Anurag Pandey: कश्मीर, धारा 370 और संविधान: तथ्य और मिथक: भाग III

लेख के पिछले दो भागों में प्राचीन कश्मीर, मध्यकालीन कश्मीर और औपनिवेशिक कश्मीर पर चर्चा की गई। तीसरा भाग धारा 370 और 35a पर चर्चा करता है, इस अंतिम भाग मे समाज मे कश्मीर को लेकर कई भ्रांतियों से पर्दा उठाने का प्रयास किया गया है। लेख सबसे पहले धारा 370 और 35a पर व्याख्या, फिर विभिन्न नेताओं की धारा 370 और 35a पर विचारों की व्याख्या, आजादी के बाद धारा 370 और 35a की स्थिति और फैलाई गईं भ्रांतियाँ, कश्मीरी पंडितों का पलायन और अभी हाल ही में धारा 370 और 35a के हटाये जाने के निहितार्थों पर चर्चा करता है।


पिछले कुछ वर्षों से रेडियो पर वार्ताओं में, चुनावी सभाओं में, किसी पत्रकार को अकेले दिये साक्षात्कार में, किसी सम्मेलन इत्यादि में झूठ बोला जा रहा था जो अनवरत जारी है, जनता जिसे सवाल पूछना चाहिए, वो इन झूठ पर ताली बजाती है, खुश होती है। वहीं पत्रकार कड़े सवाल सरकार से नहीं, विपक्ष से पूछते हैं, और आज की हर गलती की ज़िम्मेदारी 70 सालों पर, नेहरू पर डाल दी जाती है। अब ये झूठ देश की संसद तक पहुँच गया है, लोग खुश हैं। सच्चाई कोई नहीं जानना चाहता। जो कह दिया गया वही सच है। कम शब्दों में कहा जाये तो “बोली जाती है नीति की बात, लिखी जाती है नीति की बात, लेकिन करी जाती है अनीति, क्योंकि यही है सच्ची राजनीति”। जनता खुश होती है, क्योंकि उससे सच छुपाया जाता है। जी संसद में धारा 370 को हटाये जाने के जितने भी कारण गिनाए गए या बताए गए हैं, वो सब झूठे हैं, तह्थ्यविहीन हैं। चिंतित होना स्वाभाविक है, झूठ संसद तक पहुँच चुका है।

धारा 370: तथ्य और मिथक


सन 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद माउण्टबेटन योजना के तहत राजा हरी सिंह ने कश्मीर को एक आजाद देश घोषित किया, खुद को राजा। कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से सीधे तौर पर मिलती है, आजादी घोषित होने के बाद पाकिस्तान ने ये माना के सीमाएं मिलने की वजह से और मुस्लिम बहुल होने से कश्मीर पाकिस्तान में विलय करेगा। लेकिन कश्मीर के राजा हरी सिंह ने कश्मीर को एक आजाद मुल्क घोषित किया। इसी बात से रुष्ट होकर पाकिस्तानी काबाइलियों (सेना) ने सन 1947 में एक आजाद मुल्क कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, जो भारत और पाकिस्तान की ही तरह अपना संविधान बनाने वाला था। कश्मीर के राजा और उनकी सेना इस पाकिस्तानी हमले का जवाब देने मे असमर्थ थी, इसी वजह से हरी सिंह ने लॉर्ड माउण्टबेटन से मदद मांगी, नेहरू या भारत से नहीं, क्योकि कश्मीर को एक आजाद मुल्क घोषित किया गया था। लॉर्ड माउण्टबेटन ने ब्रिटिश सहायता देने में असमर्थता दिखाई और कश्मीर को भारत में विलय का सुझाव दिया, राजा हरी सिंह ने माउण्टबेटन का प्रस्ताव स्वीकार किया और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवहरलाल नेहरू से संपर्क किया और भारत सशर्त मदद करने के लिए तैयार हुआ, इस शर्त के अनुसार कश्मीर का भारत में विलय सुनिश्चित किया गया। उस समय कश्मीर में दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां थीं, एक नेशनल कॉन्फ्रेंस और दूसरी मुस्लिम कॉन्फ्रेंस, जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीर का भारत मे विलय चाहती थी और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर आधारित थी, आपसी भाई चारे और कश्मीरियत की प्रबल समर्थक थी, वहीं मुस्लिम कॉन्फ्रेंस धर्म पर आधारित एक संकीर्ण विचारों वाली पार्टी थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस के लीडर शेख अब्दुल्लाह ने कश्मीर का भारत मे विलय का प्रस्ताव रखा वहीं दूसरी ओर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के लीडर चौधरी गुलाम अब्बास ने कश्मीर का पाकिस्तान मे विलय का प्रस्ताव दिया। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस सिर्फ जम्मू और सीमावर्ती क्षेत्र मे ही थोड़ी स्वीकृत थी। कश्मीर के इसी हिस्से की बहुत थोड़ी जनसंख्या पाकिस्तान मे शामिल होना चाहती थी, लेकिन जम्मू, लद्दाख और कश्मीर घाटी की जनसंख्या भारत मे विलय का समर्थन करती थी। इस घटना ने मुस्लिम एकजुटता के सिद्धान्त को भी चोट पहुंचाई क्योंकि जम्मू और कश्मीर की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का विरोध करी और भारत मे विलय का समर्थन। नतीजा, भारत में विलय करने के लिए शेख अब्दुल्लाह को कश्मीर का कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस और चौधरी गुलाम अब्बास कश्मीर राजनीति में हाशिये पर आ गए। दूसरी तरफ राजा हरी सिंह अमृतसर की संधि को खत्म ना किए जाने पर अड़ गए और साथ ही अपने द्वारा जारी किए उस फरमान पर भी जिसमें कश्मीर की लड़की बाहरी लड़के से शादी करने पर संपत्ति से वंचित कर दी जाती है। हरी सिंह की जिद का और कश्मीर की स्वायत्ता का सम्मान करते हुये शेख अब्दुल्लाह ने जम्मू कश्मीर का भारत में विलय कराने का प्रस्ताव दिया।

27 अक्टूबर 1947 को राजा हरी सिंह ने अंगीकार पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए और कश्मीर का भारत मे विलय सुनिश्चित हुआ। इस अंगीकार पत्र के धारा 3 के द्वारा राजा ने ये भी प्रावधान किया के भविष्य मे इस अंगीकार पत्र को आधार बना कर डॉमिनियन सभा कानून बना सकती है लेकिन वो कानून तभी मान्य होगा जब राजा उस कानून पर अपनी सहमति दे। इसी धारा 3 में राजा हरी सिंह ने ये भी प्रावधान रखा के इस अंगीकार को भारत के भविष्य में लागू होने वाले संविधान के लिए प्रतिबद्ध नहीं माना जाएगा और कश्मीर का अपना एक अलग संविधान होगा, नागरिकता होगी। भारत सिर्फ रक्षा, बाहरी मामले और संचार के क्षेत्र में ही कानून बना सकता है, बाकी किसी भी मुद्दे पर कश्मीर कानून बनाने के लिए स्वतंत्र होगा। राजा हरी सिंह डोगरा शासन और कश्मीर की स्वायत्ता को लेकर ज्यादा चिंतित थे और इसीलिए अमृतसर की संधि और अपने फरमान जिसमें कश्मीरी लड़की को संपत्ति से वंचित किया जाना अगर वो बाहरी से शादी कर लेती है, को जीवित रखने का प्रयास किया। अक्टूबर 1949 में कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय संविधान सभा में भी चर्चा हुई। उस वक़्त धारा 370 नहीं थी, कश्मीर के विलय का मुद्दा धारा 306a के जरिए संविधान सभा रखा गया और चर्चा हुई। इस धारा 306a में सभी सदस्यों ने राजा हरी सिंह की बात का समर्थन किया और भारत को सिर्फ रक्षा मामले, विदेश और संचार के क्षेत्र में ही हस्तक्षेप करने का अनुमोदन किया।


इसी समय जब युद्ध जारी था, ऐसा माना जाता है के नेहरू संयुक्त राष्ट्र संघ मे कश्मीर का मुद्दा लेकर गए, संयुक्त राष्ट्र संघ ने यथापूर्व स्थिति की कश्मीर में घोषणा करी और एक अध्यादेश जारी किया जिसमें ये प्रावधान किया गया के कश्मीर मे एक जनमत संग्रह कराया जाए ताकि ये जाना जा सके के जनता भारत के साथ विलय चाहती है, पाकिस्तान के साथ या एक स्वतंत्र कश्मीर राज्य का निर्माण करना चाहती है। ये जनमत संग्रह आज तक नहीं कराया जा सका, भारत और पाकिस्तान अपने अपने तर्क रखते हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर की जनता क्या चाहती थी, आज तक जाना नहीं जा सका।


राजा हरी सिंह ने अपने पुत्र करण सिंह को कश्मीर का उत्तराधिकारी घोषित किया। करण सिंह ने सन 1951 में कश्मीर का संविधान बनाने के लिए कश्मीर में चुनाव की घोषणा की, इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस सभी 75 सीट पर विजयी हुई, जनता का पूर्ण समर्थन शेख अब्दुल्लाह को मिला।


सन 1952 मे शेख अब्दुल्लाह ने धारा 306a के अन्तरिम प्रावधान को स्थायी किया और भारतीय संविधान में धारा 370 को जोड़ा, जिससे कश्मीर का भारत में विलय सुनिश्चित हुआ। सन 1954 तक आते आते भारत ने रक्षा मामले, विदेश मामले और संचार के जितने भी प्रावधान भारतीय संविधान में विद्यमान थे वो सभी कानून जम्मू कश्मीर पर वैसे ही लागू किए गए जैसे भारत में लागू थे। धारा 370 और कश्मीर की स्वायत्ता पर पहला प्रहार।


इसी समय सन 1953 मे राजा करण सिंह ने शेख अब्दुल्लाह को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया, आरोप था के अब्दुल्लाह सदन मे विश्वासमत खो चुके हैं, और बिना बहुमत साबित करने का मौका दिये शेख अब्दुल्लाह को पदमुक्त कर दिया गया। सन 1953 में शेख अब्दुल्लाह को कश्मीर के खिलाफ षड्यंत्र करने के आरोप मे जेल भेज दिया गया, उन पर पाकिस्तानी समर्थक होने का आरोप लगाया गया और पाकिस्तान से मदद लेकर कश्मीर मे अशांति फैलाने का आरोप लगा, तर्क था के अब्दुल्लाह कश्मीर का पाकिस्तान में विलय करवाना चाहते हैं। अब्दुल्लाह को पदमुक्त करके बक्शी गुलाम मोहम्मद को प्रधानमंत्री बनाया गया। गुलाम मुहम्मद की सरकार ने अब्दुल्लाह को उनके खिलाफ लगे आरोपों के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया। प्रधानमंत्री नेहरू को शेख अब्दुल्लाह के खिलाफ सुबूत दिखाये गए जिसको देखकर नेहरू असमंजस मे पड़ गए और अब्दुल्लाह की गिरफ्तारी के आदेश पर हस्ताक्षर किए। इन आरोपों की वजह से शेख अब्दुल्लाह 11 साल जेल में रहे और (1953 से 1964), इसी दौर में कई भारतीय कानून, जिसमें भारतीय दंड संहिता भी शामिल है, को कश्मीर में लागू किया गया। शेख अब्दुल्लाह पर मुकदमा भी भारतीय दंड संहिता के आधार पर ही चला, और 1963 में जब देश अब्दुल्लाह की सजा के ऐलान का इंतजार कर रहा था तब नेहरू और तत्कालीन कश्मीर के प्रधानमंत्री गुलाम मुहम्मद सादिक़ ने शेख अब्दुल्लाह पर लगे सभी इल्जामों को वापस ले लिया और केस खत्म हो गया।


कश्मीर की इसी स्थिति को देखते हुये रक्षा, विदेश और संचार से संबन्धित समस्त भारतीय कानून कश्मीर पर लागू किए गए। इसके साथ ही साथ सन 1954 तक भारत के कुछ और कानून भी कश्मीर में लागू किए गए, जिसका विरोध हरी सिंह ने किया था और धारा 370 भी इन क़ानूनों को कश्मीर पर लागू करने से रोक लगाती है। भारत की यूनियन लिस्ट में वर्णित सभी कानून कश्मीर पर लागू किए गए और सन 1954 के एक आदेश से मौलिक अधिकारों को, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को सुरक्षा के नाम पर लागू किया गया। धारा 370 ऐसे किसी भी कानून को कश्मीर पर लागू करने की कोई बात नहीं करती है। कुल मिलाकर दस साल से भी कम समय में भारत के कई कानून और संविधान की विभिन्न धाराओं को कश्मीर पर लागू किया गया। कभी विदेश, कभी रक्षा और कभी संचार का हवाला देकर। इन सभी क़ानूनों को जम्मू कश्मीर की विधानसभा ने अनुमोदित भी किया, अकेले न राष्ट्रपति ने ना ही संसद के किसी भी अध्यादेश ने कोई भी कानून घाटी में लागू किया। सन 1957 में कश्मीर विधान सभा, जिसके प्रमुख बक्शी गुलाम मुहम्मद थे, ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया। इससे साफ जाहिर होता है के कश्मीर कभी भी खुद को भारत से अलग नहीं समझा। कश्मीर की जनता को नेहरू के नेतृत्व और भारतीय राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर पूरा भरोसा था। कुछ समय के अंदर ही कई और भारतीय कानून भी कश्मीर पर लागू किए गए, जिनका धारा 370 पूरी तरह से निषेध करती है। इनमें प्रमुख हैं, केंद्रीय प्रशासनिक सेवाओं का लागू किया जाना, सन 1964-65 में धारा 356 और 357 को लागू किया जाना (जिसका प्रयोग 1980 के दशक में हुआ और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया), धारा 249 के जरिये भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर राज्य मामलों की प्रांतीय सूची में से भी कानून बनाने का अधिकार मिला, अन्य राज्यों की तरह। धारा 370 सिर्फ नाम के लिए ही रह गई और जिन प्रावधानों के साथ ये लागू की गई थी, 1970 का दशक आते आते लगभग सभी प्रावधान अपना महत्व खो चुके थे। धारा 370 के अनुसार भारतीय संसद रक्षा, विदेश और संचार के अलावा भी कश्मीर के किसी मुद्दे पर कानून बना सकती है, लेकिन जम्मू कश्मीर की संविधान सभा का अनुमोदन आवश्यक है, जिसे बाद मे जम्मू कश्मीर संविधान सभा खत्म कर देने के बाद जम्मू कश्मीर विधान सभा माना गया। ये कश्मीर का और धारा 370 का आजादी के बाद का संक्षिप्त इतिहास है।


वहीं दूसरी ओर धारा 35a पर भी हमेशा से सवाल खड़े किए जाते हैं। धारा 35a सन 1954 में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने एक अध्यादेश के जरिए संविधान की धारा 370 में जोड़ा इस अध्यादेश की सिफ़ारिश तत्कालीन नेहरू सरकार ने करी थी। धारा 370 में स्थाई नागरिक का प्रावधान नहीं था, जिसकी वकालत राजा हरी सिंह और बाद मे कश्मीर की कई राजनीतिक पार्टियों ने करी। धारा 35a कश्मीर को ये अधिकार देता है के वो अपने स्थाई नागरिकों की पहचान कर सके। इस धारा के तहत स्थाई नागरिक उसे माना जाएगा जो मई 14 1954 तक राज्य के नागरिक होने का दर्जा प्राप्त कर चुका/चुकी है, या कम से कम 10 साल से कश्मीर का निवासी है और कानूनी तरीके से कोई जमीन/जायदाद खरीद चुका है/चुकी है। इस धारा को भी दक्षिणपंथी असंवैधानिक मानते हैं और धारा 370 की तरह ही इसे भी हटाने का पुरजोर समर्थन करते आए हैं।

धारा 370 पर तथ्यों की चर्चा करी गई, यहाँ ये बताना आवश्यक है के भारत एक बहुसंस्कृति विशेषता लिए संघीय प्रणाली वाला देश है, भारत की खूबसूरती एक भाषा, एक संस्कृति, एक जैसा इतिहास, एक जैसी पहचान इत्यादि में नहीं है, बल्कि भारत की पहचान उसकी इसी बहुलता में है। भारत कोई यूरोपियन या पश्चिमी राज्य नहीं है, जहां सबको एक नजर से देखा जा सकता है, या एक विचारधारा, एक संस्कृति, एक भाषा इत्यादि थोपी जा सकती। भारत विश्व में औपनिवेशिक काल से पहले से ही विविधताओं का सम्मान करने वाले देश के रूप में ही जाना जाता है। आजादी के बाद भारत गरीब था, बहुत गरीब। देश के सामने सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद, विकास इत्यादि की प्रमुख समस्याएँ थीं। देश को इन सभी समस्याओं से आजाद करने के लिए भारत ने विविधताओं का सम्मान करते हुये एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक राज्य की स्थापना करी। उस समय कई विचारकों का ये मानना था के कोई गरीब और विविधताओं से भरा देश प्रजातांत्रिक व्यवस्था सम्हाल ही नहीं सकता, और बिखर जाता है। भारत के बारे मे भी यही कयास लगाए थे के भारत में संसदीय लोकतन्त्र भीडतन्त्र में बदल जाएगा, प्रजातन्त्र की जगह तानाशाही शासन या सेना का राज्य स्थापित हो जाएगा, भारत विभिन्न टुकड़ों मे बट जाएगा इत्यादि। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसका कारण नेहरू की नीतियाँ थीं। नेहरू ने संवैधानिक प्रावधानों के जरिए सभी विविधताओं को जगह दी, और उसपर अमल भी किया, राज्य पुनर्गठन अधिनियम इसी समाहित करने की नीति का हिस्सा था जिसमें इन सभी राज्यों को उनकी विविध संस्कृतिओं, भाषाओ इत्यादि के आधार पर पुनर्गठित किया गया। भारत का विकास करने के लिए पंचवर्षीय योजना, योजना आयोग, भारी उद्योग इत्यादि का प्रावधान किया और विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करते हुये भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया। भारत अपनी इसी विशिष्टता की वजह से आज विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश बना है।


धारा 370 और कश्मीर: मिथक


सिर्फ धारा 370 के जरिए कश्मीर को विशिष्ट पहचान नहीं दी गई, बल्कि देश के कई राज्यों मे ऐसे प्रावधान हैं, ऊपर धारा 370 के इतिहास और तथ्य बताए गए, लेख का अगला हिस्सा भारत मे फैलाये गए कई मिथकों से पर्दा हटाता है।


पहला मिथक: धारा 370 कश्मीर को एक विशिष्ट दर्जा देता है और कोई भी भारतीय कानून वहाँ लागू नहीं होते क्योंकि कश्मीर का अपना संविधान है। सत्य ये है के भारत के लगभग सभी कानून कश्मीर पर लागू किए जा चुके हैं, केंद्र लिस्ट के 97 में से 94 मामले कश्मीर पर लागू हो चुके हैं और समवर्ती सूची के 47 में से 26 मामले कश्मीर पर लागू किए जा चुके हैं।


दूसरा मिथक: विशिष्ट राज्य का दर्जा केवल कश्मीर को मिला है, ये मिथक है। भारत में कई राज्यों को विशिष्ट राज्य का दर्जा दिया गया है। भारत में गवर्नर को नाममात्र का प्रधान माना जाता है, लेकिन धारा 371 में, जो 1956 के संवेधानिक संशोधन से अस्तित्व में आई, गवर्नर को कुछ विशिष्ट अधिकार देती है, जिसमें गुजरात के गवर्नर के पास सौराष्ट्र और कुच्छ में तथा महाराष्ट्र के गवर्नर के पास विदर्भ और मराठवाड़ा तथा बाकी कम विकसित क्षेत्रों में विकास बोर्ड बनाने का अधिकार है, ताकि इन क्षेत्रों का विकास किया जा सके। श्री नरेंद्र मोदी कई साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, उन्होने इस प्रावधान को खत्म क्यों नहीं किया? और ना ही बी जे पी शासित महाराष्ट्र ने ही इस प्रावधान को खत्म करने का कोई प्रयास किया। ये विकास भी देशवासियों द्वारा दिये जा रहे टैक्स से ही होता है, इसे अतिरिक्त भार समझ कर समाप्त करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया? और अगर ऐसा कोई कदम उठाया जाता है तो इन दो बी जे पी शासित क्षेत्र के लोग चुप रहेंगे? ये प्रावधान सीधे मुख्यमंत्री और कैबिनेट की शक्ति को भी इन क्षेत्रों मे सीमित करता है, इस तरह का प्रावधान भारत के किसी भी अन्य राज्य में नहीं है।


तीसरा मिथक: जमीन पर स्वामित्व एवं संपत्ति सुरक्षा, कश्मीर अकेला राज्य नहीं है जिसे ये अधिकार मिला है। सन 1986 में 55 वें संवेधानिक संशोधन द्वारा धारा 371 में खंड 3 जोड़ा गया जिसमें ये प्रावधान किया गया के भारतीय संसद द्वारा बनाए गए जमीन पर स्वामित्व अथवा हस्तांतरण का कोई भी कानून मिजोरम राज्य पर लागू नही होगा। अर्थात बाहरी कोई भी व्यक्ति मिजोरम में ना जमीन खरीद सकता/सकती है ना ही मिजोरम का कोई व्यक्ति अपनी किसी भी अचल संपत्ति का हस्तांतरण कर सकता/सकती है। बी जे पी इस संशोधन की भागीदार थी और इसका समर्थन किया था। फिर यही बी जे पी जम्मू कश्मीर के जमीन पर स्वामित्व और बाहरी द्वारा खरीदने पर रोक की विरोधी क्यों है? क्या मिजोरम से भी ये कानून हटाया जाएगा? अगर हटाया गया तो क्या जनता इसको राष्ट्रहित में उठाया गया कदम मानकर स्वीकार कर लेगी?


चौथा मिथक: धारा 370 बाहरी व्यक्ति के जमीन खरीदने पर रोक लगाती है। जी ये एक मिथक है, धारा 370 में जमीन, उस पर स्वामित्व, या हस्तांतरण पर कुछ नहीं है, जमीन पर स्वामित्व डोगरा राजा गुलाब सिंह और अंग्रेजों के मध्य हुई अमृतसर की संधि से लागू है। धारा 370 जमीन या उस पर मालिकाना हक़ की कोई बात नहीं करती है। ये प्रावधान सन 1954 में धारा 35a के साथ आया। राजा हरी सिंह, उनके उत्तराधिकारी करण सिंह, नेशनल कॉन्फ्रेंस इत्यादि इस मसले का समाधान चाहते थे इसलिए 35a को संविधान में जोड़ा गया। जब मिजोरम का कानून सही है, जो बी जे पी द्वारा समर्थित था तो कश्मीर का 35a गलत किस आधार पर हुआ?


इसके अतिरिक्त धारा 371A नागालेंड; 371B असम के ट्राइबल इलाके; 371C मणिपुर; 371D, आंध्र प्रदेश; 371F, सिक्किम; 371H; अरुणाचल प्रदेश; 371I गोवा; 371J कर्नाटक को विशिष्ट अधिकार देते हैं। धारा 371 में कुल 12 राज्य हैं जिन्हें या तो राज्य के किसी क्षेत्र का विकास, जमीन पर स्वामित्व का अधिकार, बाहरी व्यक्ति के जमीन जायदाद खरीदने पर रोक या किसी अन्य विशिष्ट प्रावधान से संबन्धित है। कुछ और भी विशिष्ट प्रावधान किए गए हैं, आपको अपने ही देश के कुछ राज्यों में घूमने के लिए या जाने के लिए लिखित रूप में आज्ञा लेनी पड़ती है, जिनमे हिमाचल प्रदेश, मिज़ोरम, नागालेंड एवं अंडमान निकोबार आइलेंड प्रमुख हैं। अंडमान और निकोबार आइलेंड के वासियों ने तो अभी हाल ही में एक बड़ा आंदोलन चलाया था जिसमें भारत के दूसरे हिस्से से आने वाले लोगों पर नियम सख्त करने की मांग प्रमुख थी। कश्मीर के सिर्फ लेह क्षेत्र को छोड़कर किसी भी राज्य का वासी बिना आज्ञा लिए जम्मू-कश्मीर घूमने जा सकता/सकती है।


पांचवा मिथक: कश्मीर की लड़की अगर किसी भारत के अन्य राज्य में शादी कर ले तो उसका जमीन पर मालिकाना हक़ खत्म हो जाता है, नागरिकता खत्म हो जाती है, और अगर वो पाकिस्तानी लड़के से शादी कर ले तो उस पाकिस्तानी लड़के को कश्मीर की नागरिकता भी मिल जाती है और स्वतः जमीन पर मालिकाना हक़। ये भ्रांति आजकल मीडिया, सोश्ल मीडिया पर खूब छाई हुई है, जो पूरी तरह से झूठ है और निराधार है। सच ये है के कश्मीरी लड़की अगर भारत के किसी अन्य राज्य में शादी करती है तो जमीन पर उसका मालिकाना हक़ समाप्त नहीं होगा, ना ही नागरिकता, सन 2002 में जम्मू-कश्मीर सरकार vs शीला साहनी मामले में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने एक निर्णय दिया था जिसमें न्यायालय ने ये साफ किया के कश्मीर की लड़की अगर किसी बाहरी व्यक्ति से शादी करती है तो ना तो जमीन से उसे बेदखल किया जा सकता है और ना ही उस लड़की की कश्मीरी नागरिकता समाप्त होगी, लेकिन उस लड़की के बच्चों को इन दोनों से वंचित किया जा सकता है (मतलब के ये बाध्यकारी नही है)। दूसरे कश्मीर की लड़की अगर किसी भी बाहरी लड़के से शादी कर लेती है तो धारा 35a (जिसे अब खत्म कर दिया गया है) के अनुसार लड़के को ना तो कश्मीर की नागरिकता मिलेगी ना ही जमीन पर स्वामित्व। वो लड़का चाहें भारत के किसी दूसरे राज्य का हो या पाकिस्तानी या अमेरिकन। उम्मीद है इस भ्रांति से पर्दा हट गया होगा।


छठा मिथक: कश्मीर भारत का सबसे पिछड़ा राज्य है। ये भी एक भ्रामक प्रचार है, कश्मीर कई मामलों मे देश के कई दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से बहुत आगे है। भारत के कुल 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में कश्मीर का 15वां नंबर है, पोषण में 24वां, शिशु मृत्यु दर में 21वां, स्कूल जाने में 15वां, खाना पकाने की गैस में 21वां, स्वच्छता में 19वां, पीने की पानी में 34वां, बिजली के मामले में 25वां, घर स्वामित्व में 23वां, संपत्ति में 18वां। कश्मीर पर मुस्लिम बहुल होने के कारण जनसंख्या में तीव्र बढ़ोतरी का बात कही जाती है, जबकि वहाँ प्रजनन दर केरल से भी कम है, सिर्फ 1.6 प्रतिशत। प्रति व्यक्ति राज्य का सकल घरेलू उत्पाद भी देश के कई राज्यों से काफी अच्छा है, कश्मीर देश में 11वें नंबर पर है।


सातवाँ मिथक: सरदार पटेल ने, अंबेडकर ने और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 का विरोध किया था। नहीं, तीनों मे से किसी भी नेता ने ना कश्मीर के भारत में विलय का विरोध किया था और ना ही धारा 370 की आलोचना करी थी। हालांकि शुरू में पटेल कश्मीर का पाकिस्तान में विलय का समर्थन करे थे, लेकिन कुछ समय के बाद नेहरू के साथ मिलकर उन्होने कश्मीर का भारत में विलय करवाया और धारा 370 का समर्थन भी किया। जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों को भी नेहरू और पटेल ने मिलकर भारत मे शामिल कराया। धारा 370 पर पटेल के दिल्ली निवास मे 15 और 16 मई 1949 को बैठक हुई थी, इस बैठक का अनुमोदन नेहरू ने किया था और शेख अब्दुल्लाह भी इसमें शामिल थे। बैठक के बाद श्री एन जी अयंगर ने धारा 370 की रूपरेखा तैयार करी जिसे उन्होने नेहरू के निर्देशन पर सबसे पहले पटेल के पास भेजा, उन्होने पटेल को अवगत भी किया के नेहरू इस ड्राफ्ट पर तभी आगे बढ़ेंगे जब पटेल को इस ड्राफ्ट के किसी भी भाग से कोई आपत्ति ना हो, पटेल ने धारा 370 के इस ड्राफ्ट का समर्थन किया तब नेहरू ने इसे सदन मे वाद विवाद के लिए रखा। कुछ समय बाद नेहरू, पटेल और शेख अब्दुलह की आपसी सहमति से धारा 370 कश्मीर में लागू की गई।


श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी धारा 370 के प्रबल समर्थक थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो जन संघ (आज की भारतीय जनता पार्टी) के अध्यक्ष थे, ने नेहरू और शेख अब्दुल्लाह को 9 जनवरी 1953 में पत्र लिखा था जो प्रजा परिषद ने प्रकाशित भी किया था, (प्रजा परिषद एक राजनीतिक दल था जिसे आर एस एस से जुड़े बलराज मंढोक ने जम्मू में बनाया था)। इस पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर का भारत मे विलय का स्वागत किया था और धारा 370 पर भी अपना समर्थन दिया था। सन 1963 में प्रजा परिषद का भारतीय जन संघ मे विलय हुआ। प्रजा परिषद जम्मू कश्मीर के भारत मे विलय का तो समर्थन कर रही थी लेकिन धारा 370 का विरोध। प्रजा परिषद सिर्फ कश्मीर को विशिष्ट राज्य का दर्जा दिलवाना चाहती थी लेकिन जम्मू और लेह लद्दाख को धारा 370 से अलग रखने की पक्षधर थी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी इसी तरह के विलय समर्थन करते थे, लेकिन नेहरू और शेख अब्दुल्लाह के जवाबी पत्र ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना मत बदलने के लिए प्रेरित किया। खासतौर से शेख अब्दुल्लाह ने जो पत्र मुखर्जी को लिखा था उससे वो ज्यादा आश्वस्त हुये और धारा 370 पर प्रजा परिषद का आंदोलन भी खत्म करवाया। हालांकि प्रजा परिषद को नाम मात्र के लोगों का समर्थन हासिल था, जम्मू, लद्दाख की बड़ी जनसंख्या धारा 370 के समर्थन में थी, लेकिन नेहरू की समाहित करने की और आलोचना का स्वागत करने की नीति की वजह से मुखर्जी और प्रजा परिषद के विरोध को सुना गया और मुखर्जी और प्रजा परिषद के संशय को दूर किया गया। नतिजन मुखर्जी और प्रजा परिषद ने धारा 370 पर अपना समर्थन दिया। लेकिन जब बलराज मंढोक ने जन संघ का दमन थामा और प्रजा परिषद का जन संघ मे विलय किया तब आर एस एस ने नागपुर से दुबारा धारा 370 का विरोध शुरू किया, जो आजतक जारी है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी धारा 370 की महत्ता समझ चुके थे और अपने ही दल के लोगों को इसकी उपयोगिता बता रहे थे। तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 का कभी विरोध नहीं किया जैसा के प्रचार किया जा रहा है।


अंबेडकर के संविधान सभा में दिये गए किसी भी भाषण में, या उनके द्वारा कश्मीर मुद्दे पर लिखे हुये किसी भी पत्र या लेख में धारा 370 का विरोध कहीं नजर नहीं आता। कुछ समय बाद जब अंबेडकर की मृत्यु हो गई थी, तब एक वक्तव्य उनके नाम पे प्रचारित होना शुरू हुआ, ये वक्तव्य था के “आप (कश्मीर) चाहते हैं के भारत आपकी सीमाओं की सुरक्षा करे, सड़कें बनाए, खाने पीने की वस्तुओं की आपूर्ती करे लेकिन भारत की सरकार बहुत सीमित शक्ति रखती है। मैं कानून मंत्री होने के नाते ऐसे किसी भी विचार का विरोध करता हूँ, भारत सिर्फ रक्षा, विदेश और संचार के मामलों मे ही हस्तक्षेप करेगा।


यहाँ मजेदार बात ये है के अंबेडकर ने ऐसा कुछ कभी कहा ही नहीं, आर एस एस से प्रभावित एक पत्रिका तरुण भारत में एक लेख छपा था जो बलराज मंढोक के एक साक्षात्कार पर आधारित था, बलराज मंढोक ने तरुण भारत पत्रिका को दिये इसी साक्षात्कार में अंबेडकर के नाम लेकर ऊपर लिखी बाते कहीं। मतलब बलराज मंढोक ने साक्षात्कार में वो बातें कही जो अंबेडकर द्वारा कभी कही ही नहीं गई और मंढोक के इस वक्तव्य को इतना फैलाया गया के आज ये सत्य बन के खड़ा है। झूठ बोलने की परंपरा आज की नहीं है, 70 सालों से अनवरत चली आ रही है।


आठवाँ मिथक: कश्मीर समस्या नेहरू की देन है। ये आरोप आर एस एस, जन संघ और बी जे पी नेहरू पर शुरू से लगाते आए हैं। कश्मीर अगर आज भारत का अंग है तो इसमे नेहरू का योगदान सबसे ज्यादा है। हाँ नेहरू की आलोचना की जा सकती है, ये कहा जा सकता है के नेहरू ने लॉर्ड माउण्टबेटन की कश्मीर की मदद करने की बात सशर्त क्यों मानी? वो बिना कश्मीर को भारत मे मिलाये कश्मीर को सैनिक मदद दे सकते थे क्योंकि कश्मीर माउण्टबेटन प्लान के तहत अपने आप को स्वतंत्र देश बनाना चाहता था और इस आशय की कश्मीर के राजा घोषणा भी कर चुके थे। उनकी आलोचना की जा सकती है के बिना खुद खोजबीन करवाए करण सिंह और बक्शी गुलाम मुहम्मद के आरोपों को सही क्यों माने, जो दस्तावेज़ उन्हे दिखाये गए उसकी प्रामाणिकता नेहरू ने खुद क्यों नहीं चेक करी और शेख अब्दुल्लाह की गिरफ्तारी के आदेश पर क्यों हस्ताक्षर किए, फिर अचानक अब्दुल्लाह पर लगे सभी आरोपों को क्यों हटा लिया और उन्हे 11 साल बाद जेल से आजादी मिली।

कहा जाता है के नेहरू कश्मीर का मुद्दा लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ गए और आज जो कश्मीर की समस्या है वो नेहरू की ही दें है। वैसे एक सोचने वाली बात है, या तो नेहरू राजा हरी सिंह को मदद करने से ना बोल देते या नेहरू कश्मीर को आजाद मुल्क मानकर बिना शर्त मदद दिये होते तो आज ये आरोप ही ना होते और नेहरू कभी भी अपनी सेना को वापस बुला सकते थे। अगर मगर के इस दौर में इस मुद्दे को भी अगर मगर से दूर क्यों रखा जाये?


कश्मीर का मुद्दा नेहरु अकेले संयुक्त राष्ट्र संघ लेकर नहीं लेकर नहीं गये थे, उस समय की पूरी केबिनेट इस मसौदे का हिस्सा थी जिसमें भीमराव अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बलदेव सिंह शामिल थे। इसके अतिरिक्त ये माना जाता है के लॉर्ड माउण्टबेटन, फ़्रांस, अमेरिका, रूस इत्यादि ने भारत के पक्ष का समर्थन किया था और नेहरू को आश्वस्त किया था के संयुक्त राष्ट्र संघ में वो भारत के साथ खड़े रहेंगे, भारत को उस समय तुरंत आजादी मिली थी, देश में सांप्रदायिक दंगे फैले हुए थे, जिनको रोकने का जिम्मा नेहरू पर ही था, और पाकिस्तान से लड़ाई। भारत आजादी के समय बहुत गरीब था, देश के पास इतना भी अन्न नहीं था के समस्त देशवासियों की खाद्यान मांग को पूरा किया जा सके। ऐसी परिस्थिति मे युद्ध भारत पर एक बड़ा आर्थिक बोझ लेकर आया, जब भारत को लगता के पाकिस्तानी सेना या काबाइलियों को भागा दिया गया है वो वापस आ जाते थे, युद्ध में पाकिस्तान बार बार हारकर भी बार बार हमले कर रहा था। घरेलू समस्याओं और युद्ध की वजह से माउण्टबेटन की सलाह मानते हुये नेहरू संयुक्त राष्ट्र में गए, वहाँ नेहरू को धोखा मिला और जो वादा किया गया था के पाकिस्तानी सेना या काबाइलियों को कश्मीर से हटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ कोई कदम उठाएगा, और उस कदम पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस भारत के पक्ष मे खड़े होंगे और आर्थिक/सैनिक मदद देंगे, लेकिन इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर में जनमत संग्रह का फरमान दे दिया, ताकि कश्मीरी जनता के मूड का पता चल सके के वो वास्तविक रूप में चाहती क्या है। नेहरू ने और शेख अब्दुल्लाह ने स्वीकार भी कर लिया लेकिन पाकिस्तान टालमटोल करता रहा , ये जनमत संग्रह आज तक नहीं हो पाया है। और संयुक्त राष्ट्र के यथास्थिति वाले नियम के तहत पाकिस्तान कश्मीर के हिस्से पर क़ाबिज़ हो गया जिसे आज पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है।


नौवाँ मिथक: धारा 370 को पूरी तरह से हटा दिया गया है। नहीं धारा 370 को हटाया नहीं गया है, ना ही हटाया जा सकता है। अगर धारा 370 को हटाया जाएगा तो इसके बदले एक नई धारा को संविधान मे जोड़ना होगा ताकि कश्मीर भारत का अंग बना रहे। धारा 370 को हटाये जाने का मतलब होगा के भारत कश्मीर को एक आजाद मुल्क मानता रहा है और इस धारा को हटाकर कश्मीर को आजाद मुल्क घोषित कर दिया गया है। तो धारा 370 हटी नहीं है जैसा कि प्रचार किया जा रहा है, बल्कि इसी धारा के खंड तीन का प्रयोग करके जम्मू-कश्मीर-लद्दाख को अलग कर दिया गया है। लद्दाख बिना विधानसभा के केन्द्र्शासित क्षेत्र बनाया गया है, और जम्मू-कश्मीर को विधानसभा के साथ केन्द्र्शासित प्रदेश घोषित किया गया है। भविष्य में अगर ये नियम ऐसा ही रहा तो ये विधानसभा लगभग उसी प्रजा सभा की तरह होगी जो राजा हरी सिंह ने बनाई थी और जो दंतविहीन थी। दिल्ली की विधानसभा या किसी दूसरे केन्द्र्शासित क्षेत्र की विधानसभा से भी कम शक्तिशाली।


चलते चलते कुछ विश्लेषण, धारा 370 एक अस्थाई प्रावधान था, जो कश्मीर की संविधान सभा के 1957 मे खत्म होते ही स्थायी हो गया और इसी समय कश्मीर की संविधान सभा ने भी एकमत से भारत मे विलय का अनुमोदन किया। भारत ने जितने भी कानून कश्मीर पर लागू किए, वो चाहें केंद्र सूची के हों, परिशिष्ट सूची के या प्रांतीय सूची के, इन सभी पर जो कानून लागू किए गए उनको जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने अनुमोदित किया और पास किया। भारतीय संसद किसी भी तरीके से या सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश से धारा 370 में कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकती है, इसके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा का अनुमोदन आवश्यक है। किसी भी राज्य का गवर्नर उस राज्य की जनता का प्रतिनिधि नहीं होता क्योंकि वो जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं चुना जाता तो कश्मीर के गवर्नर को आवाम की आवाज नहीं माना जा सकता, ये प्रक्रिया पूरी तरह से असंवैधानिक है और कोई भी कश्मीरी नागरिक इसको कोर्ट में चुनौती दे सकता/सकती है। इसके लिए उस व्यक्ति को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास जाने की भी जरूरत नहीं है। कोर्ट धारा 370 पर बने नए नियम को असंवैधानिक घोषित कर सकती है, इसको संविधान की मूल संरचना में डाल सकती है और इस नए नियम को पूरी तरह से खत्म कर सकती है, क्योंकि संविधान धारा 370 को लेकर कश्मीर में कोई कानून बनाने के लिए एक पूरी प्रक्रिया की व्याख्या करता है, आज के इस मामले में एक भी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, यहाँ तक कि ना संसद में और ना ही कश्मीर की विधानसभा में इस मुद्दे पर कोई चर्चा ही की गई। कानून या संविधान के जानकार इस मुद्दे पर ज्यादा अच्छे से संवैधानिक प्रावधानों को रख सकते हैं। दूसरे, जिस दिन चुनाव घोषित हुये और जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सदन में इस नए नियम के विरुद्ध प्रस्ताव पास कर देती है तब भी ये नया प्रावधान खत्म हो जाएगा। इसीलिए बी जे पी को परिसीमन कराने की जल्दी है ताकि जम्मू में सीटों की संख्या बढ़ जाये और उसके उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा में इस आशय का कोई प्रस्ताव पास ही ना होने दे। लेकिन खुद बी जे पी की प्रदेश यूनिट, हिन्दू, सिक्ख और बौद्ध जमीन पर स्वामित्व, कश्मीर राज्य को मिले हुये विशेष दर्जे को खत्म नहीं करवाना चाह रहे है। ये वर्तमान बी जे पी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, हो सकता है आने वाले समय मे इस नए नियम में कुछ बदलाव देखे जाएँ।


संसद मे झूठ बोला गया के कश्मीर मे किसी भी क्षेत्र में विकास नहीं हुआ, लेख में ऊपर डाटा दिया गया है, कश्मीर में अगर मान भी लिया जाये के विकास नहीं हुआ है तो विकास धारा 370 को निष्प्रभावी किए बिना भी किया जा सकता है, ना कश्मीर की जनता कुछ बोलेगी, ना कोई नेता। राजनीतिक अनैतिकता आपको लड्डू खिला रही है उस बात पर जो वास्तविकता से कोसो दूर है। कश्मीर में सिर्फ पूँजीपति निवेश नहीं कर पाये हैं और ना ही प्रचुर मात्रा में जो प्राकृतिक संसाधन हैं उनका दोहन करके मुनाफा कमा पाएँ हैं, कोई ताज्जुब नहीं अगर कश्मीर की जमीन ये पूंजीपति खरीदें या उन्हे लीज पर मिले ताकि मुनाफा कमा सकें। आप कश्मीर में चाहकर भी जमीन जायदाद नहीं खरीद पाएंगे। 35a इसीलिए हटाया गया है। लेकिन इसके लिए कानून व्यवस्था और सीमा पार आतंकवाद खत्म करना होगा, और देश के सैनिक सीमाओं के साथ साथ इन पूँजीपतियों और इनकी संपत्ति की भी सुरक्षा करेंगे, आप ही के दिये टैक्स से।


कई पत्रकार अचानक से कश्मीरी महिलाओं के लिए चिंतित हो गए हैं, उनका मानना है के कश्मीर में शरीयत का कानून चलता है जिसका दुष्परिणाम महिलाओं को भुगतना पड़ता है, हालांकि ऐसा कभी कोई मामला प्रकाश में ये पत्रकार ला नहीं पाये हैं, चलिये कश्मीरी महिला पर अत्याचार होता है, मान लेते हैं, तो जब देश के लगभग सभी कानून कश्मीर में लागू किए जा चुके हैं तो महिला सुरक्षा को लेकर भी कानून बना दिया जाता और लागू कर दिया जाता, जम्मू-कश्मीर की विधानसभा भी विरोध नहीं करती, इस के लिए धारा 370 को निर्जीव करने की और 35a हटाने की क्या जरूरत थी?


फिर यही जुझारू पत्रकार बताते हैं के कश्मीर को सबसे ज्यादा अनुदान दिया जाता है लेकिन अनुदान राशि जनता तक नहीं पहुँचती है। इन पत्रकारों का शोध कुछ मामलों में पूरा नहीं हो पाता और जो मामले बहुत सरल हों, उनपर ये पत्रकार ज्यादा शोध नहीं करते। कश्मीर की कुल जनसंख्या लगभग 1.25 करोड़ है, सेना, अर्धसैनिक बल इत्यादि की संख्या 6.5 लाख से 7.5 लाख है जिसमें अभी हाल ही में 28000 प्लस 10,000 (कुल 38000) सैनिक या अर्धसैनिक बल और भेजे गए। देश के एक छोटी सी जनसंख्या वाले राज्य में इतनी बड़ी फौज रखने के लिए पैसा तो भेजना पड़ेगा, तो जो पैसा भेजा जाता है उसका अधिकांश हिस्सा सैनिक और अर्धसैनिक बलों पर खर्च होता है, जो और बढ़ सकता है अगर वहाँ पूंजीपति निवेश करते हैं। तो कुल मिलाकर अनुदान वाली बात भी झूठ निकली, चलिये मान लेते हैं के केंद्र कश्मीर को बहुत ज्यादा अनुदान दे रहा है, 2014 में सरकार बी जे पी की आई जो 2019 में भी सरकार बनाने मे सफल रही, अनुदान अगर ज्यादा है तो वर्तमान सरकार ने इसको न्यायोचित क्यों नहीं बनाया?


अगर निवेश नहीं होने की बात है तब भी सरकार कश्मीरी विधानसभा और जनता को विश्वास में लेकर वहाँ पूंजी निवेश के लिए एक अध्यादेश ला सकती थी, मुझे नहीं लगता के इस कदम का कश्मीर में कोई विरोध करता, बिना धारा 370 को निर्जीव करे और 35a को हटाये भी पूंजीपतियों का कश्मीर में निवेश करना सुनिश्चित किया जा सकता था।


कुछ और आरोप कुछ पत्रकार लगाते हैं, जिनमें उन्होने देश को गहन शोध करने के बाद जानकारी दी के कश्मीर में दोहरी नागरिकता है, 370 की वजह से। और दूसरा ये के भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका का कोई भी निर्णय, या कानून की व्याख्या जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होती। ठगी का जाल चारों तरफ बिछा हुआ है, आप भी कितना बचेंगे, खैर, ये दोनों ही बातें भी तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, झूठ हैं, जिसे हमारे देश का मीडिया बड़े गर्व से आपको दिखा रहा है और परोस रहा है, आज की मीडिया से पत्रकारिता में नैतिकता की उम्मीद भी करना बेमानी है।


बहुत पीछे नहीं जाते हैं, सन 2016 में भारत की सर्वोच्च न्यायालय में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest (SARFAESI) Act, 2002 (SARFAESI Act) के तहत जम्मू-कश्मीर उच्च नयायालय में मुकदमा दर्ज किया जो कश्मीर की जमीन पर मालिकाना हक़ के जुड़ा था, उच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खिलाफ फैसला दिया और कहा के SARFAESI Act जम्मू कश्मीर के 1920 के संपत्ति के हस्तांतरण से संबन्धित कानून का उल्लंघन करता है इसलिए SARFAESI Act जो देश की संसद मे पास हुआ, ये एक्ट जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय के इस फैसले को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 2016 के फैसले में जम्मू-कश्मीर के फैसले को असंवेधानिक घोषित किया और कहा के उच्च न्यायालय ने जम्मू कश्मीर के संविधान के खंड 5 का हवाला देते हुये ये फैसला दिया है, खंड 5 जम्मू कश्मीर की विधानसभा को स्थायी नागरिकों और अचल संपत्ति पर कानून बनाने का अधिकार देता है और उच्च न्यायालय ने इसी को आधार मानकर जम्मू कश्मीर को अपने क्षेत्र मे संप्रभु (Sovereign) माना। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस फैसले को पलट दिया और कहा के “हम इसमें ये जोड़ते हैं के स्थायी नागरिक और अचल संपत्ति के मामले में जम्मू कश्मीर के नागरिकों को दोहरी नागरिकता वाला नागरिक नहीं माना जा सकता। भारत में एक ऐसा संघीय ढांचा है जहां दोहरी नागरिकता का प्रावधान है ही नहीं, इसीलिए जम्मू-कश्मीर के नागरिक भी भारत के ही नागरिक हैं, और उन पर दोहरी नागरिकता लागू नहीं होती। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस कथन को भी गलत माना जिसमें कहा गया था के भारत की संसद में बना कोई भी कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया जा सकता और भारतीय संसद द्वारा पारित SARFAESI Act को कश्मीर पर लागू किया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ये केस जीत गया और जम्मू कश्मीर में जो जमीन उसने ली थी उस पर बैंक का मालिकाना हक़ माना गया। 1950 के दशक से ही ऐसे कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है, यहाँ सभी पर चर्चा करना संभव नहीं है। 2016 का सर्वोच्च न्यायालय का ये निर्णय कई मिथकों से पर्दा उठाता है, पहला, सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी फैसला जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता, दूसरा, जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता है और तीसरा कोई बाहरी व्यक्ति या संस्था जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं ले सकती है। फिर देश की मीडिया झूठ क्यों फैला रही है? और क्या वर्तमान सरकार के पास 70 सालों मे सर्वोच्च न्यायालय ने कश्मीर के कौन कौन से और कितने विवादों का निबटारा किया, इसकी कोई जानकारी नहीं है? चलिये मान लेते हैं के वर्तमान सरकार के पास 70 सालों की सिर्फ राजनीतिक मामलों की जानकारी है, लेकिन उपरोक्त वर्णित केस का फैसला तो वर्तमान सरकार के ही काल में आया ना, तो क्या लगभग 2 साल पुराने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की भी कोई जानकारी सरकार को नहीं है? या वर्तमान सरकार सिर्फ राजनीतिक चुनावी मुद्दों तक ही सीमित है?


कुल मिलाकर जब धारा 370 और 35a का कोई संवैधानिक-कानूनी मतलब रह ही नहीं गया, जब ये दोनों प्रावधान सिर्फ नाम के लिए ही जुड़े हुये थे, जब सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले जम्मू-कश्मीर पर लागू किए गए, जब जम्मू-कश्मीर के लोगों के पास दोहरी नागरिकता है ही नहीं, जब धारा 370 से देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर कोई खतरा है ही नहीं, तब इन दोनों प्रावधानों को असंवेधानिक तरीके से निर्जीव करने और हटाने का औचित्य क्या है? क्यों लद्दाख को बिना विधानसभा दिये केंद्र शासित राज्य घोषित किया गया? क्यों जम्मू कश्मीर को दंतविहीन विधान सभा देकर उसे केंद्र शासित क्षेत्र बनाया गया?


लेकिन बी जे पी ने धारा 370 को निर्जीव किया, 35a को हटाया, ताकि उसके जिंगोईस्ट समर्थक खुशियाँ मना सकें, जिनको कश्मीर के लोगों से कोई लगाव नहीं है, बस कश्मीर-कश्मीर का राग अलापते हैं और दूसरा देश के बड़े उद्योगपति वहाँ निवेश कर सकें। आने वाले कुछ विधानसभा चुनावों में बी जे पी इस मुद्दे का फायदा भी लेगी। कश्मीर से या उसके विकास से कोई लेना देना नहीं है, सिर्फ अपना एजेंडा चलाना है ताकि सत्ता से भी दूर ना हों, पूँजीपतियों को मुनाफा भी हो और अपने जिंगोईस्ट समर्थकों को खुश भी रखा जा सके। अभी हाल ही में किसी एम एल शर्मा ने इस नए प्रावधान के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एक केस दायर किया है, ये आर एस एस से प्रभावित हैं और जब भी इन्हें लगता है के वर्तमान सरकार के किसी असंवैधानिक फैसले को कोर्ट में चुनौती का सामना करना पड़ सकता है तो ये बहुत कमजोर केस बना कर सर्वोच्च न्यायालय में एक पी आई एल (जनहित याचिका) दायर कर देते हैं। नतीजा कोर्ट मामले को रद्द कर देता है, और वर्तमान सरकार के असंवैधानिक फैसले संवैधानिक बन जाते हैं, राफेल विवाद में जो केस इन्होने फ़ाइल किया था और उस पर जो कोर्ट का निर्णय आया था वो जगजाहिर है।


उम्मीद है सभी झूठ से पर्दा उठ गया होगा लेकिन एक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर से भी पर्दा उठाना जरूरी है, इस मुद्दे को लेकर भी समाज में कई भ्रांतियाँ हैं, ये मुद्दा है कश्मीरी पंडितों का मुद्दा। किसी को एक पल में उसके घर से बेघर कर देने का दर्द कश्मीरी पंडितों से ज्यादा किसी ने शायद ही अनुभव किया हो। वो दौर जो 80 के दशक का अंत और 90 के दशक के अंत तक चला, त्रासदी, दुख, अवसाद से भरा था जहां आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाया, अत्याचार किया, मार काट करी। आज तक कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी मे बसाने के लिए किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। 80 के दशक के अंत का दौर और 90 के दशक तक पूरा भारत उथल पुथल के दौर से गुजर रहा था। राम जनम भूमि आंदोलन, मण्डल कमिशन, भूमंडलीकरण, जाति आधारित दंगे, आरक्षण के खिलाफ दंगे, देश की जर्जर अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई इत्यादि भारत के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़े थे। कश्मीर भी अछूता नहीं था, वहाँ आतंकवाद ने नए सिरे से सर उठाना शुरू किया। हालांकि कश्मीर में आतंकवाद 60 और 70 के दशक मे अल फतह नाम के संगठन ने शुरू करने की कोशिश करी लेकिन अल फतह सफल नहीं हुआ। आतंकवाद को कश्मीर में उपजाऊ जमीन 80 के दशक में मिली। उस समय केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन दिया था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (कश्मीर का एक आतंकवादी संगठन) ने कश्मीर में आजादी का नारा दिया और कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला गया। ये एक पागलपन था, इस पागलपन में सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं जो भी भारत के समर्थक थे उन्हें मारा गया। दूरदर्शन को सरकार का प्रवक्ता माना जाता था, इसलिए लासा कौल जो दूरदर्शन के निदेशक थे, मार दिये गए; मुसलमानों के धर्मगुरु मीर वाइज़ भी मारे गए क्योंकि उन्होने आतंकवादियों का समर्थन करने से माना कर दिया था। जज नीलकांत को मारा गया तो उसी समय मौलाना मदूदी भी मारे गए। बी जे पी के टीका लाल टपलू को मारा गया तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुहम्मद युसुफ भी आतंकवाद की भेट चढ़े। कश्मीरी पंडितों को मारा गया, सूचना विभाग के निदेशक पुष्कर नाथ हांडू मारे गए, पंडितों के विस्थापन का विरोध कर रहे हृदयनाथ को भी मार दिया गया, इन्हीं के साथ साथ इंस्पेक्टर अली मुहम्मद वटाली, कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुशीरूल हक़, पूर्व विधायक मीर मुस्तफा, अब्दुल गनी लोन भी आतंकवादियों द्वारा मारे गए। हजारों कश्मीरी पंडितों को मारा गया तो हजारों कश्मरी मुसलमानों को भी मारा गया। लेकिन क्या सारे कश्मीरी मुसलमान कश्मीरी पंडितों के विरोधी थे, जैसा भ्रम फैलाया जाता है? अगर ऐसा होता तो घाटी में मुस्लिम आबादी लगभग 96 प्रतिशत थी और कश्मीरी पंडित सिर्फ 4 प्रतिशत। आप अंदाजा लगा सकते हैं के अगर ये दावा सही होता तो कितने कश्मीरी पंडित बच पाते। पलायन क्यों हुआ? जबकि कई जगहों पर मुस्लिम कश्मीरी पंडितों के घरों के बाहर पहरा दे रहे थे और जब आतंकवादियों ने उन मुस्लिम्स को भी मारना शुरू किया जो पंडितों को बचा रहे थे तब कश्मीरी पंडितो ने पलायन शुरू किया। कश्मीर ही नहीं देश की फिज़ाओं मे आपसी भाई चारा और प्यार आज भी है, नफरत करने वाले या फैलाने वाले बहुत कम हैं।


इस आतंकवादी घटना में हजारों मुसलमानो को भी मारा गया, 50 से 60 हजार मुसलमान घाटी छोड़ने पर विवश हुये, कुछ हजार मुसलमान परिवारों को आतंकवादियों ने बंधक बनाया, उन परिवारों के साथ क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं। जो 50 या 60 हजार मुस्लिम कश्मीर से बाहर आए उन्हे शक की नजरों से देखा गया। हालांकि वो आतंकवाद के दबाव में या सरकारो की बेरुखी से भी कभी विद्रोही नहीं बने, कश्मीरी पंडितों को तो सरकार की सहानुभूति मिल गई, सरपरस्ती मिल गई लेकिन इन मुस्लिम परिवारों की आवाज आज तक कोई नहीं बन पाया। वो पार्टियां भी नहीं जो अपने को मुस्लिम की हितेशी घोषित करती हैं।


कश्मीर से जब कश्मीरी पंडितो का और मुस्लिम परिवारों का पलायन हो रहा था उस दौर में बी जे पी समर्थित विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, बी जे पी ने श्री जगमोहन को (जो बी जे पी के सक्रिय सदस्य थे और कई मुख्य पदों पर रह चुके थे साथ ही कुछ चुनाव भी जीते थे) कश्मीर का गवर्नर बनाया। आतंकवादियों को जैसा जवाब 60 और 70 के दशक में दिया गया वैसा जवाब ना जगमोहन ने दिया ना ही केंद्र में सरकार का समर्थन कर रही बी जे पी ने और सरकार ने दिया। बल्कि इन्होने कश्मीरी पंडितों का जम्मू मे पलायन करने में मदद करी। जिन केंपों में कश्मीरी पंडितों को रखा गया उन केंपों की हालत आज भी बदतर है। बाकी कश्मीरी पंडित देश के विभिन्न भागों मे या विदेश में बस गए। पलायन किए हुये मुस्लिम्स तो शायद कश्मीर को भूल चुके हैं क्योंकि देश उन्हे भूल चुका है। लोग उन मुस्लिम्स की शहादत को भी भूल गए हैं जिन्होने अपनी और अपने परिवार की जान देकर या तो कश्मीरी पंडितों को बचाया या उनके पलायन मे मदद करी। जिन कश्मीरी पंडितों का मुद्दा बी जे पी उठाती रहती है, वो समस्या दी हुई इसी दल की है। कुछ कश्मीरी पंडित बी जे पी में शुरू से थे या बाद मे शामिल हुये, लेकिन कश्मीरी पंडितों का एक बड़ा तबका आज भी कश्मीरियत को नहीं भूला है, ना ही वो मुसलमान भूले हैं। आज भी दोनों अपने घर वापस जाने का इंतजार कर रहे हैं। पिछले 5 सालों में कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया, और हम सभी जानते हैं के धारा 370 को निर्जीव करके या 35a को खत्म करके भी सरकार कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए कुछ नही करेगी।


वैसे एक सवाल पूछा जाता है जब कश्मीर में ये अत्याचार हो रहा था तब आप क्या कर रहे थे? ये सवाल किसी ने आर एस एस से पूछा कभी? जो आर एस एस आज पाकिस्तान से लड़ने के लिए, सैनिकों की मदद करने के लिए अपने स्वयंसेवकों को भेजने का दावा करती है, उसी आर एस एस के स्वयंसेवक उस दौर में क्या कर रहे थे जब देश को शायद सबसे ज्यादा उनकी सेवाओं की जरूरत थी, आर एस एस के स्वयंसेवक सैनिक बनकर क्यों आतंकवादियों के हमले का माकूल जवाब नहीं दिये जबकि केंद्र में बी जे पी समर्थित सरकार थी, ये स्वयंसेवक उस समय राम जनम भूमि के लिए देशव्यापी आंदोलन भी चला रहे थे, हिन्दू जागृति में लगे थे, फिर कश्मीरी पंडितों के मामले मे आँख कान क्यों बंद कर लिए? बी जे पी या आर एस एस ने कश्मीरी पंडितों की सहायता के लिए क्यों कोई प्रस्ताव पास नहीं करवाया? 5 साल जब नरसिंह राव की काँग्रेस सरकार थी तब बाबरी मस्जिद गिरा दी गई, यकीन मानिए जब नरसिंह राव बाबरी मस्जिद नहीं बचा पाये तो वो उस समय आर एस एस को अपने स्वयंसेवक कश्मीर भेजने से भी नहीं रोकते, देशहित में इससे बड़ा दूसरा काम और क्या हो सकता था? वर्तमान सरकार को ये समझना चाहिए के 70 सालों में इनका भी एक इतिहास रहा है।


370 को निर्जीव करने से पहले, 35a को खत्म करने से पहले सरकार ने हिंदुओं की पवित्र अमरनाथ यात्रा रद्द करी, जम्मू कश्मीर में इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइल सेवाएँ बंद करी, सैन्य बल बढ़ा दिया; अगर जम्मू कश्मीर के लोग, चाहे वो मुस्लिम हों, हिन्दू हों, सिक्ख हों या बौद्ध हों सरकार के इस कदम का समर्थन कर रहे थे तो सरकार को ये सब करने की क्या जरूरत थी? अगर सिर्फ मुस्लिम्स ही सरकार का विरोध करते तो सरकार को सिर्फ घाटी मे ही ये सब सेवाएँ बंद करनी चाहिए थीं। लेकिन सरकार ने पूरे जम्मू-कश्मीर-लद्दाख में ये सब किया, शायद सरकार कश्मीरियत का मतलब जानती है और आप नहीं जानते। आज जरूरत कश्मीरियों का दिल जीतने की है, उनसे वार्ता करने की है, गलतफहमियाँ दूर करने की है; कश्मीर की जमीन लेने की नहीं।





Dr Anurag Pandey

Assistant Professor

University of Delhi.

anuragspandey@yahoo.co.in



Disclaimer: The views and opinions expressed in this article are those of the authors and do not necessarily reflect the ideas of Magazine "Indian Democracy".



Important:

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.



0 views

©2019 by Indian Democracy. All Rights Reserved. 

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site and see our Terms and Condition page.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.