त भी शामिल हैं) और चीन द्वारा शासित अक्साई चीन एवं ट्रांस-कराकोरम ट्रैक्ट को भी इसी कश्मीर घाटी में शामिल किया जाता है।


प्राचीन और मध्यकालीन कश्मीर में हिन्दू और बौद्ध परम्परा का केंद्र था, इस दौर में इन दोनों धर्मो के मध्य Syncretism (समन्वयता) अस्तित्व में थी, बौद्ध धर्म के मध्यमाका और योगचारा हिन्दू धर्म के शैविस्म और अद्वेता वेदांत परम्परा के साथ मिश्रित हुए, इसका Syncretism (समन्वयता) का श्रेय बौद्ध सम्राट अशोक को जाता है। बुद्धिज़्म के आने के बाद, कश्मीर घाटी बौद्ध धर्मावलम्बियों की संख्या बढने से मशहूर हुआ। बुद्धिज़्म के सर्वस्तिवाद का उस समय के कश्मीर पर गहरा प्रभाव था।


अशोक के अतिरिक्त कारकोटा, उत्पला राजवंशों ने कश्मीर पर शासन किया, ऐसा माना जाता है के उत्पला वंश के अवन्ती वर्मा ने एक युद्ध में कारकोटा वंश का अंत किया। दो हिन्दुओं की नहीं, ये दो राजाओं की लड़ाई थी। आखिरी हिन्दू शासन लोहरा वंश का था, इसका उल्लेख राजातरंगिनी में मिलता है, ये एक कमजोर वंश साबित हुआ, इस वंश में सिर्फ कोटा रानी ही एकमात्र शासिका थी जिसने कश्मीर के उत्थान के लिए कार्य किये, कोटा रानी की दूरदर्शिता का ही परिणाम था के श्रीनगर में लगातार आने वाली बाढ़ से निबटने के लिए एक “कुटे कोल” नामक नहर बनवाई गई।


कोटा रानी श्री रामचन्द्र की पुत्री थीं, जो सुहादेवा (लोहरा वंश के राजा) की सेना के सेनापति थे। रामचन्द्र ने लद्दाख के बौद्ध राजा रिनचेन को कश्मीर का प्रशासक नियुक्त किया, रिनचेन धोखेबाज निकले और सत्ता के लोभ में रामचन्द्र और उनके सैनिकों को धोखे से बंधक बना लिया, कुछ समय बाद रिनचेन के इशारे पर रामचन्द्र की हत्या कर दी गई और उनके परिवार को कैदी बना लिया गया। रिनचेन के खिलाफ लोग खड़े हुए लेकिन उसने रावनचन्द्र (रामचन्द्र के पुत्र) को लार और लद्दाख का प्रशासक बना दिया और कोटा रानी से जबरन विवाह किया। अपनी सत्ता को वैधता देने के लिए रिनचेन ने बौद्ध धर्म छोड़ कर हिन्दू धर्म अपनाने का प्रयास किया किन्तु एक कश्मीरी ब्राह्मण (जो शैव सम्प्रदाय के गुरु थे), ने रिनचेन को हिन्दू धर्म अपनाने नहीं दिया। रिनचेन सूफी मिशनरी से प्रभावित हुए और इस्लाम कुबूल किया, अब इनका नाम सुल्तान सदरुद्दीन शाह हुआ। इन्हीं सदरुद्दीन शाह की वजह से मुस्लिम शासन कश्मीर में स्थापित हुआ। इस्लाम कुबूल करने के बाद रिनचेन ने शाह मीर को अपना विश्वासपात्र प्रशासक नियुक्त किया और मंत्री पद दिया। शाह मीर के पुरखे भी क्षत्रिय थे और पंच्गब्बर घाटी (राजौरी और बूधायी के मध्य एक प्रान्त) के शासक थे।


कोटा रानी से सदरुद्दीन शाह (रिनचेन) को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम हैदर खान रखा गया। हैदर खान शाह मीर की सरपरस्ती में पले। रिनचेन के इस्लाम कुबूल करने के बाद कोटा रानी ने पुरोहितों की सलाह पर उदायनदेव से विवाह किया, इस विवाह से एक पुत्र हुआ जो भट्टा भिक्षना के संरक्षण में रहा। भट्टा भिक्षना को शाह मीर ने धोखे से मार दिया और इसी के बाद शाह मीर ने कोटा रानी के राज्य पर आक्रमण किया। कोटा रानी एक तरफ मंगोल आक्रमण और दूसरी तरफ शाह मीर के हमले से अपना राज्य नहीं बचा पाई और कश्मीर मुस्लिम शासक के हाथों में आ गया। शाह मीर ने सदरुद्दीन शाह (रिनचेन) के पुत्र हैदर खान के नाम पर शासन शुरू किया। युद्ध के बाद शाह मीर कोटा रानी से विवाह करना चाहता था लेकिन कोटा रानी ने आत्महत्या कर ली और ऐसा कहा जाता है के शादी के तोहफे के रूप में अपने पेट की आतें मीर को तोहफे भेजी, कोटा रानी और उदायनदेव से जो पुत्र हुआ उसका इतिहास अज्ञात है। कुल मिलाकर रिनचेन कश्मीर पर शासन करना चाहता था, फिर कोटा रानी अपने शासन को बचाना चाहती थीं और शाह मीर कश्मीर का शासन अपने हाथ में लेना चाहता था।


बचपन के बाबा की कहानी झूठी निकली क्यूंकि इनमे से कोई भी ना हिन्दू था,ना मुस्लिम,ना बौद्ध जो कुछ था वो शासक बनने की लालसा। युद्ध हिन्दू-मुस्लिम-बौद्ध के मध्य नहीं, बल्कि उन लोगों के मध्य हुए जो सुल्तान या राजा बनना चाहते थे। अब आप इस पूरे इतिहास में राजा बनने की लालसा देख सकते हैं या हिन्दू-मुस्लिम-बौद्ध। ये सोच आपके जिन्गोइस्ट होने या ना होने की, तार्किक होने या ना होने की पहचान है।


इस पूरे व्याख्यान में ये बात साबित होती है के पहला मुस्लिम शासक शाह मीर था जिसने शाह मीर वंश की स्थापना की, शाह मीर का शासन 1339 से 1342 तक चला, हालाँकि मीर वंश शाह मीर के बाद कई वर्षो तक रहा और इसी बीच मीर वंश ने कई मुस्लिम उलेमाओं को कश्मीर आमंत्रित किया और इस्लाम का प्रचार प्रसार करवाया, मीर वंश ने कई बौद्ध और हिन्दुओं को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया और नतीजन हजारों लाखो लोग इस्लाम धर्म को स्वीकार किये, सन 1400 तक कश्मीर में इस्लाम फ़ैल गया, इसी मीर वंश ने पर्शियन को कश्मीर की राजकीय भाषा के रूप में स्थापित किया। मीर वंश सन 1585 तक चला। सन 1585 में मुग़ल सम्राट अकबर ने मीर वंश का अंत करके कश्मीर पर अपना शासन स्थापित किया। अब यहाँ भी आप स्वतंत्र हैं ये सोचने के लिए के एक मुस्लिम ने दूसरे मुस्लिम के खिलाफ कश्मीर में लड़ाई लड़ी या एक राजा ने दूसरे राजा के खिलाफ युद्ध किया ताकि खुद का शासन स्थापित किया जा सके। सनद रहे अकबर ने कश्मीर में शिया-सुन्नी विवाद और सुन्नी मुस्लिम्स के मध्य आपसी वैमनस्य का ही फायदा उठाया। कुल मिलाकर मुस्लिम भी एकजुट नहीं थे।


मुग़ल वंश ने 1585 से 1751 तक शासन किया और 1751 में दुर्रानी वंश ने मुग़ल सेना को हराकर दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की। दुर्रानी शासन ने मुस्लिम, बौद्ध, हिन्दू सभी कश्मीरियों पर बहुत अत्याचार किये, टैक्स की राशि कई गुना करी गई और आम कश्मीरियों की हालत बद से बदतर होती चली गई। दुर्रानी वंश का शासन सिर्फ कश्मीरियों पर अत्याचार के लिए याद किया जाता है। इत्तेफाक से दुर्रानी और मुग़ल भी मुस्लिम ही थे, जहाँ मुगलों ने कश्मीरियत की रक्षा करी, अपना शासन स्थापित किया वहीं दुर्रानी वंश ने कश्मीरियत को तार तार किया और एक आतताई शासन की स्थापना की। आप यहाँ भी अपने विचारों के हिसाब से सोचने के लिए स्वतंत्र हैं, जिन्गोइस्ट की तरह से सोचिये और बोलिए के मुस्लिम्स तो लड़ाके थे ही या तार्किक बन के ये सोचिये के एक राजा का कोई धर्म नहीं होता, वो सिर्फ शासन करता है या अपने शासन को बढ़ाता है, प्यार से या अराजकता से, बिना ये देखे के शासित वर्ग उसके धर्म का है या नहीं।


सिक्ख शासन

सन 1819 में सिक्ख राजा रणजीत सिंह ने कश्मीर पर आक्रमण करके दुर्रानी शासक को हराया, रणजीत सिंह को कश्मीर की आम जनता का पूर्ण समर्थन मिला क्यूंकि दुर्रानी शासन आतताई था और कश्मीरियों ने ये उम्मीद करी के रणजीत सिंह सुशासन लायेंगे। लेकिन सिक्ख शासक दुर्रानी शासकों से भी ज्यादा अत्याचारी निकले, सिक्ख शासन घाटी में दमनकारी साबित हुआ। सभी कश्मीरियों के लिए, जिनमे मुस्लिम, हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख सभी शामिल थे। सिक्ख शासकों ने जनता पर लगने वाला टैक्स दुर्रानी साम्राज्य से भी ज्यादा किया, जिससे कश्मीर की जनता पर बोझ कई गुना बढ़ गया और सिक्ख शासकों के राजस्व में कई गुना बढ़ोतरी हुई। सिक्ख शासको ने मुस्लिम्स पर कई तरह के क़ानूनी प्रतिबंध लगाये, जानवर हत्या के लिए फांसी की सज़ा, श्रीनगर की जमा मस्जिद को बंद करने का आदेश और नमाज अदा करने पर पूर्ण प्रतिबंध, अजान पर प्रतिबंध, तीज त्यौहार का सार्वजिक क्षेत्रों में मनाने पर प्रतिबंध इत्यादि। सनद रहे, मीर साम्राज्य पहला मुस्लिम शासन था, दुर्रानी शासन आतताई था, मुगल शासकों ने कश्मीरियत का सम्मान किया, इनमें से किसी भी शासन ने हिन्दू, बौद्ध पर किसी भी तरह का कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं लगाया।


सिक्ख शासन के समय ही यूरोपियन व्यापारियों का आवागमन शुरू हुआ और कश्मीरी शाल विश्व में प्रसिद्ध हुई, सिक्ख शासको को यूरोपियन व्यापारियों एवं स्थानीय व्यापारियों से मोटा टैक्स मिलता था। सिक्ख शासन पूरे जम्मू-कश्मीर-लद्दाख क्षेत्र तक फैला, इसमें राजा गुलाब सिंह का रणकौशल और नीतियाँ महत्वपूर्ण थीं और सन 1822 में राजा रणजीत सिंह ने गुलाब सिंह को (जो राजा रणजीत सिंह के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र अधिकारी थे) जम्मू का राजा घोषित किया। राजा गुलाब सिंह ने जम्मू में डोगरा साम्राज्य स्थापित किया, डोगरा क्षत्रिय थे।


राजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद गुलाब सिंह के दो बेटों ने सिक्ख अधिकृत भाग पर हमला किया, दोनों बेटे युद्ध में मारे गये, गुलाब सिंह के सबसे छोटे बेटे की हत्या उसके चचेरे भाई हीरा सिंह ने की जो सिक्ख शासन के विश्वासपात्र थे और सिक्ख साम्राज्य में प्रधानमंत्री के पद पर आसीन थे। गुलाब सिंह ने ही हीरा सिंह को सिक्ख दरबार में प्रवेश दिलवाया था ताकि हीरा सिंह को कश्मीर का शासक बनाया जा सके और डोगरा साम्राज्य पुरे जम्मू-कश्मीर-लद्दाख क्षेत्र में फ़ैल जाए लेकिन हीरा सिंह की अतिमहत्वाकांशा ने गुलाब सिंह की योजना सफल नहीं होने दी, परिणामस्वरूप गुलाब सिंह के तीनों बेटे मारे गये। सिक्ख हीरा सिंह की चाल समझ गये थे और जब हीरा सिंह ने सिक्ख राजा शेर सिंह के खिलाफ बगावत करी, तब उन्हें मार दिया गया।


धीरे धीरे गुलाब सिंह ने सिक्ख राजाओं की कमजोरी का फायदा उठा के डोगरा साम्राज्य को पूरे कश्मीर तक फैला दिया, इसका प्रमुख कारण था सन 1845 में सिक्ख शासन और ब्रिटिश सैनिकों के मध्य युद्ध, राजा गुलाब सिंह 1846 तक इस युद्ध से अलग रहे। सनद रहे राजा गुलाब सिंह और लाल सिंह (जो सिक्ख सेना के साथ थे), ने मिलकर सिक्ख पराजय सुनिश्चित करी ताकि डोगरा वंश का शासन स्थापित किया जा सके। ब्रिटिश-सिक्ख युद्ध के बाद गुलाब सिंह ने संधि का प्रस्ताव रखा, इस संधि के तहत ब्रिटिशर्स ने राजा गुलाब सिंह को पूरे क्षेत्र का शासक घोषित किया और राजा गुलाब सिंह ने ब्रिटिश द्वारा जीती हुई जमीन को 75 लाख रुपए अदा करके वापस खरीदा। इस संधि को अमृतसर की संधि के नाम से जाना जाता है, जो सन 1846 में हुई। इसी संधि में डोगरा राजा ने ये प्रावधान करवाया के कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति कश्मीर की जमीन को नहीं खरीद सकता और इसी वंश के आखिरी राजा हरी सिंह ने कश्मीरी लड़की का किसी दूसरे राज्य के लडके से शादी करने पर प्रतिबन्ध लगाया। वहीं दूसरी लाहौर की संधि, जो इसी वर्ष ब्रिटिश और हारे हुए सिक्ख राजा के मध्य हुई, ने सिक्ख शासन का अंत किया और गुलाब सिंह को पूरे कश्मीर का राजा घोषित किया। डोगरा वंश ने 1846 से 1952 तक पूरे कश्मीर क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश के आखिरी राजा हरी सिंह हुए। अब आपकी जिन्गोइस्ट भावना इस प्रमाणिक तथ्य को नहीं मानेगी, आप दोष मुस्लिम्स को ही देंगे क्योंकि बचपन के बाबा की कहानी की तरह ही मुस्लिम्स की कहानी भी आपके दिमाग में भर दी गई है और आपका जिन्गोइस्ट तर्क इस बात को सच नहीं मानेगा भले ही इस संधि के दस्तावेज आपको दिखा दिए जाएँ भले ही राजा हरी सिंह का कश्मीरी लड़की का राज्य से बहार विवाह ना करने वाला फरमान आपको दिखा दिया जाए।


इस दौर में जिसे प्राचीन एवं मध्यकालीन कश्मीर कहा जाता है, आम लोग कहाँ थे, वो क्या कर रहे थे? प्रमुख सवाल यहाँ ये आता है के हिन्दू बहुल कश्मीर बुद्धिज़्म और बाद में इस्लाम से कैसे और क्यों प्रभावित हुआ। इसका जवाब हिन्दू धर्म के चार वर्ण व्यवस्था में है। प्राचीन कश्मीर में जब बुद्धिज़्म फैला तब लाखों हिन्दुओं ने चार वर्ण व्यवस्था के खिलाफ बुद्ध धर्म अपनाया, जिसमें लद्दाख का एरिया बुद्धिज़्म का प्रमुख केंद्र बना। मध्यकालीन कश्मीर में और शाह मीर के शासन काल में कई ब्राह्मण, राजपूत, दलित वर्ग ने इस्लाम कुबूल किया। ब्राह्मण-राजपूत सत्ता के नजदीक या सत्ता में रहना चाहते थे इसलिए इस्लाम की तरफ आकर्षित हुए और दलित उस दौर में कश्मीरी पंडितों (जो जमीन पर मालिकाना हक रखते थे) की जमीनों पर मजदूर या बंधुआ मजदूर बन के कार्य करते थे, इसमें कभी उन्हें मेहनताना दिया जाता था कभी जबरन काम करवाया जाता था और मेहनताना नहीं दिया जाता था। राजनैतिक व्यवस्था तो फिर भी कभी कभी ही डावाडोल हुई, लेकिन कश्मीर की सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह से शोषण, असमान और अत्याचारी थी, जिसमे वर्चस्व वाली जातियां कमजोर जातियों पर जुल्म किया करती थीं। जब लाखों लोग इस्लाम को अपनाये तब भी ये सामाजिक व्यवस्था नहीं बदली, वो इस्लाम या बौद्ध बनने के बाद भी कश्मीरी पंडितों की जमीन पर मजदूर ही रहे। इस तथ्य पर एक प्रगतिशील पत्रकार प्रेम नाथ बजाज (जो कश्मीरी पंडित थे) लिखते हैं के “मुस्लिम्स जनसंख्या के मध्य गरीबी भय उत्पन्न करने वाली थी, अधिकतर मुस्लिम्स कश्मीरी पंडितों की जमीन पर कृषिदास थे, बंधुआ मजदूर। जब भी हिन्दू, मुस्लिम या सिक्ख शासक ने टैक्स बढ़ाया इसकी सबसे ज्यादा मार इन गरीब मुस्लिम मजदूरों पर पड़ी, क्युकी इनमे से लाखों ऐसे थे जिनको काम के बदले पैसा मिलता ही नहीं था। एक छोटे से हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख अभिजन ने इस बड़ी जनसंख्या पर आर्थिक एवं राजनीतिक शासन कायम किया। Cited in “Talbot, Ian; Singh, Gurharpal (2009), The Partition of India, Cambridge University Press. p. xviii and 206.

इस पूरे इतिहास में कश्मीरियों पर दमनकारी नीतियाँ लगाने वाले हिन्दू, मुस्लिम्स या सिक्ख नहीं थे, पूरे कश्मीर से जबरन अनैतिक टैक्स वसूलने वाले भी हिन्दू, मुस्लिम्स या सिक्ख नहीं थे, गुलाब सिंह के बेटों को मारने वाला कोई मुस्लिम नहीं था और जिसने ब्रिटिश के साथ खड़े होकर सिक्ख पराजय सुनिश्चित करी वो भी मुस्लिम नहीं था। ये सभी शासन सत्ता अपने हाथ में रखने की लालसा रखने वाले एक बहुत सीमित राजनैतिक अभिजन थे, सिर्फ राजनैतिक अभिजन। आप खुश हो सकते हैं के मुस्लिम्स को हरा कर सिक्ख शासन स्थापित हुआ और सिक्ख को धोखा देकर हिन्दू (डोगरा) शासन। आप बाकी तथ्यों पर आँख बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं और और डोगरा राजा को अंग्रेजों का साथ देने के लिए देशद्रोही बोल सकते हैं या ब्रिटिश संरक्षण में हिन्दू राज्य स्थापित करने के लिए राष्ट्रवादी। आप यहाँ सत्ता के संघर्ष का धर्म से कोई लेना देना नहीं है, ये सोचने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं, और सत्ता की लड़ाई को धर्म से जोड़ने के लिए भी पूरी तरह स्वतंत्र हैं। सबसे बड़ा प्रजातंत्र होने का मतलब सबसे मजबूत प्रजातंत्र नहीं होता। उसके लिए आपको तार्किक होना पड़ेगा, सवाल पूछने पड़ेंगे और सत्ता पर काबिज लोगों को घेरना होगा। आप अगर ऐसा नहीं करते हैं, तो आप जिन्गोइस्ट बन रहे हैं, बन चुके हैं या बना दिए गये हैं। एक ऐसा नागरिक जिसको प्रजातान्त्रिक मूल्यों से कोई लेना देना नहीं हैं, यहाँ सिर्फ नफरत और डर है, क्युकी बचपन के बाबा की जो कहानी आपको सुनाई गई उसे आप सच मानते हैं। इस लेख का दूसरा भाग 1846 से अब तक का इतिहास और वर्तमान विवाद पर चर्चा करेगा।




Dr Anurag Pandey

Assistant Professor

University of Delhi.

anuragspandey@yahoo.co.



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