Anurag Pandey "कोरोना का कहर, मीडिया और बी जे पी"

Updated: Sep 12


कोरोना के कोहराम से बचने के लिए मास टेस्टिंग की जगह भारत सरकार सिम्टोमेटिक टेस्ट को प्राथमिकता क्यों दे रही है? ये लेख लिखे जाने तक भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 190 हो चुकी है, जिनमें विदेशी नागरिक भी हैं। वहीं दस मौत हो चुकी हैं। भारत और भारत की सरकार को कोरोना वायरस से निपटने के लिए या इस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए कुछ पुख्ता इन्तेज़ाम करने होंगे। क्या भारत ने वैसे इन्तेज़ाम किये हैं जो इस वायरस से लड़ने के लिए आवश्यक हैं? सरकार फिलहाल क्या मास लेवल पर कोरोना का टेस्ट करवा रही है? क्या हमारा मेडिकल तंत्र इतना मज़बूत है कि एक देशव्यापी न सही कम से कम उन क्षेत्रों में ही सभी हाउसहोल्ड का टेस्ट सुनिश्चित हो जहां 10 से ज़्यादा मामले आ चुके हैं? महाराष्ट्र, दिल्ली एनसीआर, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में कोरोना टेस्ट किस स्तर पर है?  पहला मामला‌ आने के बाद सरकार क्यों सावधान‌ नहीं हूई? उपरोक्त प्रश्नों‌ का‌ जवाब तलाश कीजिएगा तो पाइएगा कि सरकार कुछ नहीं कर‌ रही है। अब देखिए देश में पहला मामला कोरोना का जनवरी में आया था। यह केरल में की बात है लेकिन सरकार जागी नहीं। सरकार जागी फरवरी बीत जाने के बाद, लगभग मिड मार्च में लेकिन क्या स्कूल, कॉलेज, सामाजिक समारोह, सामाजिक दूरी बनाने पर ज़ोर, घर से काम करने का फरमान से क्या भारत को कोरोना से सुरक्षित किया जा सकता है? हाल ही में प्रधानमंत्री का देश के नाम संदेश आया जिससे सवाल उठता है कि जनता कर्फ्यू, थाली बजाओ जैसे नारे लगवाने पर क्या हम कोरोनो से लड़ाई जीत जाएंगे?  इसके लिए कौन से ठोस कदम उठाने पड़ेंगे? भारत ने अब तक क्या क्या किया? देश की मुख्य मीडिया क्या कर रही है? देश का सबसे तेज़ चैनल और उसके एंकर क्या कर रहे हैं? सत्ताधारी बीजेपी के कार्यकर्ता या नेता क्या कह रहे हैं? कोरोना को लेकर भारत की योजना कैसी है? भारत को कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ने के लिए एक पुख्ता योजना और दूसरे देशों से सीखने की ज़रूरत है। दरअसल कोरोना वायरस की टेस्टिंग को लेकर जिस प्लान पर भारत चल रहा है वह काफी नहीं है। भारत ने फरवरी से अब तक लगभग 12000 टेस्ट करवाए हैं, यह संख्या साउथ कोरिया जैसे देश से बहुत पीछे है। साउथ कोरिया अब तक लगभग ढाई लाख टेस्ट करवा चुका है। आप अंदाज़ा लगाइए कि भारत जैसा सघन जनसंख्या वाला देश कोरोना टेस्ट को लेकर कितना संवेदनशील है।  आखिर भारत की सरकार द्वारा कोरोना टेस्ट क्यों सिर्फ कुछ गिने चुने लोगों तक ही सीमित है? क्यों सरकार सिर्फ उन्हीं लोगों का टेस्ट करवा रही है जिनका विदेश भ्रमण का कोई इतिहास है या फिर उन लोगों का जो इन विदेश से लौटे व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। भारतीय सरकार इसको सिम्टोमेटिक टेस्टिंग कह रही है। भारत सिर्फ उन्हीं लोगों का टेस्ट कर रहा है जो इस सिम्टोमेटिक टेस्टिंग के दायरे में आते हैं। इससे एक बात साफ हो जाती है कि भारत सरकार कोरोना वायरस को लेकर ज़्यादा गंभीर नहीं है। यह चिकित्सीय रूप से अनैतिक है। क्योंकि भारत में कुछ गिने चुने लोगों का ही टेस्ट हो रहा है और हम यह मानकर चल रहे हैं कि बाकी किसी को कोरोना नहीं हुआ होगा। यह एक घातक सोच है। जो शायद निकट भविष्य में खुद भारत के लिए बुरी खबर न बन जाए।  मोबाइल पर जारी कॉलर ट्यून से कितनी जागरुकता फैलेगी? फिलहाल सभी व्यक्तियों को मोबाइल के एक कॉलर टयून के भरोसे छोड़ दिया गया है कि भई अगर आपको बुखार, सुखी खांसी, जुकाम इत्यादि हो तो फलां नम्बर पर काल करिये या जांच के लिए खुद जाइये। चलिए मेरी या मेरे जैसे लोगों की समझ में आ जाएगा और तुरंत निवारक उपाय करेंगे लेकिन उनका क्या जो गरीब हैं, या स्लम में रहते हैं?  इन सभी व्यक्तियों के सम्पर्क में आये लोगों का क्या होगा? जिनकी सिम्टोमेटिक टेस्टिंग चल रही है या पोज़िटिव पाए जाने के बाद इलाज चल रहा है। इनमें शायद कोई इनका ड्राईवर हो, हाउस मेड हो या माली हो। इस गरीब जनता का क्या होगा अगर कोरोना इनके स्लम में या इनके गांव में फैल जाता है या शायद फैलने वाला हो, या फैल चुका हो? ऐसा इसलिए क्योंकि हम सही तरीके से कोरोना से नहीं लड़ रहे। शायद इसलिए क्योंकि हम मास लेवल पर टेस्ट नहीं कर रहे हैं। इसलिए भी कि हमारे सामने जो डाटा रखा जा रहा है वह शायद पूर्ण ना हो।  पहले‌ तो हमें उस “शायद” से लड़ना होगा कोरोना से जंग जीतनी है तो पहले इस शायद से लड़ना पड़ेगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा के टेस्ट ज़रूरी है, जिसे मास लेवल पर करना चाहिए। तभी असली आंकड़ा या डाटा सामने आएगा। तभी हम वास्तविकता जान पाएंगे। अगला सवाल जो महत्वपूर्ण है और सरकार से पूछा जाना चाहिए कि क्या भारत के पास कोरोना वायरस के टेस्ट को लेकर पर्याप्त साधन हैं? अगर नहीं हैं तो भारतीय सरकार कितने दिनों में इन साधनों का इंतज़ाम कर लेगी जिससे मास टेस्टिंग सुनिश्चित की जा सके? अभी भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण दूसरे स्तर यानी Stage 2 पर है। जो छोटे दायरे तक सीमित है जिसे स्थानीय हस्तांतरण अर्थात local transmission कहा जाता है। क्या होगा यदि भारत stage 3 पर पहुंच जाए?  अगर भारत स्टेज-3 पर पहुंचता है तो आज के कोरोना वायरस का स्थानीय हस्तांतरण सामुदायिक हस्तांतरण यानी Community transmission में बदल जाएगा। कई जानकार यह मानते हैं कि भारत में तीसरा स्तर ज़रुर होगा। एक बड़े स्तर पर कोरोना पॉज़िटिव मामले सामने आएंगे, क्योंकि भारत उस तरह से कोरोना से लड़ता नहीं दिखाई दे रहा जैसे साउथ कोरिया लड़ा। भारत की सरकार अभी भी मास टेस्टिंग को लेकर खामोश है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत सरकार क्या इटली जैसे हालात बनने का इंतज़ार कर रही है? इटली जहां मास टेस्टिंग हूई ही नहीं, नतीजा हम सबके सामने है।  आज इटली से आए कई विडियो भारत में वायरल हैं। जिसमें इटली बता रहा है के कैसे कोरोना वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में हस्तांतरित होता है। वहां लोग बालकनी में खड़े होकर थाली चम्मच बजा रहे हैं क्योंकि वह तीसरे स्तर (Stage 3) तक पहुंच गए। सरकार ने मास टेस्टिंग नहीं की नतीजा इटली में आज 41 हज़ार से ज़्यादा लोग कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ हो चुके हैं। जहां लगभग 3500 व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं हैं।  हमें समझना होगा कि न आप सुरक्षित हैं न हम  इस समय ये मत सोचिये के आपका या मेरा शहर अथवा गांव सुरक्षित है। सोचिये क्योंकि ये समय हम सबकी जिंदगी से जुड़ा है, सोचिये कि क्या होगा अगर इटली जैसी हालत भारत में हो जाए तो? उस परिस्थिति में भारत क्या करेगा? इटली की तर्ज़ पर थाली चम्मच बजाएंगे या उस संदेश को समझेंगे जो इटली देना चाह रहा है? वह संदेश है के “इससे पहले कोरोना कहर बन जाए इसकी रोकथाम की व्यवस्था कर लीजिए।” सिर्फ एक दिन का जनता कर्फ्यू या थाली चम्मच पीटने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरत इटली के थाली चम्मच पीटने के निहितार्थों को समझने की है, सटीक कदम उठाने की है ताकि थाली पीटने की नौबत ही ना आए और जनता को कोरोना से सुरक्षित रखा जा सके। वायरल होते वीडियो से क्या सीखा और समझा जाए यहां कुछ वायरल विडियो पर चर्चा करना ज़रूरी है। एक मेसेज आया माननीय पीएम के देश के नाम सम्बोधन के बाद, उस मेसेज के अनुसार कोरोना वायरस 12 घंटे से ज्यादा किसी भी सरफेस पर जिन्दा नहीं बच सकता तो रविवार 22 मार्च को 14 घंटे के जनता कर्फ्यू के बाद बाहर (मेट्रो, बस, ट्रेन, किसी सार्वजनिक जगह इत्यादि) कोई संक्रमित सरफेस होगा ही नहीं और अपने आप जो कोरोना फैलने की कड़ी है वो टूट जाएगी,  एक माचिस वाला विडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ माचिस की तिल्लियां जल जाती हैं जो यह बता रही हैं कि कोरोना का संक्रमण कैसे फैलता है। उसी विडियो में एक माचिस की तिल्ली अलग हो जाती है, जो यह बताने का प्रयास है कि सामाजिक दूरी बनाये रखिये। यानि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचिए।  पहले कोरोना 12 घंटे से ज्यादा किसी सरफेस पर नहीं रहता वाले मेसेज की पड़ताल चलिए मान लेते हैं कि कोरोना वायरस 12 घंटे से ज़्यादा किसी सरफेस पर जीवित नहीं बचता लेकिन जनता कर्फ्यू के बाद अगले दिन कोई संक्रमित व्यक्ति या कई संक्रमित व्यक्ति घर से निकलते हैं। (हमारे पास सही डाटा मौजूद नहीं है, क्योंकि मास लेवल पर टेस्टिंग नहीं हो रही) तो क्या बाहरी सरफेस दोबारा संक्रमित नहीं होंगे? क्योंकि लोग यह मान चुके होंगे कि अब तो बचा खुचा संक्रमण भी 14 घंटे के कर्फ्यू के बाद खत्म हो चुका है तो क्या उनमें से से कई थोड़े ही सही, लापरवाह नहीं हो जाएंगे? कोरोना से बचने के लिए जो ज़रूरी कदम जैसे हाथ धोना, बाहरी सरफेस को टिश्यू पेपर से छूना इत्यादि थोड़ी देर के लिए भूल नहीं जाएंगे? फिर सोचिये के ऐसा हुआ तो कोरोना संक्रमण इस एक दिन के कर्फ्यू के बाद लापरवाही की वजह से कितने स्तर तक फैल सकता है? क्या भारत जैसे देश में 100% शट डाउन सम्भव है? वर्तमान सरकार यह दावा करती रहती है के वह गरीबों की सरकार है तो फिर दिहाड़ी मज़दूर, घर में काम करने वाले नौकर, ओला-उबेर के ड्राईवर, अनआर्गनाइज़्ड सेक्टर में काम करने वाले इत्यादि क्या 14 घंटे के इस जनता कर्फ्यू का पालन कर पाएंगे? यह बड़ा सवाल है लेकिन किससे पूछें और कौन जवाब देने आएगा? जबकि कई डॉक्टर ये मान चुके हैं के कोरोना वायरस कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक किसी सरफेस पर एक्टिव रह सकता है, लेकिन ये वायरल मेसेज सभी वैज्ञानिक सोच को नकार दे रहा है। दूसरा विडियो जिसमें एक तीली अलग हो जाती है, उसे दोबारा देखिये और सोचिये के एक तीली जलने से खुद को कैसे बचा पाई? क्योंकि उसके पैर थे, बाकी तिल्लियां खड़ी रह गईं क्योंकि पैर नहीं थे। यहां पैर का मतलब अगर जागरूकता, संसाधन का अभाव न होना, अच्छी नौकरी या व्यापार होना कुल मिलाकर मिडल क्लास या अपर मिडल क्लास लगाया जाए तो इस क्लास के लिए सामाजिक दूरी बनाना आसान है। ऐसे में सवाल उठता है कि उनका क्या जिनके पास पैर रुपी जागरूकता नहीं है? उन सभी व्यक्तियों का क्या होगा, जो गरीब हैं, मज़दूर हैं, रिक्शा चलाकर पेट भरते हैं, या अनआर्गनाइज़्ड सेक्टर में काम करते हैं? ये तो एक दिन के जनता कर्फ्यू पर सवाल हैं, क्या हो अगर दूसरे देशों की तर्ज पर भारत भी आने वाले समय में पूर्ण लॉक डाउन लागू कर दे?      सामाजिक दूरी की जगह शारीरिक दूरी शब्द का प्रयोग ज्यादा उचित होता हमारे ज़हन में सामाजिक दूरी इतनी गहराई तक जा बैठी है कि हम सामाजिक दूरी को बिना सोचे समझे मानने लगे हैं। जाति व्यवस्था, धर्म भाषा संस्कृति आधारित भेद-भाव इतना गहरा है कि सामाजिक दूरी की आदत पड़ गई है। ये शब्द समझ में भी जल्दी आ जाते है। इस सामाजिक दूरी की जगह अगर शारीरिक दूरी शब्द का प्रयोग किया गया होता तो ज़्यादा अच्छा होता। देश कब समझेगा कि यहां सिर्फ सम्पन्न, तथाकथित जागरूक और मिडल क्लास या अमीर ही नहीं रहते?  खैर, हमारा देश कब समझेगा कि यहां सिर्फ सम्पन्न, तथाकथित जागरूक और मिडल क्लास या अमीर लोग ही निवास नहीं करते। यहां एक बड़ा तबका गरीब है, उन गरीबों का क्या होगा? बहरहाल कोरोना ने एक बात बता दी कि वह अमीरी गरीबी नहीं देखता। वह तो सिर्फ इंसान देखता है, तो कोई भी किसी गलतफहमी में ना रहे। अगर ज़रा सी लापरवाही हुई तो उसका परिणाम क्या हो सकता है ये जानने के लिए कई देशो के कोरोना संक्रमण नागरिकों की लिस्ट पर नज़र दौड़ा लीजिये। कुल मिलाकर कोरोना के कहर बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है और अगर आज ही से ज़रूरी कदम नहीं उठाये गये तो आने वाले समय में स्थिति बहुत भयावह होगी।      हमें अमेरिका और इटली जैसी गलती नहीं करनी चाहिए    हमें अमेरिका और इटली जैसे विकसित और शक्तिशाली आर्थिक रूप से सम्पन्न देश को देखना होगा। जहाँ की चिकित्सकीय सुविधाएं भारत से कहीं आगे हैं,  लेकिन इन दोनों देशो ने शुरू में वही किया जो भारत अब कर रहा है, “मास टेस्टिंग न करना” और नतीजा आज की तारीख तक अमेरिका जैसे देश में दस हज़ार से ज़्यादा कोरोना के पॉज़िटिव केस दर्ज किये जा चुके हैं, जिनके और ज्यादा बढ़ने की पूरी सम्भावना है। भारत अभी दूसरे स्तर पर है। अमेरिका, इटली को देखते हुए क्या यह सही समय नहीं है जब भारत ऐसे साधन विकसित करे या खरीदे जिससे मास टेस्टिंग हो सके और कोरोना पॉज़िटिव या नेगेटिव का सही आंकड़ा पता चल सके?  लेकिन भारत सरकार का मास टेस्टिंग को लेकर नकारात्मक रवैया ये बता रहा है वो अमेरिका इटली की तरह तीसरे स्तर (Stage 3) का इन्तेज़ार कर रही है? अगर भारत तीसरे स्तर (Stage 3) पर आ गया तो आप मैं सोच भी नहीं सकते कि वह स्थिति कितनी भयावह होगी? खासतौर से उस दौर में जब व्हाट्सएप फॉरवर्ड को परम सत्य माना जाता हो, मान लीजिये के कोई ऐसा मेसेज आ जाए कि राशन पानी जमा कर लीजिए क्योंकि कुछ बड़ा होने वाला है। अब कल्पना कीजिये स्थिति कितनी भयावह होगी। इस वक्त भारत तीसरे स्तर (Stage 3) में आ चुका होगा और ज़रूरत के सामान लेने के लिए जो भीड़ उमड़ेगी वह स्थिति को बद से बदतर ही बनाएगी। यह एक कल्पना आधारित उदाहरण रखा है, क्योंकि हम अभी दूसरे स्तर (Stage 2) पर ही हैं जो स्थानीय हस्तांतरण या local transmission तक ही सीमित है। तो यह सही समय है इस बात को तय करने का कि किस किस राज्य के किस किस ज़िले में, शहर में, गांव में मास टेस्टिंग की जानी ज़रूरी है। अगर कोई पॉज़िटिव पाया जाता है तो तुरंत उसको पृथक करने (Quarantine) और उसका इलाज करने से ही तीसरे स्तर (Stage 3) को टाला जा सकता है। क्या भारत की सरकार मास टेस्टिंग को लेकर कुछ प्लान कर रही है?  सरकार कह रही है कि उसने 1000 लोगों का जिनका कोई विदेश भ्रमण का इतिहास नहीं है या जो कोरोना संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में नहीं आए हैं उनपर एक यादृच्छिक परीक्षण (Random Test) कर चुकी है।  (Data: इस तथ्य से मैं एक डॉक्टर से बात चीत के दौरान अवगत हुआ, और लेख में लिखा क्योंकि डॉक्टर ने अपना नाम छिपाने की शर्त रखी थी, मैने उनका नाम नहीं लिखा लेकिन एक ही दिन बाद 21 मार्च को The Wire में एक खबर छपी जिसमें इस तथ्य का विस्तृत वर्णन है, कृपया लिंक देखें। (http://thewirehindi.com/114130/coronavirus-narendra-modi-s-message-to-the-nation-janata-curfew/)  जिनमें से कोई भी पॉज़िटिव नहीं निकला, इसलिए भारत सरकार मास टेस्टिंग नहीं कर रही और सरकार सिर्फ सिम्टोमेटिक टेस्टिंग की नीति पर चल रही है। सरकार आज मास टेस्टिंग नहीं कर रही है, जनता को खुद के भरोसे छोड़ दिया है लेकिन रविवार को क्या करना है ये ज्ञान ज़रुर दे रही है। वह भी बिना यह बताये कि वास्तविक रूप में कोरोना से लड़ने के लिए भारत के पास पर्याप्त संसाधन हैं भी या नहीं?  ऐसे में सवाल उठता है कि भारत सरकार इस दिशा में सोच रही है? सरकार की प्रतिक्रिया नकारात्मक है जो सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है। सरकार अभी भी सिम्पटोमेटिक टेस्टिंग की वकालत कर रही है क्योंकि उसका ये मानना है के भारत में अभी वायरस का संक्रमण सामुदायिक (community) नहीं हुआ है और ये सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनका कोई विदेश यात्रा का इतिहास है, और ऐसे व्यक्ति पकड़ में आ रहे हैं, जिनको आइसोलेशन में रखा जा रहा है, या इलाज किया जा रहा है। सरकार आज मास टेस्टिंग नहीं कर रही है, जनता को खुद के भरोसे छोड़ दिया है लेकिन रविवार को क्या करना है ये ज्ञान ज़रुर दे रही है। वह भी बिना यह बताये कि वास्तविक रूप में कोरोना से लड़ने के लिए भारत के पास पर्याप्त संसाधन हैं भी या नहीं? यकीन जानिये अगर भारत तीसरे स्तर (Stage 3) में आ जाता है तब स्थिति कितनी भयावह होगी यह सोच कर भी मन दहल जाता है। भारत आज मास टेस्टिंग नहीं कर रहा लेकिन अगर जानकारों की मानें तो कल भारत को मास टेस्टिंग करनी ही पड़ेगी। जो काम कल करना ही है उसे भारत की सरकार आज क्यों नहीं कर रही है?  सवाल तो कई हैं जवाब देने वाला TV पर लाइव आकर जवाब दे जाता है। अगर यही सही जवाब है तो हम सभी को मिलकर सरकार से पूछना होगा उसकी तैयारियों के बारे में, जैसे कैनेडा के प्रधानमंत्री ने किया। उन्होंने अपने देश को सटीक जानकारी देते हुए सम्बोधित किया। मीडिया का रवैया क्या है?  देश के सबसे तेज़ चेनल के पास सरकार से पूछने के लिए सवाल क्यों नहीं हैं? उसके दो सबसे बड़े और महान एंकर शाहीन बाग और मस्जिदों-गुरुद्वारों के पीछे पड़े हैं। कोरोना को लेकर इनकी संवेदनशीलता कितनी है यह खुद लाइव आकर दिखा रहे हैं। एक एंकर जिनकी भुजाएं राष्ट्र के नाम पर बहुत फड़कती हैं उनको कोरोना वायरस का भारत में आना उस अवसर की तरह है जिससे वह अपने कुछ डिबेट के प्रोग्राम चला कर ये साबित कर सकें कि प्रदर्शनकारी अपना प्रदर्शन खत्म कर दें।  जब प्रदर्शनकारी प्रदर्शन कर रहे हैं तो इस स्थिति में इस बलिष्ठ भुजाओं वाले एंकर को कायदे से सरकार से यह पूछना चाहिए था कि अब तक सरकार ने अपना कोई नुमाइंदा क्यों नहीं भेजा? सरकार क्यों नहीं आश्वासन दे रही है कि NRC,‌NPR नहीं होगा? या फिर यह कि CAA से देश के किसी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होगा। सभी के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। इन लोगों द्वारा क्यों नहीं सरकार के खिलाफ एक प्रोग्राम चलाया गया कि इतनी असंवेदनधील सरकार है जो कोरोना के महामारी घोषित किये जाने के बाद भी अपने ही देश के नागरिकों की परवाह नहीं कर रही?  NPR जैसे मसलों को लेकर सरकार क्यों हठधर्मी पर कायम है? अपनी ज़बरदस्ती की हठधर्मी पर सरकार कायम है और ऐसे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे रही है जिसकी देश को वाकई में कोई ज़रूरत नहीं है। NPR पर अभी हाल ही में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि यह होकर रहेगा। फिर इतने दिनों से नहीं होगा नहीं होगा क्यों चल रहा था? शाहीन बाग के आंदोलन को लेकर मीडिया समूह को जनता के साथ खड़ा होकर सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए था? तो जो सवाल सरकार से पूछने चाहिए उसपर ये बलिष्ठ भुजाओं वाला एंकर अपने प्रोग्राम में बुलाये गये पेनालिस्ट से ही आक्रामक तरीके से बात करते हुए नज़र आते हैं।  इन एंकरों की भुजाएं सरकार तक नहीं पहुंचती। सच तो यह है कि कोरोना का बहाना बनाकर सरकार के पक्ष में प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं। यह नहीं पुछा जा रहा कि सरकार अब नहीं तो कब इन लोगों से बात करेगी? सरकार कब आश्वासन देगी कि कोरोना का कहर NRC, NPR को लागू करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार इस परिस्थिति में देश के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की कब रक्षा करेगी? उनके स्वास्थ्य का पूरा ध्यान सरकार अखिर कब रखेगी? मीडिया का मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा डिबेट से लगाव दूसरे में इसी सबसे तेज़ चैनल की सबसे तेज़ एंकर ने सवाल खड़ा कर दिया के जब देश के सभी मंदिर बंद हैं तो मस्जिद और गुरूद्वारे क्यों खुले हुए हैं? फिर वह शाहीन बाग में चल रहे आंदोलन पर हमला बोलती हुई नज़र आती हैं। वह कहती हैं कि जब एक एडवाइज़री जारी हो चुकी है कि एक जगह 50 से ज़्यादा लोग नहीं रहेंगे तो शाहीन बाग में इतने लोग कैसे बैठे हुए हैं? इस सबसे तेज़ चैनल की सबसे तेज़ एंकर को यह बात पता होनी चाहिए थी कि शाहीन बाग़ में बच्चे नहीं लाए जा रहे। एक बार में 50 या उससे कम लोग ही धरने पर बैठे रहते हैं। वहां साफ सफाई का, हाथ धोने का, मास्क पहनने का खासा ध्यान रखा जा रहा है। मुझे यह समझ नहीं आया कि उत्तर प्रदेश सरकार पर इन तेज़ एंकर साहिबा ने कोई सवाल क्यों खड़ा नहीं किया?  जबकि मुख्यमंत्री योगी यह साफ कर चुके हैं कि अयोध्या में राम नवमी की पूजा वैसे ही होगी जैसे होती आई है। उन्होंने यह भी कहा है कि राम देखेंगे कि किसी के साथ कुछ बुरा ना हो। तब एंकर ने उत्तर प्रदेश सरकार को कटघरे में क्यों खड़ा नहीं किया? क्यों नहीं पूछा कि कोरोना को लेकर उनके प्रदेश की क्या तैयारी है?  इन एंकर ने दिल्ली सरकार के उस फरमान को भी कटघरे में खड़ा नहीं किया जिसमें दिल्ली सरकार ने शादी आयोजन पर कोई रोक नहीं लगाई। बल्कि लोगों की संख्या बढाकर 100 कर दी, क्या शादियों में कोरोना का खतरा नहीं होगा? अयोध्या में कोरोना का खतरा नहीं होगा? जो मन्दिर आंशिक रूप से खुले हैं या पूर्ण रूप से खुले हैं वहां कोरोना का खतरा नहीं होगा? खतरा सिर्फ शाहीन बाग में होगा? ये कुछ अतिरिक्त सवाल हैं इन सबसे तेज एंकर से, इन सवालों के अलावा बाकी सवाल वही हैं जो ऊपर मैंने बलिष्ठ भुजाओं वाले एंकर से पूछे। मुख्य धारा की मीडिया को संदेश मुख्य धारा की मीडिया को कुछ बेसिक बातें समझनी चाहिए जैसे किसी भी देश की विधायिका कोई कानून बनाती है, इस बात को ध्यान में रखकर के ये कानून देश के भले के लिए है और यह कानून संविधान पर ही आधारित होते हैं। भारत में कानून भारतीय संसद बनाती है। जो स्वाभाविक रूप से संविधान पर आधारित होने चाहिए या होते हैं। इसे अंग्रेजी में Law कहते हैं, अब यह कानून या Law न्यायसंगत हैं या नहीं यह तय करने का कार्य सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसे अंग्रेजी़ में Justice कहा जाता है, तो कोई भी कानून जो संसद द्वारा पास किया गया है वह न्यायसंगत है या नहीं यह तय करने का अधिकार सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के पास होता है। अगर सर्वोच्च न्यायलय ने किसी कानून को न्यायसंगत नहीं माना, तो ऐसा कानून खत्म हो जाता है या संसद ज़रूरी कमियां पूरी करके इसे न्यायसंगत बनाती है। मान लीजिये कि कानून पास हो गया और सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न्यायसंगत भी बता दिया लेकिन जनता इस कानून के विरोध में है क्योंकि वह इसे निष्पक्ष नहीं मानती। ऐसा इस लिए कि किसी समुदाय, वर्ग, जेंडर इत्यादि के विरुद्ध मानती है। भले ही विरोध करने वाली जनता अल्पसंख्यक हो। तब सरकार और न्यायपालिका दोनों को स्वतः संज्ञान लेते हुए कानून न्याय संगत है या नहीं ये देखना होता है। जनता द्वारा किया गया ये विरोध सविनय अवज्ञा कहा जाता है।  जहां जनता आंदोलन करके विनय के साथ कानून की अवज्ञा करती है या गुज़ारिश करती है कि कानून में उसको कुछ कमी लग रही है या कानून ही काला है अत: इसे वापस लीजिये या ज़रूरी संशोधन कीजिये।  ये करना किसी भी प्रजातान्त्रिक राज्य में जनता का अधिकार होता है, देशद्रोह नहीं। क्योंकि कानून जनता के लिए ही बनाये जाते हैं और अगर जनता का छोटा या बड़ा हिस्सा इसका विरोध कर रहा हो तब राज्य के सभी तंत्रों को जनता की आवाज़ सुननी पड़ती है। अगर सरकार नहीं सुन रही तो दूसरे तंत्र अपना काम ठीक से नहीं कर रहे तब यह मान लीजिये कि आप प्रजातंत्र में सांस नहीं ले रहे हैं। अगला कोई कानून आपके लिए आ सकता है, कैसे करेंगे विरोध? कल कैसे बतायेंगे कि आपका विरोध सही है उनका गलत था? संसद जनता की सुनती है और सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेते हुए या किसी जनहित याचिका को स्वीकार करके वाद विवाद करती है ताकि ये ज्ञात किया जा सके कि पास हुआ कानून न्यायसंगत है अथवा नहीं। क्योंकि कानून का न्यायसंगत होना ज़रूरी होता है ताकि कानून निष्पक्ष बने। इसे न्यायसंगत निष्पक्ष कानून कहा जाता है या अंग्रेज़ी में Justice as Fairness की संज्ञा दी जाती है। क्योंकि पास किया गया कानून अगर न्यायसंगत (Just) नहीं है तो वह निष्पक्ष (Fair) नहीं हो सकता, ऐसा कानून किसी ना किसी के खिलाफ या एक या कई समुदायों के खिलाफ होगा। नागरिकता कानून, NPR, NRC का विरोध भी इसी आधार पर हो रहा है कि क्या यह कानून निष्पक्ष (fair) है? तो कुल मिलाकर यह फिलहाल मान लीजिये कि कोरोना के बहाने ये दोनों एंकर हम सभी से विरोध का अधिकार छीनने में सरकार की मदद कर रहे हैं क्योंकि यह सरकार से वह सवाल नहीं पूछ रहे जो इन्हें पूछना चाहिए। बाकी बीजेपी के नेता आपको गऊ मूत्र और गोबर एवं गोबर स्नान के फायदे और कोरोना से यह सब कैसे बचा सकते हैं इन सभी पर ज्ञान देते दिख जाएंगे। कुल मिलाकर यह तंत्र विकसित हुआ है कि कोरोना से लड़ने का इस नये भारत में। सरकार और मीडिया को समझना होगा के ये समय कोरोना के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का है, ना की कोरोना को हल्के में लेने का, ये दोनों इस छोटी सी बात को जितनी जल्दी समझ जाएँ देश के लिए उतना अच्छा।

Dr Anurag Pandey is Assistant Professor in University of Delhi. India.

The Views are personal.


इस लेख को Indian Democracy की एडिटोरियल टीम के अतिरिक्त Youth ki Awaaz के एडिटर श्री सरताज आलम ने भी एडिट किया है, जो इसी टाइटल से Youth ki Awaaz के पेज पर मौजूद है, सरताज आलम को इस लेख पर समय देने के लिए शुक्रिया। यहाँ उनके द्वारा एडिट किये हुए लेख को कुछ संशोधनों के साथ दुबारा छापा जा रहा है।


Important

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.

97 views

©2019 by Indian Democracy. All Rights Reserved. 

No part of the article/essay/commentary as presented above should be used or be cited without prior permission from us or author. Please write us at saveindiandemocracy09@gmail.com to discuss terms and conditions of using material posted on this site and see our Terms and Condition page.

The author, however, may promote their articles/essays/commentaries and can use it or republish if they wish to.