Anurag Pandey "कोरोना का कहर, सरकार और हम लोग"

Updated: Sep 12



ये लेख मेरे द्वारा इसी साईट पर लिखे गये पहले लेख की कड़ी का दूसरा भाग है। 22 फरवरी रविवार के दिन पी एम मोदी के आह्वान पर जनता ने एक दिन के लॉक डाउन या जनता कर्फ्यू का पालन किया, और शाम को 5 बजे या कई जगह उससे थोडा पहले ही लोग थाली, घंटा, कोई टीन का डब्बा या टीन की चादर को बजाते दिखे। इसके अतिरिक्त रविवार 22 मार्च को दोपहर से ही व्हाट्सएप और फेसबुक पर प्रमुखता से दो मेसेज ज्यादा वायरल हुए, एक मेसेज में ये दावा किया गया के 12 घंटे के बाद वायरस देश से भाग जायेगा क्योंकि सभी लोग घर में रहेंगे 14 घंटे का जनता कर्फ्यू है, पी एम साहब ने मास्टर स्ट्रोक खेला है जो विश्व का कोई भी प्रधान नहीं खोज पाया इत्यादि।

वहीं दूसरे मेसेज में पी एम साहब की इस अपील को मास्टर स्ट्रोक बताया गया, कुछ लोग तो चिकित्सा में नोबल पुरस्कार दिलवाने के लिए भी व्हाट्सएप फेसबुक पर योद्धा के तरह उतर आए, लगा जैसे अगले ही दिन हमारे पी एम को इन लोगों के वोट से चिकित्सा में नोबल पुरस्कार मिल जाएगा, लेकिन रविवार जनता कर्फ्यू के अगले ही दिन कई नये कोरोना मामले देश के विभिन्न राज्यों में मिले, जो आज तक बढ़ते जा रहे हैं, आज की खबर के हिसाब से भारत में कुल 649 (आज 27/3/2020 में ये बढ़कर 694 हो चुकी है) मामलें अभी तक आ चुके हैं और 15 (आज 27/3/2020 में ये बढ़कर 16 हो चुकी है ) व्यक्ति इस दुनिया में नहीं रहे। तो क्या 14 घंटे के लॉक डाउन से भारत कोरोना मुक्त हुआ? लोगों को ये समझना चाहिए के कोरोना के खिलाफ लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं है के सर्जिकल स्ट्राइक करी और बदला पूरा। और आज के समय में नेता विशेष की अराधना करने से ज्यादा जरूरी है कोरोना से एकजुट होकर लड़ना।

इस लेख में मैं कुछ बिन्दुओं पर चर्चा करूंगा, जिनमें सबसे पहले सरकार द्वारा उठाये गये कदमों की पड़ताल और सवाल करूंगा? दूसरे में “हम लोग” मतलब भारतीय नागरिकों और विभिन्न वर्गों पर चर्चा करूंगा।

जैसा कि पहले भाग में मैने शंका जाहिर की थी के कहीं दूसरे देशों की तर्ज पर भारत में भी पूर्ण लॉक डाउन ना हो जाए, हमारे देश के माननीय पी एम ने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में मंगलवार 24 मार्च को पूर्ण लॉक डाउन का आग्रह किया, उन्होंने जनता से अपील करी के घर में ही रहें, सुरक्षित रहें। हम सभी ने पी एम का संदेश सुना या कहीं से पता चला, उस संदेश से कुछ सवाल खड़े होते हैं और यहाँ मैं उन सभी सवालों को रखूंगा,

1. राष्ट्र के नाम सम्बोधन में पी एम ने एक बात साफ़ कर दी के सभी अपना ख्याल स्वयं रखें, बड़ा सवाल ये के सरकार कोरोना महामारी में इस तरह के संदेश देकर क्या कहना चाहती है?क्यों सरकार इस आपदा के समय देशवासियों से ये नहीं कह रही के सरकार प्रत्येक व्यक्ति के साथ है और उसने फलां फलां इंतजाम किए हैं? सरकार सिर्फ टेलीविजन पर उपदेशक की भूमिका भर नहीं निभा सकती, सरकार को बताना पड़ेगा के इस महामारी से लड़ने के लिए उसके पास संसाधन कितने हैं? वो मास टेस्टिंग कब से शुरू करेगी? पहले भाग में मैंने लिखा था के हमें अमेरिका या इटली जैसी गलती नहीं चाहिए, लेकिन शायद हम वही गलती कर रहे हैं और सरकार मॉस टेस्टिंग पर चुप हैजिस समय ट्रम्प भारत आये थे उस समय अमेरिका में और भारत में कोरोना के मरीजों की पुष्टि हुई थी, अमेरिका अभी हाल के समय तक मॉस टेस्टिंग नकारता रहा, आज अमेरिका कोरोना संक्रमित तालिका में सबसे ऊपर है, और वहां स्थिति बहुत भयावह है जैसा की पी एम् ने अपने सम्बोधन में कहा भी, हम अमेरिका, इटली, इत्यादि देशों जैसे विकसित देश नहीं हैं, हमारी मेडिकल व्यवस्था इन देशों के आस पास भी नहीं खड़ी होती, फिर भी सरकार सतर्क नहीं है, क्यों? खासतौर से तब जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ये कह चुका है के सिर्फ लॉक डाउन या पृथककरण (आइसोलेशन) कारगार उपाय साबित नहीं होंगे अगर मास टेस्टिंग, इलाज और कोरोना पीड़ितों का पता नहीं लगाया जाता। फिर भारत की सरकार सिर्फ लॉक डाउन पर क्यों जोर दे रही है?

3. वर्तमान सरकार 2014 से ही स्वास्थ्य पर किया जाने वाला खर्च घटा रही है, क्यों? क्यों सरकार ने स्वास्थ्य तंत्र को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया? Scroll पर पढ़ी एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ आंकड़ें जारी किए हैं, जिसके अनुसार देश में 84,000 लोगों पर एक आइसोलेशन बेड और 36000 लोगों पर एक क्वारंटाइन बेड है, इसके अतिरिक्त प्रति 11,600 पर एक डॉक्टर और 1,826 मरीजों के लिए अस्पताल में सिर्फ एक बेड है। ये सरकार की तैयारी है कोरोना से लड़ने के लिए? अगर ऐसा है तो ये तथ्य आज की परिस्थितियों में भयावह है, डराने वाला है, फिर यही सरकार किस तर्ज पर कह रही है के पैनिक मत होइए? इस पैनिक ना होने के पीछे क्या सरकार ने कोई सटीक आश्वासन दिया? अगर नहीं तो क्यों?

4. पी एम ने कहा के लक्ष्मण रेखा खींच दीजिए और बाहर मत निकलिए, बात भी सही है जब सरकार ने ही जनता को खुद के भरोसे छोड़ दिया हो तो कोई कैसे बाहर निकलेगा? लेकिन उनका क्या जो गरीब हैं, जो रिक्शा चलाते हैं, जो दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनकी आजीविका रोज कमा कर खाने पर चलती है? वो इस लक्ष्मण रेखा को पार करेंगे ही, सरकार उस स्थिति में क्या करेगी? और ऐसे सभी व्यक्ति लक्ष्मण रेखा पार ना करें इसके लिए सरकार ने क्या इंतजाम किये हैं?

5. पी एम ने लोगों से अपील करी सभी सम्पन्न व्यक्ति 9 परिवारों का जिम्मा 21 दिनों तक उठा लें, उन्हें खाना पानी एवं अन्य जरूरी सामान उपलब्ध करवाएं, जनता इस बात पर अमल भी कर लेती लेकिन पशोपेश की हालत ऐसी है के समझ नहीं आ रहा लक्ष्मण रेखा तोड़ कर बाहर निकलें और उन 9 परिवारों को खोजें फिर मदद करें या लक्ष्मण रेखा लांघनी नहीं है? फिर अगर बाहर निकलना ही है तो ये लॉक डाउन कैसे हुआ? फिर लक्ष्मण रेखा का औचित्य ही क्या रहा? वैसे भी ग्रन्थों के हिसाब से लक्ष्मण रेखा पार करि गई थी, तो ये लक्ष्मण रेखा पार कौन करेगा और क्यों?

6. आज भारत में कोरोना संक्रमित व्यक्तियों की संख्या 649 हो गई है और सरकार अभी भी ये मान रही है के भारत में वायरस का सामुदायिक प्रसार शुरू नहीं हुआ है? अगर ऐसा ही है तो दिल्ली के मुहल्ला क्लिनिक के एक डॉक्टर एवं उनका परिवार और नॉएडा से आए कुछ नये कोरोना पॉजिटिव मामलों का कोई विदेश यात्रा करने का इतिहास नहीं है, फिर उन्हें कैसे हुआ? वो किस विदेश से आए व्यक्ति से मिले? वो विदेश से आये सभी व्यक्ति किस किस से मिले? फिर जिनसे ये विदेश भ्रमण करके लौटे व्यक्ति मिले वो सभी व्यक्ति और कितने व्यक्तियों से मिले? उनका क्या जो किसी विदेश से लौटे व्यक्ति से मिले ही नहीं, लेकिन फिर भी कोरोना संक्रमित हो गए?

समझ नहीं आ रहा के सिर्फ दो या तीन मामलों में इतना मिलना मिलाना हो गया, तो फिर सामुदायिक प्रसार का मतलब सरकार ने बदल दिया है क्या? कुछ लोग ये मानते हैं के भारत में सामुदायिक प्रसार शुरू हो चुका है (जैसे Science: The Wire की रिपोर्ट और The Carvan मैगज़ीन को दिए इंटरव्यू में सुजाथा राव इस बात को मानते हैं के भारत में सामुदायिक प्रसार शुरू हो चुका है और भारत इससे लड़ने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है) और बस किसी दिन कोरोना का कहर अचानक से सामने आएगा, सरकार अभी भी जनता से अपील कर रही है।

7. तो क्या ये माना जाये के मास टेस्टिंग ना करके सरकार बड़ी गलती कर रही है? और लॉक डाउन का फरमान सिर्फ इसलिए दिया गया के जितने भी मामले होंगे 21 दिनों में धीरे धीरे ही सामने आएंगे ,क्योंकि लक्ष्मण रेखा तो यही कोरोना संक्रमित व्यक्ति पार करेंगे, और सरकार उस वक्त जरूरी कदम उठा लेगी। क्या वाकई ये इन परिस्थितियों में इतना आसान होगा? सरकार करना क्या चाह रही है? कैसे लड़ेगी इस महामारी से? सरकार ये घोषणा करि के Covid 19 इकनोमिक टास्क फ़ोर्स का गठन किया जाएगा लेकिन अगर The Hindu और The Print की रिपोर्ट की माने तो ये बात भी जमीनी सच्चाई से बहुत दूर है, ऐसी किसी टास्क फ़ोर्स का गठन अभी तक नहीं किया गया, क्यों? सरकार अब भी जुमले दे रही है क्या? ये चुनाव नहीं है जिसमें कुछ दलों से ज्यादा सीटें लाकर आप जीत जाएं, ये एक ऐसे वायरस के खिलाफ लड़ाई है जिसकी प्रकृति पर भी आम राय नहीं है, और इस वायरस का संक्रमण दुनिया के सबसे सुरक्षित परिवार का एक सदस्य झेल रहा है, ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स। तो सरकार देश की जनता को किसके भरोसे छोड़ रही है? खुद आगे कब आएगी?

8. सरकार ने आज 1.7 लाख करोड़ की वित्तीय सहायता की घोषणा करी, ये स्वागत योग्य कदम है, इसकी घोषणा उसी दिन हो जानी चाहिए थी जब लॉक डाउन का संदेश दिया गया। यहाँ सवाल ये उठता है के क्या ये सहायता उन लोगों तक पहुंचेगी जिनके पास राशन कार्ड नहीं है? बैंक में अकाउंट नहीं है? उज्ज्वला योजना के बारे में जानते तक नहीं? वो जो दिहाड़ी मजदूर हैं, जो किसी के खेत में मजदूर हैं, वो जो असंगठित क्षेत्र में मजदूर हैं या बेलदारी का काम करके रोजी रोटी चलाते हैं? उनका क्या? ऐसे व्यक्तियों की संख्या करोड़ो में है, सरकार का ध्यान सिर्फ उन्हीं पर जाएगा जो संगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं? फिर ये सभी असंगठित लोग क्या 21 दिनों के जनता कर्फ्यू का पालन कर पाएंगे? इनमे से कुछ तो पैदल अभी ही अपने अपने घरों के लिए निकल चुके हैं, क्योंकि ये काम की तलाश में अपने राज्य या जिला छोडकर दूसरे राज्य या जिले में गये थे, और अब काम से इन्हें हटा दिया गया है, जिस जगह ये काम कर रहे थे वहां के मालिक ने हाथ खड़े कर दिए, सरकार ने ऐसे मालिकों के लिए कोई एडवाइजरी जारी क्यों नहीं करि? दूसरे क्या सरकार इन व्यक्तियों की मदद कर रही है ताकि वो अपने घर सुरक्षित पहुँच सकें? आज तक इस बात की घोषणा क्यों नहीं हुई के जो लोग घर जा रहे हैं उनके लिए विशेष बस सेवा शुरू की जाएगी? और अगर उसी राज्य में रुक जाते हैं तो आखिर 21 दिनों तक कैसे ये सभी बिना भोजन के रह सकते हैं? दिल्ली सरकार ने जरुर पहल करी है और वो ऐसे लोगों को दो वक्त का खाना मुहैया करवा रही है, लेकिन क्या सभी को खाना मिल जाता है? क्या कोरोना से बचने के नियमों का पालन किया जा रहा है? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आज आश्वासन दिया के जो लोग घर जा रहे हैं उनकी सरकार मदद करेगी, केंद्र सरकार ने ऐसी योजना का जिक्र तक क्यों नहीं किया? भला होता उत्तर प्रदेश सरकार कहती के रुकिए मैं आपके साथ हूँ, रहने खाने का इंतजाम उत्तर प्रदेश सरकार देखेगी 21 दिनों तक। साथ ही सरकार कालाबाजारी और जमाखोरी और मुनाफाखोरी के खिलाफ क्या कदम उठा रही है? ताकि इस लॉक डाउन की हालत में लोगों को जरूरी चीजें सुलभ हों। अगर यही हालत रहे और कालाबाजारी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी पर लगाम नहीं लगाई गई तो 21 दिन बहुत भारी कटेंगे, खासतौर से उन लोगों के लिए जो गरीब हैं या जिनके घर सब्जी तेल, राशन खत्म हो जाए।

9. ये मैंने पिछले लेख में भी लिखा है, यहां विस्तृत तरीके से सवाल रखूंगा। सरकार जनवरी से ही क्यों एक्टिव नहीं हुई? क्यों सरकार ने विदेश से आए प्रत्येक व्यक्ति को आइसोलेशन में 14 दिनों तक नही रखा? क्यों ऐसे लोगों को सिर्फ एक शपथ पत्र भरवा के के वो खुद आइसोलेशन में रहेंगे, जाने दिया? अगर सरकार ट्रम्प के स्वागत से ज्यादा अपने देश में विदेश से आने वाले व्यक्तियों पर ध्यान देती तो शायद आज ऐसी स्थिति ना होती, इस सरकार की प्राथमिकताएँ क्या हैं? और वो प्राथमिकताएं जनता के हित में क्यों नहीं होती?

10. कुछ एयरलाइन्स और व्यापारिक घराने सरकार से मदद मांग रहे हैं, बड़ा अजीब लगता है ऐसा कुछ पढकर, जब मुनाफा कमाना होगा तो ये सभी पूंजीपति और मुनाफाखोर होते हैं, देश का सारा संसाधन इन सभी पूंजीपतियों को चाहिए होता है, लेकिन जब विपदा आती है तो ये पूंजीपति समाजवादी कैसे और क्योंकर बन जाते हैं? ये सभी सरकार और राज्य की तरफ क्यों देखने लगते हैं? खासतौर से तब जब यही पूंजीपति नहीं चाहते के सरकार जनता की तरफ देखे, कम से कम उस जनता की तरफ जिसके लिए हर दिन आपदा समान होता है, ये हर एक संस्था का निजीकरण करना चाहते हैं, ताकि मुनाफा कमा सकें। आप सोचिये अब के निजीकरण होना चाहिए या नहीं? और साथ में ये भी के कितने प्राइवेट होस्पिटल ने ये घोषणा की है के वो फ्री में इलाज करेंगे कम से कम 21 दिनों तक? क्या भारत की सरकार इन सभी प्राइवेट अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर रही है? या इन अस्पतालों के लिए कोई एडवाइजरी जारी की है? अगर नहीं तो क्यों? हालांकि कुछ जैसे रिलायंस और महिंद्रा इत्यादि ने कॉर्पोरेट जिम्मेदारी दिखाई है और आगे आएं हैं, सवाल यहाँ ये आता है के ये कॉर्पोरेट जिम्मेदारी सरकार ने इन्हें क्यों याद नहीं दिलाई जब देश के नाम सम्बोधन चल रहा था? क्या ये पूंजीपति देश से राज्य से ऊपर हैं? सरकार ने अलग से इन सभी उद्योगपतियों से 9 परिवारों का ध्यान रखने का आग्रह क्यों नही किया? या कुछ और जैसे सरकारी खजाने में अनिवार्य रूप से धन देना।

11. देश के डॉक्टर और नर्स कुछ विशेष सामान की मांग कर रहे हैं, ताकि वो सेफ होकर कोरोना के मरीजों का इलाज कर सकें, तीमारदारी कर सकें, जैसे दस्ताने, हेंड सेनीटाईज़र, मास्क, विशिष्ट ड्रेस इत्यादि। सरकार इन डॉक्टर्स की सुन क्यों नहीं रही? क्योंकि 19 मार्च तक वेंटिलेटर, दस्ताने, हेंड सेनीटाईज़र, मास्क, विशिष्ट ड्रेस इत्यादि विदेशों में निर्यात करती रही क्योंकि सरकार ने अभी 19 मार्च को ही निर्यात पर रोक लगाई है और वो इतने कम समय में अपने ही देश के डॉक्टर्स को किसी चमत्कार के भरोसे छोड़े हुए है। क्या हो अगर आज से दूसरे या तीसरे दिन कोरोना मरीजों के मामले बढ़ जाएँ और 21 दिनों तक बढ़ते रहें? सनद रहे आज तीसरा ही दिन है लॉक डाउन का और अगर कोई कोरोना पोसिटिव होगा तो पांचवे या छठे दिन ही घर से निकलेगा जब लक्षण साफ़ दिखने शुरू होंगे, मैं इन परिस्थितियों में यही सोचूंगा के कोई नया मरीज अब आए ही ना, अगर मामले आएं भी तो कम आएं और सामुदायिक प्रसार वाली बात झूठ साबित हो जाए, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये 21 दिन हम सभी आजीवन याद रखेंगे। डॉक्टर और नर्सों तक को सरकार ने चमत्कार भरोसे छोड़ दिया है।

12. देश पहले से ही आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था, और आज के समय कोरोना ने अर्थव्यवस्था की हालत और खराब कर दी है, सेंसेक्स और निफ्टी की गिरती हुई स्थिति बहुत कुछ बयान कर देती है, ऐसी परिस्थिति में जब सब लॉक डाउन है, इकोनोमी कैसे आगे बढ़ेगी? आप माने या माने,आप लक्ष्मण रेखा पार करें ना करें, ये 21 दिन का लॉक डाउन हमें वाकई 21 साल पीछे ले जा सकता है, और अगर कोरोना पॉजिटिव मामले बढ़े, अगर कोरोना सामुदायिक प्रसार की तरफ बढ़ चुका है, तो शायद देश आर्थिक आपातकाल देखे या देश की हालत आर्थिक आपातकाल जैसी हो जाए, मैं नहीं चाहता के ऐसे हालात बनें। इस पर भी सरकार ने कभी गम्भीर होकर चिन्तन नहीं किया, जबकि हमारे सामने फ़्रांस, अमेरिका, चीन, स्पेन इत्यादि देशों के उदाहरण थे। क्या सरकार कोई अस्थाई टेंट या होस्पिटल बनवा रही है जिससे मरीजों को दिक्कत ना आए? या अब सोचना शुरू की है? ये दोनों ही सवाल चिंताजनक हैं। इसके साथ ही साथ चिंताजनक बात ये भी है के सरकार खुद इन विषम परिस्थतियों में भी अपने महत्वाकांशी और विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है, क्यों? इस सरकार की प्राथमिकताएँ आखिर हैं क्या? वर्तमान सरकार चाहती क्या है?

अंत में मैं लोगों से आग्रह करना चाहता हूँ के इस विकट परिस्थिति में किसी डॉक्टर से, एयरफ़ोर्स के क्रू मेम्बर से बदतमीजी ना करें, वो सभी इस समय आपकी हम सबकी सेवा के लिए अपनी खुद की जिन्दगी दांव पर लगा रहे हैं। कृपया काला बाजारी ना करें, पुलिस से आग्रह है के वो कम से कम उन लोगों को तंग ना करें जो इस वक्त लोगों के घर जरूरी सामान पंहुचा रहे हैं, इ टेलर से जुड़े व्यक्तियों ने शिकायत करी है के पुलिस ने 15000 लीटर दूध और 10000 किलो अन्य खाने पीने का सामान बर्बाद कर दिया, गो एयर अपने कर्मचारियों के वेतन ना काटे, पुलिस उन लोगों पर बल प्रयोग ना करे जो किसी मजबूरी में भूखे पेट खाने की तलाश में घर से निकले हों या ऐसे व्यक्ति जो अन्य राज्य से पैदल सफर करके अपने घर जा रहे हों, शाहीन बाग़ या उसकी तर्ज पर चल रहे आन्दोलन स्थल को खाली करवा लिया गया, कृपया किसी पर कोई केस दर्ज ना करें और जब सब ठीक हो जाए और सरकार उस वक्त भी NPR, NRC और CAA पर विरोध करने वाली जनता की ना सुने तो उन्हें दुबारा सविनय अवज्ञा करने दिया जाए, ये प्रजातान्त्रिक अधिकार है, कृपया इसे सहेज कर रखें। और अंत में केद्र सरकार क्या उत्तर प्रदेश सरकार पर कोई कार्यवाही करेगी? या उत्तर प्रदेश पुलिस? जब पूरा उत्तर प्रदेश लॉक डाउन है, जब रोज उत्तर प्रदेश में कोरोना के नये मामले आ रहे हैं तब इस प्रदेश के मुख्यमंत्री को भव्य राम मंदिर के निर्माण का पहला चरण पूरा करना जरूरी था, मन्दिर निर्माण हेतु 11 लाख का चेक देना जरूरी था या राज्य के लोगों की सेवा ज्यादा जरूरी था? आप सोचिये और तय कीजिये इस परिस्थिति में सरकार की बात मानते हुए सवाल पूछना है, सरकार को जिम्मेदारी का एहसास करवाना है या शांति से घर में सोना है, और सरकार का जय जय कारा करना है। आप जो आज तय करेंगे वही भविष्य का भारत होगा, नया भारत होगा।


Dr Anurag Pandey is Assistant Professor in University of Delhi. India.

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