Anurag Pandey ‘भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता: सिद्धांत, व्यवहार एवं वाद-विवाद

Updated: Sep 12

ABSTRACT

यह लेख भारतीय धर्मनिरपेक्षता कि स्थिति, विवाद एवं विभिन्न सिद्धांत और आलोचनाओं की परख करता है। कई विचारक धर्मनिरपेक्षता की शब्दावली पर प्रश्न खड़ा करते हैं एवं कई विचारक ये मानते हैं कि यह एक त्रुटिपूर्ण आधुनिकीकरण की अवधारणा है जो पाश्चात्य धर्मनिरपेक्ष राज्य के दर्शन से प्रभावित होकर भारतीय समाज पर थोपी गई है और जो धार्मिक लोगों के जीवन में समुदाय के महत्व को अस्वीकार करती है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत लेख भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा एवं विशेषताओं की पड़ताल करता है एवं भारत में धर्मनिरपेक्षता पर वैचारिक एवं प्रमाणिक सरंचनाओं पर चर्चा एवं उनका मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। अंत में इस लेख के माध्यम से ये जानने का प्रयास किया गया है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा आवश्यक क्यूँ है।


Key words: राज्य, धर्म, धर्मनिरपेक्षता, पुनर्जागरण, सैद्धांतिक दूरी


धर्म मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही किसी न किसी रूप में मानव-जीवन को प्रभावित करता रहा है। धर्म मानव का अपने से परे एक ऐसी शक्ति में विश्वास है जिससे वह अपनी संवेगात्मक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि एवं पूर्ति करता है। एक व्यापक अभिवृत्ति के रूप में धर्म मानव जीवन के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, व राजनैतिक सभी प्रवृत्तियों को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। कालान्तर में धर्म के विस्तार के साथ ही धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा ने भी जन्म लिया। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार- ‘‘धर्मनिरपेक्षता का मतलब "धर्म से स्वतन्त्र (निरपेक्ष) या गैर-आध्यात्मिक (अनाध्यात्मिक) या लौकिकता या सांसारिकता सम्बन्धी विचार है।"


धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) राज्य का एक आधुनिक दृष्टिकोण एवं सिद्धांत है। इस सिद्धांत का आविर्भाव पाश्चात्य समाज में हुआ। धर्मनिरपेक्षता को पश्चिमी समाज में पुनर्जागरण काल के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है, जिसने नवीन राज्य की रुप रेखा बनाने में अहम् भूमिका निभाई। इस दौर से पहले राज्य के राजनीतिक मामलों में धर्म (चर्च) का हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया था और राज्यो का सामंतवादी स्वरुप इस हस्तक्षेप को प्रश्रय भी दे रखा था। कुछ समय के पश्चात यूरोप एवं कई पश्चिमी राज्यों में औद्योगिक क्रांति आयी, इस क्रांति के फलस्वरूप सामंतवादी राज्य समाप्त हुआ और उदारवादी राज्यो ने जन्म लिया। इसी उदारवादी राज्य में व्यक्तियों के न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं अधिकारों पर विस्तृत परिचर्चा शुरू हुई। ये दौर नकारात्मक उदारवादी राज्य का दौर माना जाता था, जहाँ पूंजी एवं पूंजीपतियों के हित सर्वोपरि थे। राज्य के मामले में धर्म का हस्तक्षेप पूंजीवादी इस नए उदारवादी राज्य के लिए सुगम नहीं था, इसी वजह से राज्य से धर्म के "अलगाव सिद्धांत" का प्रतिपादन हुआ, जिसमे आधुनिक राज्य निर्माण की परिस्थितियों में मानव इतिहास और राजनैतिक संस्थाओं के नियंता के रूप में ईश्वर नहीं, बल्कि स्वयंजन या जनसमुदाय को मान्यता दी गई। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता पुनर्जागरण काल के कारण आयी आधुनिक बौद्धिकता के एक कारगार सैद्धान्तिक विमर्श के रूप में राज्य की गतिविधि में शामिल हुई और परिणामस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति के निजी जीवन में धर्म व अन्धविश्वास की बजाय विज्ञान और बुद्धि को महत्व मिलना शुरू हो गया।


जॉर्ज जेकब होलियाक को “सेक्युलरिज्म”शब्द का जनक माना जाता है। सन 1851 में जेकब ने धर्मनिरपेक्षता को पारिभाषित करते हुए कहा था कि “धर्मनिरपेक्षता भौतिक साधनों द्वारा मानव-कल्याण में अभिवृद्धि और दूसरों की सेवा को जीवन का आदर्श बनाने वाला एक प्रमुख साधन है। “उन्होंने धर्म के रूढ़िगत आयामों की आलोचना प्रस्तुत की और उनका ये भी विचार था कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ नास्तिक होना या धर्म विरोधी होना नहीं है। उन्होंने सभ्य समाज के धार्मिक आधार पर समाजवादी मानवतावादियों की तरह प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा कि ऐसे रूढ़िवादी धर्म से एक ग़रीब व्यक्ति को क्या लेना-देना है, जो अपनी शुरूआत ही उसे एक दीन-हीन प्राणी बताकर करता है और अन्त में उसे एक असहाय गुलाम बनाता है। एक ग़रीब व्यक्ति स्वयं को एक हथियार बन्द दुनिया में पाता है, जहाँ शक्ति ही ईश्वर है और गरीबी एक जंजीर। पर कालान्तर में चार्ल्स ब्राडलॉफनेसन् (1860) ने धर्मनिरपेक्षता के विचार को एक नया आयाम देने का प्रयास किया एवं धर्म निरपेक्षता का एक जटिल चेहरा प्रस्तुत किया, उनका मानना था के एक धर्मनिरपेक्षतावादी को कट्टर निरीश्वरवादी (नास्तिक) होना चाहिए। ब्राडलॉफ के इसी सैद्धांतिक दृष्टिकोण को मार्क्सवादियों, समाजवादियों और साम्यवादियों ने भी अपनाया।


अतः धर्मनिरपेक्षता के पाश्चात्य दृष्टिकोण के अनुसार, "धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत वह दर्शन है जिसमें परम्परागत धर्मों व आध्यात्मिकता की अवहेलना की जाती है एवं मानव को अपने पार्थिव हितों की ओर ध्यान देना सिखाया जाता है। इसके अनुसार ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद दोनों ही विचारों को उपेक्षित करना चाहिए क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति से इन्हें न तो स्वीकार किया जा सकता है और ना ही खण्डित। इस सिद्धान्त का प्रत्यक्षवादियों, अर्थ-क्रियावादियों, भाषा-विश्लेषणवादियों, तार्किकभाववादियों और कुछ अस्तित्ववादियों ने समर्थन किया एवं प्रतिपादन किया। जहाँ प्रत्यक्षवाद का मानना है कि ज्ञान की कुछ ऐसी भी विधियाँ हैं, जिनको आधार मानकर धार्मिक मान्यताओं, ईश्वरवादी कथनों एवं तत्ववैज्ञानिक सिद्धान्तों का खण्डन किया जा सकता है वहीं तार्किकभाववादियों ने सत्यापन के सिद्धान्त के माध्यम से तत्वविज्ञान का उन्मूलन किया व धर्मनिरपेक्ष चिन्तन की प्रवृत्ति का पोषण किया। ऐसे में धर्मों के प्रति उपेक्षा व तटस्थता या उदासीनता अपनाना ही पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार है।इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्षता एक ऐसा विचार है जो पश्चिमी जगत के साहित्य, धर्म एवं राज्य के पूर्ण पृथक्कीकरण का समर्थन करता है, जिसमे धर्म व्यक्तियों का निजी मामला है और राज्य का कार्य धर्म से निश्चित दूरी बनाते हुए राजनीतिक गतिविधियों का क्रियान्वयन करना है। कम शब्दों में राज्य का धर्म से पूर्ण पृथक्कीकरण, अर्थात राज्य धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि कानूनों के आधार पर चलेगा और धर्म व्यक्ति का निजी मामला होगा, जिसमें राज्य अहस्तक्षेप की नीति अपनाएगा, ये पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता मानी जाति है।


वैश्विक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता की दो प्रमुख अवधारणाएं देखी जाती है, जो निम्नलिखित है;

१. धर्मनिरपेक्षता की अमेरिकी अवधारणा।

२. धर्मनिरपेक्षता की फ़्रांसिसी अवधारणा।


धर्मनिरपेक्षता की अमेरिकी अवधारणा के अनुसार ना धर्म राज्य के मामलों में कोई हस्तक्षेप करेगा और ना ही राज्य व्यक्तियों के धर्मिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा। अमेरिका में राज्य एवं धर्म का पूर्ण पृथक्करण पाया जाता है, जहाँ धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और राज्य किसी धर्म का पोषण नहीं करता और ना ही राज्य का कोई धर्म होता है।


वही दूसरी ओर फ़्रांसिसी अवधारणा में राज्य की किसी भी गतिविधि में धार्मिक संस्थाओं का हस्तक्षेप पूर्णतः निषिद्ध है। फ्रांस में धर्म और राजनीति के मध्य सीधा विभाजन ही धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार है। किन्तु साथ ही साथ फ़्रांसिसी धर्मनिरपेक्षता धार्मिक मामलों में राज्य के तर्कशील हस्तक्षेप को उचित मानती है। तर्कशील हस्तक्षेप यह मांग करता है कि राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करते समय सभी धर्मों के साथ सामान व्यवहार करेगा।


धर्मनिरपेक्षता की फ़्रांसिसी अवधारणा समावेशी नहीं मानी जा सकती, सार्वजनिक जीवन में अगर सबको एक जैसा दिखाना शुरू करा दिया जाए तो लोग विरोध करेंगे, इसिलए जब सिख धर्म के मानने वालो से कहा गया के सार्वजनिक जीवन में वो पगड़ी नहीं पहनेंगे क्युकी सबको एक जैसा दिखना है, तब सिख धर्म के मानने वालों ने विरोध किया, जब मुस्लिम्स महिलाओं को हिजाब पहनने की मनाही की गई तब वो महिलायें भी हिजाब पहनकर इस फरमान का विरोध की जो हिजाब विरोधी हैं, वहीं अमेरिकी अवधारणा ज्यादा समावेशी है एवं ये सभी धर्म, संस्कृति, भाषा इत्यादि का सम्मान करती है, हालाकि वहां भी कुछ दक्षिण पंथी सोच वाले व्यक्ति हैं, जो अमेरिका सिर्फ अमरीकी के लिए का नारा लगाते हैं, रंग भेद करते हैं, हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी धर्मों का अनादर करते हैं, लेकिन अमरीकी राज्य ऐसी किसी भी घटना को स्वीकार नहीं करता और आरोप साबित होने पर अमरीकी कानून सजा भी देता है।


भारत में धर्मनिरपेक्षता

भारतीय परंपरा में पाश्चात्य मत से विपरीत धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-हीनता नहीं है, इसका अर्थ सभी धर्मो के प्रति समान आदरभाव एवं समान अवसर है, चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म का अनुयायी क्यों न हो। जहाँ पाश्चात्य राज्य धर्मनिरपेक्षता धर्म व आध्यात्मिकता की अवहेलना करती है, वहीं भारतीय राज्य सभी धर्मों के प्रति सहनशील होना व उन सबका समान रूप से आदर करने को धर्मनिरपेक्षता मानता है। वस्तुतः पाश्चात्य और भारतीय दोनों मत क्रमशः धर्मनिरपेक्षता के अभावात्मक एवं भावात्मक रूप का प्रतिपादन करते हैं पर इस अन्तर के बावजूद दोनों ही वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को अपनाते हुए बौद्धिक एवं वैज्ञानिक उपायों द्वारा व्यापक अर्थों में मानव-कल्याण का समर्थन करते हैं। इस प्रकार दोनों ही मत राज्य के कार्यों में किसी भी धर्म को संरक्षण नहीं देते हैं। दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि दोनों ही समाज राज्य के धर्म विहीन स्वरुप का समर्थन करते है। विस्तृत रूप में अगर कहा जाए तो धर्मनिरपेक्षता एक प्रकार का मानवतावादी जीवनदर्शन है जो राजनीति, प्रशासन व क़ानून इत्यादि को धर्म व सम्प्रदायों से पृथक रखते हुए एवं मानव को अलौकिक या दैवीशक्तियों पर आश्रित रहने के स्थान पर पूर्णतया आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देकर उसके वैयक्तिक और सामाजिक कल्याण का समर्थन करता है। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता हर व्यक्ति को बिना किसी भेद-भाव के स्वतन्त्र रूप में व्यक्तित्व विकास का अवसर देती है और इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता रूढ़िवाद, अन्धविश्वास, धार्मिक कट्टरता, सम्प्रदायवाद एवं संकीर्णतावाद आदि का परित्याग कर व्यापक अर्थों में समाज एवं राष्ट्र-निमार्ण का मार्ग प्रशस्त करती है।


भारतीय परम्परा में धर्म एक विस्तृत अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इसके अतिरिक्त भारत में धर्म को कर्तव्यपूर्ण न्यायसंहिता व नैतिकता से भी जोड़ा जाता है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के बयालीस वें संशोधन द्वारा धर्मनिरपेक्षता शब्द को जोड़े जाने का यह एक प्रमुख कारण है। धर्मनिरपेक्ष राज्य इस सिद्धांत पर आधारित है कि राज्य का विषयमात्र व्यक्तियों के मध्य अंतर- सम्बन्ध से है, व्यक्ति व ईश्वर के बीच सम्बन्ध से नहीं। यह सम्बन्ध व्यक्ति के अन्तःकरण का विषय है। भारत एक बहुसंस्कृति प्रधान देश है एवं विभिन्न समुदायों में एकता स्थापित करने और उनके मध्य बन्धुत्व स्थापित करने हेतु संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श रखा गया। इसका तात्पर्य यह है कि राज्य, बिना कोई भेदभाव किये, सभी सम्प्रदायों की समान रूप से रक्षा करेगा और किसी भी सम्प्रदाय को राज्य के धर्म के रूप में नहीं मानेगा।


संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद का प्रतिषेध करता है तो वही दूसरी ओर अनुच्छेद 25 से 28 तक में अन्तःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त भारत के संविधान में अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के लिए अनुच्छेद 29 में ये प्रावधान किया गया है कि राज्य अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों पर उनकी अपनी संस्कृति से भिन्न कोई अन्य संस्कृति अधिरोपित नहीं करेगा तो अनुच्छेद 30 में ये प्रावधान है कि अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों को अपनी रूचि की शिक्षा-संस्थाओं की स्थापना व प्रशासन का अधिकार होगा और राज्य ऐसी शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में अल्पसंख्यक वर्ग की शिक्षा संस्थाओं के विरूद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह किसी धार्मिक समुदाय के प्रबंधन में हैं। यहाँ पर स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी रूप में भारतीय धर्मनिरपेक्षता नकारात्मक नहीं वरन सकारात्मक है, दूसरे शब्दों में यह धार्मिक मामलों में युक्तिपूर्ण हस्तक्षेप की वकालत करता है, अर्थात समाज व्यवस्था में यदि कोई विशिष्ट कर्मकाण्ड या पूजा पद्धति लोक-स्वास्थ्य या सदाचार के विरूद्ध है या धार्मिक पद्धति का अभिन्न अंग नहीं है और किसी समाजिक, आर्थिक या राजनैतिक विनियमन करने वाली विधि का उल्लघंन करती है तो राज्य हस्तक्षेप कर सकेगा।[i]


अंत में ये कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा व्यापक तो है किन्तु सार्वभौमिक नहीं है, कहने का तात्पर्य यह है कि यह एक सापेक्षित संकल्पना है जो देशकाल और परिस्थति के हिसाब से बदलती रहती है। अतः धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती है और ना ही धर्मनिरपेक्षता का कोई एक प्रारूप किसी अन्य राज्य के लिए उपयुक्त हो सकता है। विश्व के जिस भी देश ने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को अपनाया है, वह उस देश की परिस्थितियों के हिसाब से अपनाया गया है। उदहारणस्वरुप पश्चिमी एवं यूरोपियन समाजों में धर्मनिरपेक्षता चर्च एवं राज्य के मध्य संघर्ष के कारण उदय होता है तो वही दूसरी ओर भारत जैसे बहुसंस्कृति समाज में इसकी उत्पत्ति विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य आपसी सामंजस्य एवं भाईचारे की भावना को स्थापित करने के लिए हुआ है।[ii] अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता की परम्परा सकारात्मक रूप में सर्वधर्म सम्भाव का पोषण करती है।


संविधान सभा एवं धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत कई मुद्दों से घिरा हुआ था एवं उन सभी मुद्दों का एक सकारात्मक समाधान खोजने का प्रयास किया जा रहा था ताकि एक सुद्रण राष्ट्र के रूप में खुद को स्थापित कर सके। देश के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न एक मजबूत संविधान का निर्माण करना था। संविधान निर्माण का कार्य “अप्रत्यक्ष रूप से चुनी हुई” संविधान सभा द्वारा संपन्न किया गया। अप्रत्यक्ष इसलिए क्युकी इसको चुनने के लिए सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार का प्रयोग नही किया गया था। डॉ सच्चिदानंद सिन्हा इसके पहले चेयरमैन नियुक्त किये गए, कुछ समय के पश्चात डॉ राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष एवं हरेन्द्र मुखर्जी इसके उप-सभापति चुने गए। इसी संविधान सभा ने कुछ समितियों का गठन भी किया, जिनमें ड्राफ्ट समिति महत्वपूर्ण थी, डॉ भीम राव अम्बेडकर को इस समिति का चेयरमैन नियुक्त किया गया। संविधान सभा ने कई मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की, जिनमे धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा एक महत्वपूर्ण विषय था। संविधान सभा में धर्मनिरपेक्षता को लेकर सदस्यों के मध्य विरोधी विचार थे। हांलाकि “धर्मनिरपेक्षता का स्वरुप क्या होगा?”, इस मुद्दे पर सीधे कोई चर्चा नही हुई, लेकिन “धर्मनिरपेक्ष राज्य कैसा होना चाहिए?”, इसपर काफी चर्चा एवं वाद विवाद हुआ। इसी मुद्दे को लेकर संविधान सभा में मुख्य रूप से तीन विचार प्रस्तुत किये गए और उन पर चर्चा हुई, ये तीनों विचार निम्नवत हैं,

पहला विचार संविधान सभा के कुछ सदस्यों की इस संकल्पना पर आधारित था के भारत को एक गणतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया जाना चाहिए। ये सदस्य मूलभूत अधिकारों सहित अन्य कई प्रावधानों से (जो राज्य की प्रवृति एवं कामकाज में धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करते थे), पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने मांग की कि "धर्मनिरपेक्ष" शब्द को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए। इन सदस्यों में के टी शाह प्रमुख थे, जो सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) शब्द को मूल संविधान में जोड़े जाने के प्रबल पक्षधर थे, उन्होंने नवम्बर/दिसम्बर सन 1949 में कई बार इस आशय का प्रस्ताव भी संविधान सभा के मध्य प्रस्तुत किया। संविधान सभा में एक दूसरे सदस्यों का समूह था, जिसने उपरोक्त दृष्टिकोण को सिरे से खारिज कर दिया और यह मांग की के धर्म को सार्वजनिक जीवन में स्थान मिलना चाहिए, हालाकिं उन्होंने सीधे तौर पर धर्मनिरपेक्षता का विरोध नहीं किया क्युकी धर्मनिरपेक्षता एक बहुसांस्कृतिक देश में एक आवश्यक विचार था, किन्तु इन सदस्यों ने अप्रत्यक्ष रूप से उपरोक्त प्रस्ताव को धार्मिक आधार से जोड़ने की कोशिश की क्युकी ये सदस्य भारत को एक धर्म आधारित एवं धर्म से जुड़ा हुआ देश मानते थे। ये सदस्य असल में सेक्युलर शब्द जोड़े जाने से सशंकित थे, इनकी शंका प्रमुखतया इस बात से थी के कहीं सेक्युलर शब्द जुड़ने से विभिन्न धार्मिक क्रियाकलापों पर इसका असर ना पड़े। इन सदस्यों में अधिकतर अल्पसंख्यक समुदाय से थे, जिनमे प्रमुख थे, फ्रैंक एन्थोनी, जो एंग्लो इंडियन समुदाय से थे, क़ाज़ी करीमुद्दीन, जेड एच लारी, बेगम एजाज़ रसूल एवं बी पोकर साहिब बहादुर, ये सदस्य मुस्लिम समुदाय से थे। इन सदस्यों का मुख्य संशय सार्वजनिक जीवन में हिन्दू संकृति के हावी हो जाने से था, इसिलए ये सदस्य सेक्युलर शब्द की खुल कर वकालत नहीं कर पाए और सार्वजनिक जीवन में धर्म की महत्ता स्वीकार करने की मांग किये। तीसरे समूह ने उपरोक्त दोनों बातों के बीच के रास्ते को चुना। इन्होने दुसरे समूह के धार्मिक पूर्वाग्रह को ख़ारिज किया और पहले समूह के सेक्युलर शब्द को संविधान में जोड़ने की वकालत का समर्थन नहीं किया। इस तीसरे समूह ने सेक्युलर शब्द जोड़ने की वकालत इसलिए नहीं की क्युकी इनका मानना था के सेक्युलर शब्द जोड़ना आवश्यक नहीं है क्युकी सेक्युलर राज्य के कई प्रावधान विभिन्न प्रावधानों से सुरक्षित किये जा चुके हैं, जेसे मौलिक अधिकार, राज्य ने संविधान की प्रस्तावना में ये विचार आत्मसात किया के अभिव्यक्ति एवं आस्था एवं धार्मिक शिक्षा संस्थानों में और ऐसे किसी भी संस्थान में जो धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं, राज्य द्वारा किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी। अतः इस समूह ने सेक्युलर शब्द को जोड़ने की वकालत नहीं की। इस समूह में मुख्य रूप से जवाहर लाल नेहरु एवं भीम राव अम्बेडकर का नाम आता है।

इस प्रकार संविधान सभा ने धर्मनिरपेक्षता को एक मूर्त रूप देने के लिए इन विचारों पर चर्चा करके प्रस्तुत विचारों के मध्य का रास्ता निकालने का प्रयास किया। इसी कारण भारत का धर्मनिरपेक्ष राज्य न केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा करता है बल्कि विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।[iii]


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग नही किया गया था, हालाँकि संविधान निर्माताओं ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया था और कुछ संवेधानिक प्रावधान किये जिससे धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों कि संस्कृति कि रक्षा सुनिश्चित की जा सके। अनुच्छेद २५ से २८ तक सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया एवं अनुच्छेद २९ और ३० के माध्यम से भाषाई एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी विशिष्ट पहचान एवं संस्कृति के संरक्षण का प्रावधान किया गया। किन्तु सन १९७६ में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में बयालीसवें संवेधानिक संशोधन के द्वारा धर्मनिरपेक्षता शब्द को जोड़ा गया। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर अलेक्जेंडर औविक्स ने लिखा है, “धर्मनिरपेक्षता भारत के संविधान के मूल का एक अभिन्न हिस्सा है, और इसका अर्थ सबके लिए समान स्वतंत्रता एवं सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव है।[iv]

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद २५ से २८)

भारतीय समाज एक धर्म आधारित समाज माना जाता है, इसलिए नागरिकों के लिए संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। संविधान में अनुच्छेद २५ से २८ तक धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है। इन अनुच्छेदों के द्वारा व्यक्ति के धार्मिक अधिकारों को मान्यता दी जाती है एवं सभी धर्मों को समान समझा जाता है, राज्य किसी धर्म विशेष के प्रति किसी भी प्रकार का झुकाव नहीं रखेगा और सभी धर्मों को समान समझेगा।दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि राज्य का अपना कोई धर्म नही होगा और ना ही राज्य अपने किसी धर्म कि स्थापना करेगा, संविधान के द्वारा सभी धर्म के व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को बिना किसी भेदभाव के सामान रूप से संरक्षण दिया गया है।

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25-28 में निहित है, जो सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुसार, यहां कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 सभी लोगों को विवेक की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा राज्य की सामाजिक कल्याण और सुधार के उपाय करने की शक्ति के अधीन होते हैं। इसमें प्रचार के अधिकार में किसी अन्य व्यक्ति के धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं है, क्योंकि इससे उस व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन होता है। अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक संप्रदायों तथा पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन करने, अपने स्तर पर धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाएं स्थापित करने और कानून के अनुसार संपत्ति रखने, प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है। ये प्रावधान राज्य की धार्मिक संप्रदायों से संबंधित संपत्ति का अधिग्रहण करने की शक्ति को कम नहीं करते। राज्य को धार्मिक अनुसरण से जुड़ी किसी भी आर्थिक, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि का विनियमन करने की शक्ति दी गई है। अनुच्छेद 27 की गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संस्था को बढ़ावा देने के लिए टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।अनुच्छेद 28 पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है तथा राज्य से वित्तीय सहायता लेने वाली शैक्षिक संस्थाएं, अपने किसी सदस्य को उनकी स्वीकृति के बिना धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने या धार्मिक क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

अनुच्छेद 29 व 30 में दिए गए सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, उन्हें अपनी विरासत का संरक्षण करने और उसे भेदभाव से बचाने के लिए सक्षम बनाते हुए सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के उपाय हैं।अनुच्छेद 29 अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति रखने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को उनका संरक्षण और विकास करने का अधिकार प्रदान करता है, इस प्रकार राज्य को उन पर किसी बाह्य संस्कृति को थोपने से रोकता है।यह राज्य द्वारा चलाई जा रही या वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं को, प्रवेश देते समय किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव करने से भी रोकता है। हालांकि, यह सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए राज्य द्वारा उचित संख्या में सीटों के आरक्षण तथा साथ ही एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा चलाई जा रही शैक्षिक संस्था में उस समुदाय से संबंधिक नागरिकों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटों के आरक्षण के अधीन है।[v]

अनुच्छेद 30 सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी स्वयं की संस्कृति को बनाए रखने और विकसित करने के लिए अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का अधिकार प्रदान करता है और राज्य को, वित्तीय सहायता देते समय किसी भी संस्था के साथ इस आधार पर कि उसे एक धार्मिक या सांस्कृतिक अल्पसंख्यक द्वारा चलाया जा रहा है, भेदभाव करने से रोकता है। हालांकि शब्द "अल्पसंख्यक" को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ है कोई भी समुदाय जिसके सदस्यों की संख्या, जिस राज्य में अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अधिकार चाहिए, उस राज्य की जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम हो। इस अधिकार का दावा करने के लिए, यह जरूरी है कि शैक्षिक संस्था को किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित किया गया हो। इसके अलावा, अनुच्छेद 30 के तहत अधिकार का लाभ उठाया जा सकता है, भले ही स्थापित की गई शैक्षिक संस्था स्वयं को केवल संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय के धर्म या भाषा के शिक्षण तक सीमित नहीं रखती, या उस संस्था के अधिसंख्य छात्र संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध नहीं रखते हों। यह अधिकार शैक्षिक मानकों, कर्मचारियों की सेवा की शर्तों, शुल्क संरचना और दी गई सहायता के उपयोग के संबंध में उचित विनियमन लागू करने की राज्य की शक्ति के अधीन है।[vi]

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विचारकों द्वारा आलोचना


धर्मनिरपेक्षता के विचार के मुख्य आलोचकों में टी एन मदन, आसीस नंदी, और पार्था चटर्जी प्रमुख हैं। इनका मौटे तौर पर ये मानना है कि “भारत जैसे बहु-धर्मी राष्ट्र में धर्मनिरपेक्षता एक अस्वीकार्य आधुनिक अवधारणा है क्यूंकि ये धर्म को राजनीति या राज्य से अलग करती है, भारत में धर्म बहुत गहराई तक समाया हुआ है और इसको सार्वजानिक जीवन से अलग नहीं किया जा सकता, भारत में धर्मनिरपेक्षता पश्चिम से ली हुई एक थोपी हुई अवधारणा है।“


उदाहरण के लिए आशीष नंदी, जो धर्मनिरपेक्षता के आधुनिक संस्करण के आलोचकों में से एक हैं, ये बताते हैं कि नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता, जो राज्य और धर्म को अलग करती है, भारतीय जनमानस पर एक थोपी गई अवधारणा है, ये एक आधुनिक पश्चिमी पैकेज का हिस्सा है जिसका झुकाव वैज्ञानिक विकास, राष्ट्र निर्माण और विकास की ओर है। नंदी आगे कहते हैं कि, धर्मनिरपेक्षता की इस अवधारणा को स्वीकार करने का मतलब है कि देश प्रगति और आधुनिकता के नाम पर एक न्यायोचित दिखने वाले ‘वर्चस्व’ स्थापित करने के नए आयाम विकसित करना चाहता है, और आधुनिक विचारधाराओं को हिंसा के प्रयोग से बनाने और उन्हें स्थापित करने के लिए एक नए विचार के रूप में जनता को देना चाहता है।”[vii] नंदी का कहना है कि नेहरु द्वारा प्रतिपादित यह ‘आधुनिक पश्चिमी तर्कसंगत-वैज्ञानिक धर्मनिरपेक्षता’ राजनीति से धर्म को खत्म करने या अलग करने में नाकाम रही है,और इसीलिए धर्मनिरपेक्षता का यह रूपनैतिक या राजनीतिक कार्यों का मार्गदर्शन नहीं कर सकती है। बल्कि यह धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता का रास्ता खोलती है, जिसको उत्पन्न ना होने देने की या जिसे ख़त्म करने का दावा ये धर्मनिरपेक्षता करती है।नंदी के मुताबिकसबसे अच्छा संभव विकल्प तो गैर आधुनिक, धर्मनिरपेक्षता के पूर्व वाले स्थापित धर्म में ही है, जिसमें विभिन्न धर्मों को सहिष्णुता के मार्ग से या जीवन जीने के मार्ग से आपस में समायोजित किया जा सकता है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता जनमानस को नजदीक लाने में असफल रही है,नंदी अंत में गांधी की आधुनिकता विरोधी और धर्मनिरपेक्षता विरोधी बातों को समाहित करते हैं, उनके अनुसार गांधी द्वारा बताये गए धर्म और राजनीति के समागम से ही सच्ची सहिष्णुता हासिल की जा सकती है। धर्मनिरपेक्षता एक विचारधारा के रूप में असफल रही है और गाँधी द्वारा दिखाए गए रास्ते से ही धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता से लड़ा जा सकता है।[viii]


इसी तरह, टी एन मदन ने भी कहा है कि धर्म और राजनीति दोनों का समान महत्व है और इसलिए, इनको एक दूसरे से अलग करना अनुचित होगा। मदन गांधी के विचारों का समर्थन करते हुए कहतें हैं कि गाँधी का विचार धर्म एवं राजनीति के समागम पर बल देता है और साथ ही साथ उनका विचार सर्व धर्म समभाव में विश्वास करता है जिससे अंतर्धार्मिक सहिष्णुता को भी बढ़ावा मिलता है। उनके शब्दों में, "दक्षिण एशिया में धर्मनिरपेक्षता तभी सफल हो सकती है जब हम धर्म और धर्मनिरपेक्षता दोनों को गंभीरता से लें, धर्म की सिर्फ इस आधार पर आलोचना नहीं की जानी चाहिए क्युकी उसमे अंधविश्वास होता है ओर धर्मनिरपेक्षता को सिर्फ साम्प्रदायिकता से लड़ने का यंत्र नहीं समझा जाना चाहिए और ना ही इसको किसी फायदे के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। दुसरे शब्दों में किसी एक को किसी दुसरे पर वरीयता नहीं दी जा सकती, दोनों ही विचार समान रूप से महत्वपूर्ण है।[ix]


पार्था चटर्जी का तर्क है कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली हिंदू बहुसंख्यकवाद का मुकाबला करने के लिए अपर्याप्त एवं असमर्थ है, और इसके स्थान पर धार्मिक सहिष्णुता का विचार प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक कट्टरता की वजह से विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य सहिष्णुता ख़त्म होती जा रही है, और इसी वजह से दंगे, धार्मिक गोलबंदी इत्यादी देखने को मिल रही है, धर्मनिरपेक्षता लोगों के मध्य सहिष्णुता स्थापित करने में असफल रही है, जिस वजह से हिन्दू बहुसंख्यकवाद अपनी जड़े फैला रहा है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल रही है इसलिए भारत को धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर किसी अन्य विचारधारा की जरुरत है। यहाँ चटर्जी सहिष्णुता की अवधारणा देते हैं, एवं विभिन्न समूहों के मध्य प्रतिनिधि लोकतंत्र की राजनीति को शामिल करने की सिफारिश करते हैं, ताकि राज्य द्वारा सुधारवादी हस्तक्षेप से मुक्त होकर आंतरिक सुधारों की परिस्थितियां उत्पन्न हो सकें और आपसी सहिष्णुता के लिए एक सशक्त मार्ग का सृजन किया जा सके।[x]


राजीव भार्गव का दृष्टिकोण एवं आलोचनाओं का जवाब


राजीव भार्गव धर्मनिरपेक्षता की आलोचना को सिरे से नकारतें हैं और कहतें है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता को पश्चिमी विचार से तुलना नहीं की जानी चाहिए क्युकी भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के विचार से बिलकुल अलग है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के अनुसार राज्य धर्मों के मध्य एक "सैद्धांतिक दूरी" (Principled Distance )रखता है। यहाँ भार्गव प्रासंगिक धर्मनिरपेक्षता (contextual secularism) की बात करतें है, इसका मतलब है कि या तो राज्य कुछ मामलों में हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने से बचता है, अतः राज्य इन दोनों सिद्धांतों के सहारे धार्मिक स्वतंत्रता, निजी स्वतंत्रता और नागरिकता की समानता के मूल्यों के साथ न्याय करता है।[xi]


इसके पश्चात भार्गव राजनितिक एवं नैतिक धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं। नैतिक धर्मनिरपेक्षता हालाँकि जमीनी सच्चाई से दूर है, जिसमे भार्गव का ये मानना है कि सभी धर्मों के लोग स्वयं ही धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को समाहित करतें है, जिससे आपसी विश्वास अपने आप ही जगता है और लोग एक दूसरे के विश्वास, परम्पराओं इत्यादि को मान्यता देते हैं, किन्तु यह एक दूर की कौड़ी है। इसी कारण भार्गव राजनितिक धर्मनिरपेक्षता को नैतिक धर्मनिरपेक्षता पर वरीयता देतें हैं।[xii]


भार्गव राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता को तीन अलग संस्करणों में बाटते हैं, जिनमें पहली, (क) हाइपर-सेंसिटिव धर्मनिरपेक्षता है जो धर्म को राजनीति से अलग करती है, दूसरी, (ख)) अल्ट्रा-प्रोसिड्यूरल धर्मनिरपेक्षता है ये भी धर्म को राजनीति से अलग करने की वकालत करती है। किन्तु ये दोनों ही संकल्पनाए धर्मनिरपेक्षता के सैद्धांतिक दूरी के सिद्धांत की वकालत नहीं कर सकते हैं। अंत में तीसरी, (ग) कोंटेक्स्चुअल धर्मनिरपेक्षता, भार्गव के अनुसार यही नीति ‘राजनीति एवं धर्म’ के मध्य एक सैद्धांतिक दूरी रखने की अनुमति देती है।[xiii]

भार्गव इसी कोंटेक्स्चुअल धर्मनिरपेक्षता को अपना मत देतें हैं और कहतें हैं कि सैद्धांतिक दूरी के द्वारा ही व्यक्तियों के सम्मानजनक जीवन को सुरक्षित रखा जा सकता है, धार्मिक भेदभाव को खत्म किया जा सकता है, धार्मिक कट्टरता को रोका जा सकता है, धर्म के आधार पर दंगों को रोका जा सकता है एवं हिंसा पर काबू पाया जा सकता है। अंत में जिन वजहों से धर्मनिरपेक्षता के आलोचक धर्मनिरपेक्षता की आलोचना करतें हैं, उन्ही वजहों को रोकने के लिए एवं उन पर लगाम कसने के लिए धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की आवश्यकता है। [xiv]

अमर्त्य सेन के विचार


भारत के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को सिरे से नकारने वाले विचारकों को अमर्त्य सेन भी जवाब देते हैं, सेन का ये कहना है कि भारत को पकिस्तान का हिन्दू प्रतिरूप कहना न्यायोचित नहीं है, जहाँ पकिस्तान एक घोषित इस्लामिक देश है, जहाँ नियम, कानून इत्यादि इस्लामिक शैली के आधार पर ही तय होते हैं वही भारत में हिन्दू शैली नही है, भारतीय राज का अपना कोई धर्म नहीं है और राज्य सभी धर्मों को समान रूप से देखता है।

हिन्दू राष्ट्रवादियो द्वारा भी भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचना की गयी है, वो इसे छदम-धर्मनिरपेक्षता कहतें है जिसने हमेशा मुस्लिम्स का पक्ष लिया है और हिन्दुओ का अहित किया है। सेन इस आलोचना को सिरे से नकार देते हैं, उनका कहना है कि ये आरोप सिर्फ राजनितिक एवं चुनावी फायदों के लिए लगाये गए है, ताकि धर्म विशेष के व्यक्तियों को धर्म के नाम पर गोलबंद किया जा सके।


दूसरी आलोचना कहती है के भारतीय धर्मनिरपेक्षता समूह की पहचान को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखती है। सेन इस तर्क को भी नकारते हैं और कहते है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता दोनों पहचानों को अपने में समाहित करती है, कोई व्यक्ति धार्मिक होने के साथ साथ राष्ट्रवादी भी हो सकता है, वो इस बात को सिद्ध करने के लिए गांधी का उदहारण देते है जो अपने निजी एवं सार्वजानिक जीवन में धार्मिक थे और साथ ही साथ राजनितिक जीवन में एक राष्ट्रवादी, उन्होंने अपने इन दोनों जीवनों में कभी कोई विरोधाभास नहीं आने दिया।


नंदी के धर्मनिरपेक्षता के आधुनिकता विरोधी होने के दावों के जवाब में सेन कहते है के आधुनिकता को परिभाषित करना आसान नहीं है, यह सही है के मध्यकालीन भारत में एक सहिष्णु समाज कि स्थापना हुई थी, क्युकी उस काल में हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के मध्य सहमती के कुछ प्रारूप मौजूद थे और आजादी के बाद के भारत में इस तरह के प्रारूप का अभाव रहा है, जिस वजह से समुदायों के मध्य एक प्रकार कि दूरी नजर आती है, किन्तु इनको नजदीक लाने के लिए सहमती के आधुनिक प्रारूपों कि खोज जारी है, और अगर आधुनिक युग में समुदायों के मध्य हिंसा कि घटनाये बढ़ी है तो इसका मतलब ये नही है कि धर्मनिरपेक्षता असफल हो गयी है, बल्कि इसी हिंसा को रोकने के लिए धर्मनिरपेक्षता की जरूरत है।


कुछ आलोचक ये आरोप लगते हैं कि भारत कि धर्मनिरपेक्षता देश कि सांस्कृतिक पहचान को सिरे से ख़ारिज कर देती है क्युकी भारतीय संस्कृति शुरू से हिन्दू संस्कृति का पर्याय रही है और सभी संस्कृतियों को समान रूप में रखकर ये एक सांस्कृतिक विषमता पैदा कर रही है। सेन कहते है कि भारत की संस्कृति को सिर्फ हिन्दू संस्कृति मानना एक संकीर्ण विचार है, क्युकी देश कि संस्कृति सभी संस्कृतियों से मिलकर बनी है, इसलिए भारत को एक बहु-संस्कृतिक देश कहा जाता है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ देश कि मुख्य धारा में अपने को समाहित करती हैं।[xv]


हिन्दू राष्ट्रवादी विचारक, गाँधी-नेहरु और भारतीय धर्मनिरपेक्षता


भारत को सन 1947 में आजादी मिली किन्तु विभाजन के मर्म एवं देश में साम्प्रदायिकता और दंगों से उत्पन्न हुई परिस्थितियों ने देश के सम्मुख धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। ये दौर भारतीय इतिहास में उथल पुथल का दौर था और आजादी के पश्चात कई राजनितिक दल एवं नेता धार्मिक गोलबंदी के कारण भारत को भी पाकिस्तान की तर्ज पर एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे। किन्तु संविधान सभा के कई सदस्य एवं देश के संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता की वजह से भारत कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों के विचारों से प्रभावित नही हुआ और अपनी धर्मनिरपेक्ष राज्य की छवि को बनाये रखने में सफल रहा। इस छवि को बनाये रखने में गाँधी, नेहरु एवं अम्बेडकर की प्रजातंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता के विचारों के प्रति आगाध निष्ठा का मुख्य योगदान रहा।


भारत में धर्मनिरपेक्षता की विरासत को “गाँधी-नेहरु विरासत”के नाम से भी जाना जाता है, दोनों ही बहुलवाद (आज का बहुसंस्कृतिवाद) में विश्वास रखते थे और भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में विकसित करना चाहते थे, किन्तु दोनों के धर्मनिरपेक्षता संबंधी विचार बिलकुल अलग थे। गाँधी अपने निजी एवं सार्वजानिक जीवन में एक धार्मिक व्यक्ति थे और वे राजनीति और धर्म के पृथक्करण के विरुद्ध थे क्युकी गाँधी राजनीति को नैतिक मूल्यों पर आधारित करना चाहते थे और इसीलिए वो राजनीति एवं धर्म के मध्य अटूट संबंध का समर्थन करते थे।


वही दूसरी ओर नेहरु धर्म और राजनीति को अलग रखना चाहते थे, वो भारत को एक धर्म निरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे, जिसमे राज्य एवं धर्म अलग अलग संस्था थी। धर्म को वो निजी मामला मानते थे और इसके राजनीति में समागम के विरोधी थे। नेहरु ये मानते थे कि राज्य बिना किसी धर्म के प्रति झुकाव लिए हुए होना चाहिए।[xvi]


हांलाकि दोनों ही नेता भारत जैसे बहुसंस्कृति वाले देश में धर्मनिरपेक्षता को विभिन्न धर्मों के मध्य सदभाव एवं भाई-चारा स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम मानते थे। और देश कि आजादी के बाद एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय पहले की साम्प्रदायिक दंगों कि घटनाओं ने गाँधी को धर्म एवं राजनीति पर उनके विचारों को पुनर्विवेचन के लिए मजबूर किया और गाँधी को लगने लगा के उनके सिद्धांत साम्प्रदायिक ताकतों को धर्म के नकारात्मक इस्तेमाल का मौका दे सकता है और भारत धार्मिक कट्टरता की ओर उन्मुख हो सकता है, अतः 40 के दशक के आस पास गाँधी खुद धर्म को व्यक्ति का निजी मामला मानने लगे थे।


ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता को लेकर सिर्फ यही विचार थे, सूक्ष्म पड़ताल करने पर ज्ञात होता है कि पंडित दीन दयाल उपाध्याय एवं श्री अटल बिहारी बाजपाई ने भी धर्मनिरपेक्षता पर अपने विचार रखे। हालांकि ये विचार नेहरु एवं गांधी के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों से अलग है। पंडित दींन दयाल उपाध्याय पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का विरोध करते थे और इस विचार को उन्होंने भारतीय समाज एवं राज्य के लिए उपयुक्त नहीं माना, वे भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में देखना तो चाहते थे जहाँ सर्व धर्म समभाव का सिद्धांत ही मान्य होना चाहिए ना की पश्चिम से उधार ली हुई कोई अवधारणा।[xvii] उनके अनुसार पश्चिमी अर्थ में सेक्यूलर राज्य का अर्थ लौकिक राज्य ही लगाया जा सकता है, किंतु भारतीय जनता ‘धर्मराज्य’ या ‘रामराज्य’ को पाना चाहती है और वह केवल लौकिक उन्नति में ही संतोष नहीं कर सकती। भारतीयता की स्थापना भी केवल एकांगी उन्नति से नहीं हो सकती है, क्योंकि भारतीयों ने लौकिक और पारलौकिक उन्नति को एक दूसरे का पूरक ही नहीं, एक दूसरे से अभिन्न माना है। किंतु पारलौकिक उन्नति के क्षेत्र में राज्य की ओर से किसी एक मत की कल्पना अनुचित होगी अत: उसे द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करना होगा जिसमें सभी मत बढ़ सकें।

फलत: हमारे राज्य के लिए 'लौकिक राज्य' सेक्यूलर स्टेट को ठीक पर्याय होने पर भी मौजूद नहीं होगा। धर्म शब्द की उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार यह शब्द अंग्रेजों के रिलीजन का पर्यायवाची न होकर उससे भिन्न है तथा व्यापक अर्थवाला है। हमारे यहाँ बिना धर्म के तो किसी के भाव की, उसके अस्तित्व की ही कल्पना कठिन है। फलत: हम समझते हैं कि हमारा राज्य धर्म को तिलांजलि नहीं दे सकता; अत: अधार्मिक, धर्मनिरपेक्ष, धर्मरहित, धर्महीन, धर्म विरत आदि सभी शब्द न तो हमारे राज्य के आदर्श को ही प्रकट करते हैं और न सेक्यूलर स्टेट के ठीक पयार्य हो ही सकते हैं।[xviii]


मत और धर्म के मध्य भेद


दीन दयाल उपाध्याय का कहना था के अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का पर्यायवाची शब्द भारत में ‘मत’ से है तथा एक मत के माननेवाले वयाक्तिओं के समूह को संप्रदाय कहा जाता है, उदाहरणस्वरुप शैव संप्रदाय, वैष्णव संप्रदाय इत्यादि। निश्चित ही ना तो पहले का भारतीय राज्य और ना ही आज का भारतीय राज्य इनमें से सिर्फ किसी एक संप्रदाय को मानने वाला होगा। राज्य की दृष्टि सब सम्प्रदायों के लिए समान होनी चाहिए। अतः इसी आधार पर दीन दयाल उपाध्याय ये विचार रखतें हैं कि राज्य को सेक्युलर या साम्प्रदायिक न होकर असांप्रदायिक होना चाहिए और राज्य का यही सही आदर्श भी है। ऐसा राज्य किसी सम्प्रदाय विशेष के प्रति पक्षपात या किसीके प्रति घृणा का व्यवहार न करते हुए भी जीवन की लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हुए एक धर्मराज्य हो सकता है।[xix] अतः वो भारत को सेक्युलर राज्य नहीं बल्कि असाम्प्रदायिक राज्य बनाना चाहते थे।


धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर असांप्रदायिक शब्द का प्रयोग


दीन दयाल उपाध्याय के अनुसार 'असांप्रदायिक' शब्द से सिर्फ राज्य के ठीक-ठीक आदर्श का ही पता नहीं चलता बल्कि यह अंग्रेजी के 'सेक्यूलर शब्द' के शाब्दिक नहीं तो पाश्चात्य व्यवहारिक अर्थ के भी यह बहुत निकट जाता है। रूस के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य ने कभी रिलीजन (मत) को समाप्त नहीं किया और अब तो रूस में भी पूजा स्वातंत्र्य को मान लिया गया है,यद्यपि राज्य की ओर से किसी व्यक्ति या समुदाय को कोई सुविधा नहीं मिलेगी। शेष सभी राज्यों में सभी संप्रदायों को अपने मत के द्वारा आत्मिक, शारीरिक स्वतंत्रता है एवं इंग्लैंड के राजा को छोड़कर शेष कहीं किसी संप्रदाय विशेष के प्रति पक्षपात नहीं है। अत: उन राज्यों को भी पवित्र रोमन साम्राज्य के विरोध में चाहे लौकिक समझा जाए, किंतु असांप्रदायिक कहना ही अधिक युक्तिसंगत होगा। उपाध्याय आगे कहतें हैं कि 'असांप्रदायिक' शब्द के द्वारा हमारे नेताओं का अर्थ भी अधिक स्पष्ट होता है, क्योंकि आज सेक्यूलर शब्द का प्रयोग केवल पाकिस्तान से (जिसने अपने आपको 'इस्लामी राज्य' घोषित किया है) भिन्नता दिखाना ही है। भारत 'इसलामी राज्य' के समान किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं है यही हमारे नेता प्रकट करना चाहते हैं, और इसके लिए उन्होंने सेक्यूलर शब्द को चुना है। अंत में वो कहतें हैं कि भारतीय राज्य को एक आदर्श राज्य घोषित करते समय हमारे नेताओं के मस्तिष्क में जो प्रधान धारणा रही वह 'असांप्रदायिक' शब्द से ही अधिक व्यक्त होती है। उपर्युक्त सभी कारणों में से ‘असांप्रदायिक’ शब्द ही सेक्यूलर का निकटतम भाषांतर है और उसीका प्रयोग किया जाना चाहिए।[xx] अतः दीन दयाल उपाध्याय भारत को एक ‘सेक्युलर राज्य’ कहलाने के बदले ‘असांप्रदायिक राज्य’ की संज्ञा दिलाये जाने के पक्षधर थे।


भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपाई भी भारतीय राज्य के सेकुलरिज्म शब्द को पश्चिम से आयातित एक अवधारणा मानते हैं। उनके अनुसार भारत ने पश्चिम की तरह ही धर्म को राजनीति से अलग कर दिया है, बाजपाई धर्म को अंग्रेजी के रिलिजन शब्द का पर्यायवाची नहीं मानते उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति रिलिजन को ना भी मानता हो तब भी वो धर्म का पालन करने वाला हो सकता है। उनके अनुसार धर्म के दो अर्थ हैं, पहले अर्थ में धर्म का तात्पर्य है ध्री या धातू, जिसका अर्थ है किसी वस्तु को सम्हालना या सहेज कर रखना, जिससे वो वस्तु अपने मूल स्वरुप में ही रहती है, और दुसरे अर्थ में धर्म का तात्पर्य है कर्तव्य। अतः धर्म का सामाजिक क्षेत्र में विशेष महत्व है।वहीं दूसरी ओर रिलिजिन का तात्पर्य है विश्वास, आस्था, और व्यक्ति जब तक किसी विश्वास या आस्था से जुड़ा हुआ है वो उस उसी विश्वास या आस्था से सम्बंधित रिलिजिन को मानने वाला माना जायेगा/जायेगी। अतः जहाँ धर्म को एक जीवन का रास्ता माना जा सकता है वहीँ रिलिजन आस्था से जुडा हुआ मामला है। यहाँ वो अंग्रेजी के रिलिजन को हिन्दी के पंथ से जोडते हैं और भारत में धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर पंथनिरपेक्षता शब्द की वकालत करतें हैं, तथा साथ ही साथ वो गांधी के सर्व धर्म समभाव को भारतीय पंथनिरपेक्षता के लिए आवश्यक मानते हैं, सर्वधर्मसमभाव का मूल अर्थ है “बिना भेदभाव के सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान एवं आदर। और बाजपाई भी इसी पंथनिरपेक्षता के समर्थक थे।[xxi]


भारतीय राजनीति में धर्म एवं धर्मनिरपेक्षता: एक संक्षिप्त विवरण


सन १९८० का दौर भारतीय राजनीति में उथल पुथल भरा दौर रहा, जहाँ एक और कांग्रेस के विभाजन से उत्पन्न हुई परिस्थितियां थी वहीं दूसरी और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन (हिंदुत्ववादी) धीरे धीरे जनमानस में अपनी पैठ बनाने कि कोशिश कर रहे थे। धर्म का राजनीति में प्रयोग बढ़ता जा रहा था और भारतीय जनमानस पर एक नयी “पहचान” थोपने का कार्य किया जा रहा था।


हिंदुत्ववादी संगठनो द्वारा धर्म का प्रयोग इंदिरा गांधी के काल में तेज हुआ, हालांकि वो आजादी के बाद से ही सक्रिय थे, किन्तु उनका प्रभाव नगण्य ही था। सन १९८० के आस पास हिंदुत्ववादी संगठनों ने भारतीय राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए उग्र नीतियों का सहारा लिया।[xxii] शाह बानो आन्दोलन और उसके बाद राम जन्मभूमि आन्दोलन ने इन संगठनों को राजनैतिक मदद और वैधता दी।


इन संगठनों ने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को छद्म-धर्मनिरपेक्षता (Pseudo-secularism) कहा क्युकी इनके अनुसार ये मुस्लिम्स के "तुष्टिकरण" पर आधारित थी, और हिन्दुओं को सच्चा धर्मनिरपेक्ष और इसी धर्मनिरपेक्षता को ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’ घोषित किया, क्युकी हिन्दू राष्ट्रवादियों के अनुसार भारत में हिन्दू ही सहिष्णु हैं और हिन्दुओं की वजह से ही भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बन पाया। छद्म धर्मनिरपेक्षता का विचार देने से से पहले हिंदुत्ववादी संगठन धर्मनिरपेक्षता को सिरे से नकार देते थे, उनका मानना था के भारत को धर्मनिरपेक्ष नहीं होना चाहिए बल्कि भारत को एक हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए और गोलवलकर के सिद्धांतों को मानते हुए हिंदुत्ववादी संगठनों ने दूसरे धर्म के मानने वालों को द्वितीयक नागरिक घोषित करने की वकालत की। लेकिन कुछ समय पश्चात जब इन्हें धर्मनिपेक्षता का महत्व समझ आया तब हिंदुत्ववादी संगठनों ने हिन्दुओं को असली धर्मनिरपेक्ष कहना शुरू कर दिया, और अल्पसंख्यकों को धर्मनिपेक्षता विरोधी और यहीं से अपनी 'सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता' की अवधारणा को विकसित किया। इसके साथ ही साथ इन हिन्दुत्ववादियों ने स्वयं को असली धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और कांग्रेस एवं अन्य दलों की धर्मनिरपेक्षता को छद्म धर्मनिरपेक्षता घोषित किया।


इसके बाद हिन्दुत्ववादियों के तुष्टिकरण के विचारों की आलोचना शुरू हुई, क्युकी अगर मुस्लिम्स का तुष्टिकरण हुआ होता तो देश के सर्वोच्च पदों पर अधिकतर मुस्लिम्स ही होते, बड़े बिजनेस घरानों में कुछ मुस्लिम्स के भी होते, शिक्षा का स्तर सबसे ज्यादा नहीं तो प्रतिस्पर्धा की स्थिति में होता वगेरह, अब क्युकी ऐसा था नहीं तब इन्ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने आलोचनाओं को देखते हुए 90 का दशक आते आते तुष्टिकरण को चुनावी राजनीति से जोड़ा और कहा के मुस्लिम्स को सिर्फ वोट बेंक की तरह से बाकी दलों ने प्रयोग किया है और हिन्दुओं को संगठित करने पर बल दिया और हिन्दुओं से कई बार अपील करी के मुस्लिम्स की तरह से एक जुट होकर वोट करें और वोट सिर्फ हिंदुत्ववादी दल (भारतीय जनता पार्टी) को करें। ये किसी भी तरह से सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता नहीं कही जा सकती है, क्युकी इसमें धर्म के आधार पर लामबंद होने की अपील की जा रही है और धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत धर्म को निजी मामला मानता है, राजनैतिक हथियार नहीं। इसी वजह से धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत हिंदुत्ववादी संगठनों को रास नहीं आता।


धर्म आधारित राजनीति ९० के दशक में अपने चरम पर पहुची और धर्म के आधार पर एक नयी पहचान भारतीय समाज पर थोपी गयी, जिसकी परिणिति कई रथ यात्राओं में, साम्प्रदायिक दंगों में एवं अंत में बाबरी मस्जिद विध्वंस के रूप में सामने आई। मस्जिद विध्वंस के बाद देश में कई जगहों पर साम्प्रदायिक दंगों कि घटनाएं देखने को मिली, जिसने हिन्दू-मुस्लिम्स के मध्य धर्म की एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी थी। [xxiii]


मुस्लिम्स अभिजन (मुख्यतः राजनीतिक दल के नेता एवं धर्म गुरु) भी पीछे नहीं थे, मुस्लिम अभिजन द्वारा धर्म का प्रयोग भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर एक तीखे हमले के रूप में कई विचारकों द्वारा देखा गया है।मुस्लिम राजनीतिक अभिजन के द्वारा जो ‘मांग की नीति’ (पॉलिटिक्स ऑफ़ डिमांड) अपनाई गई, उसकी कई विचारकों ने आलोचना प्रस्तुत की।[xxiv]


इस दौर की इन्ही सब परिस्थितियो की वजह से कई विचारकों ने धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किये, और इसकी एक विचारधारा के रूप में असफलता पर आलोचना प्रस्तुत की। उदाहरणस्वरुप केरल के मोपला मुस्लिम समुदाय ने उनके लिए एक अलग जिले की मांग की जिसे सन १९६९ में स्वीकार कर लिया गया, आन्ध्र प्रदेश की मजलिसे इत्ताहदुल मुसलमीन ने भारतीय सरकार से एक गुजारिश की थी के सभी भारतीय मुसलामानों के लिए भारत की संप्रभुता के अंदर एक अलग राज्य विशाखापत्तनम एवं मद्रास के पूर्वी तटों के मध्य बना दिया जाए, हालांकि ये मांग स्वीकार नहीं की गयी,[xxv] १९९४ में संपन्न हुए सम्मलेन में Association for Promoting Education and Employment of Muslims एवं All India Muslim Majlis i-Mushawarat ने देश के सभी मुसलामानों को पिछड़ा हुआ समझा जाए और उनके लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाए। इसके अतिरिक्त मुस्लिम अभिजन का शाह बानो आन्दोलन में रवैया, दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम का मुस्लिम की गोलबंदी, सय्यद शहाबुद्दीन का मुस्लिम्स से ये आग्रह के वो गणतंत्र दिवस का बहिष्कार करें, रामजनम भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में सांप्रदायिक द्रष्टिकोण, यूनिफार्म सिविल कोड के मामले में शरियत में बदलाव का विरोध इत्यादि ये सिद्ध करता है कि ‘मुस्लिम अभिजन मुस्लिम्स गोलबंदी करके उन्हें प्रजातान्त्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्य से दूर रखना चाहता है एवं धर्म आधारित मुद्दों से देश की राजनीति में अपने सोदेबाजी के सिद्धांत को मजबूती देना चाहता है, ताकि मुस्लिम्स की एक अलग पहचान को आधार बना कर उनकी गोलबंदी कर सके और इसी के सहारे अभिजन अपनी एक विशिष्ट राजनीतिक पहचान बना सके और उसे कायम रख सकें।[xxvi] मुस्लिम अभिजन वर्ग का ये राजनीतिक व्यवहार सीधे हिंदुत्ववादी संगठनों को फायदा पहुंचाता है, इन दोनों की राजनीति ही एक दूसरे के विरोश पर टिकी है ताकि अपने अपने धर्म के मानने वालों को लामबंद किया जा सके जिसका फायदा इन्हें चुनावों में होता है।


निष्कर्ष

पश्चिमी विचार से विपरीत भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म और राजनीति के पूर्ण अलगाव का समर्थन नहीं करती, बल्कि यह धर्म एवं राजनीति के तर्कपूर्ण दूरी के सिद्धांत पर चलती है। इसका तात्पर्य यह है कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक इत्यादि निर्णय धार्मिक हस्तक्षेप से दूर रहेंगे। अर्थात राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और ना ही वो किसी धर्म विशेष को संरक्षण देगा। किन्तु साथ ही साथ यह कहना भी अतिश्योक्ति ना होगी के भारत ने एक धर्म निरपेक्ष राज्य को तो अपना लिया है पर धर्मनिरपेक्षता अब तक हमारे सामाजिक जीवन का अंग नहीं बन पायी है। संवैधानिक तौर पर भले ही भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है और भारतीय राज्य धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रश्रय नहीं देता है, किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक तौर पर भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के बावजूद भी सामाजिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं बन पाया है। उदहारण स्वरुप भारत में समय समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगे, राजनीतिक दलों द्वारा धर्म का राजनीतिक फायदों के लिए प्रयोग, संवेदनशील मुद्दों पर धार्मिक आधार पर राजनीतिक गोलबंदी एवं विभिन्न धर्मों के मध्य बढ़ता अविश्वास एवं द्वेष की भावना इत्यादि भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर चोट पहुचाते हैं। राजनीति में विभिन्न धर्मों के अति वादी दलों के उदय ने समस्या को और बढाने का ही कार्य किया है। इसमें एक तथ्य महत्वपूर्ण हो जाता है, अगर शहरी स्थिति को देखें तो ये ज्ञात होता है के सन १९९२ के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से शहरों में साम्प्रदायिक दंगों की संख्या बढ़ी है, एवं विगत कुछ वर्षों में भारत के कई शहरों ने दंगों का दावानल झेला है। सरकार, प्रशासन, नागरिक समाज इत्यादि को इन दंगों को रोकने में अथवा आपसी वैमनस्य कम करने में कोई विशिष्ट सफलता भी नहीं मिली है।[xxvii]


इस प्रकार की घटनाएं भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर एक कुठाराघात हैं, जिनका समाधान निकालने के लिए कोई भी संस्था अथवा दल गंभीर प्रतीत नहीं लग रहे। इसके अतिरिक्त कई अति वादी दल धर्म के नाम पर चुनावों में गोलबंदी करने के लिए भी कुख्यात है, इसी कारण भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को जनवरी २०१७ में एक निर्णय देना पड़ा जिसमे उसने चुनावों में धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि के प्रयोग पर पूर्णतया रोक लगाई,[xxviii] ऐसा कोर्ट को सिर्फ इसलिए करना पड़ा क्युकी धर्म का दुरुपयोग हमारे दैनिक जीवन पर, हमारी सोच पर, हमारी बहुसांस्कृतिक परम्परा पर, देश के संवैधानिक आदर्शों को और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर आघात करती है। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय का एक और फैसला अहम् हो जाता है, ये मुस्लिम धर्म में व्याप्त तीन तलाक के मुद्दे पर आया है जिसमे कोर्ट ने भारत की धर्मनिरपेक्ष संरचना को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने जहाँ एक ओर भारत की धर्मनिरपेक्ष संरचना एवं संवेधानिक आदर्शों को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों को ये कहा के वे किसी धर्म की धार्मिक भावनाओं को अघात ना पहुचाएं वहीं दूसरी ओर कोर्ट ने संवेधानिक मूल्यों और परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ये कहा के किसी भी धर्म के निजी कानून को मौलिक अधिकारों से ऊपर नही रखा जा सकता, अतः मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए कोर्ट ने तीन तलाक पर रोक लगाईं और साथ ही साथ सरकार को इस दिशा में कानून लाने का भी सुझाव दिया ताकि मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकार की रक्षा की जा सके।[xxix] अपने इन दोनों निर्णयों में कोर्ट कहीं ना कहीं भारत के संवेधानिक मूल्यों एवं धर्मनिरपेक्ष छवि की रक्षा करता हुआ ही प्रतीत होता है। अंत में प्रश्न यही खड़ा होता है कि क्या देश की सामाजिक संरचना भी धर्मनिरपेक्षता एवं संवेधानिक मूल्यों-परम्पराओं को इसी नजर से देखती है या हमारा समाज धर्मनिरपेक्षता को लेकर किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है? हमारे देश की विडंबना यही है के हमे एक अत्यंत आधुनिक राज्य मिला है, किन्तु हमारा समाज सतही तौर पर भले ही आधुनिक लगे किन्तु ये एक अत्यंत पारंपरिक समाज है, जहाँ धर्मनिरपेक्षता कई बार संकीर्ण तरह से समझी जाती है, और जातिगत, धार्मिक, भाषाई, आस्था आधारित इत्यादि मुद्दे ज्वलंत बन जाते हैं। भारतीय राज्य तो धर्मनिरपेक्ष है, समाज को धर्मनिरपेक्षता के मूल्य एवं आदर्शों को आत्मसात करने की आवश्यकता है, तभी भारत जो एक बहुसांस्कृतिक देश है, असली मायनों में एक आदर्श समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होगा। अगर देश की सभ्यताओं, संस्कृतियों, विभिन्न धर्म, विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य आपसी तालमेल रखना है, एक सहिष्णु समाज बनाना है, एक आदर्श राज्य का निर्माण करना है तो हम भारतियों को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाना पड़ेगा, हम भारतियों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है।


"We have to be Secular, We simply do not have any choice".



Footnotes


[i] Rajeev Bhargava, (2006), ‘The Distinctivness of Indian Secularism’, in T.N. Srinivasan, (eds.) The Future of Secularism (New Delhi: Oxford University Press). pp.20-53


[ii] अभय कुमार दुबे (2005) बीच बहस में सेकुलरवाद, (दिल्ली: वाणीप्रकाशन), पृष्ठ 50.


[iii] Shefali Jha, (2002), “Secularism in the Constituent Assembly Debates, 1946-1950”, Economic and Political Weekly, Vol. 37, No. 30, pp. 3175-3180.


[iv] Rajendra Kumar Sharma (2016) India at a Glance (Gurgaon: Patridge Publishing). Ch.2.


[v] D.D. Basu, (1993) Introduction to the Constitution of India (15th Edn.) (New Delhi: Printice Hall of India). pp.111, 327-328, 330, 336-337 and 343.


[vi] Ibid. pp. 115, 345-349 and 355.


[vii] AsisNandy, (1998), “The Politics of Secularism and The Recovery of Religious Tolerance”, in Rajeev Bhargava (eds.) Secularism and Its Critics (New Delhi: Oxford University Press). p-192.


[viii] Ibid. pp.321-344.


[ix] T.N. Madan, (1987), “Secularism in its Place”, The Journal of Asian Studies, Vol. 46, No. 4. (November). p.758.


[x] ParthaChatterjee, (1994), “Secularism and Tolerance”, Economic and Political Weekly, Vol. XXIX, No. 28. (July 9). pp.1768-77.


[xi] Rajeev Bhargava, (1994), “Giving Secularism its Due”, Economic and Political Weekly, Vol. 29, No. 28, (July 9). pp.1784-91.


[xii] Ibid.


[xiii] Ibid.


[xiv]Ibid.


[xv] Amartya Sen (2005) The Argumentative Indian: Writings on Indian History, Culture and Identity (New York: Farrar Straus and Giroux). Amartya Sen, Kaushik Basu and S. Subrahmanyam (1996), ”Secularism and its Discontents”, in Kaushik Basu and Sanjay Subrahmanyam, (eds) Unravelling the Nation, Sectarian Conflict and India’s Secular Identity (New Delhi: Penguin).

[xvi] P.C. Joshi, (2005), “Gandhi-Nehru Tradition and Indian Secularism”, Mainstream Weekly, Vol. XLV, No. 48. Accessed Via:http://www.mainstreamweekly.net/article432.html. Dated. 12/12/2017.


[xvii] दीन दयाल उपाध्याय (2006 reprint), “लौकिक, धर्महीन, धर्मरहित, धर्मनिरपेक्ष, अधार्मिक, अधर्मी, निधर्मी अथवा असांप्रदायिक”,पांचजन्य. Accessed Via:

http://www.deendayaldham.org/article16.php. Dated. 13/12/2018.


[xviii] Ibid.


[xix] Ibid.


[xx] Ibid.


[xxi] Atal Bihari Vajpayee (1992), “On the Concept of Indian Secularism”, Berkely Centre for Religion, Peace and World Affairs, (January. 1). Accessed Via: https://berkleycenter.georgetown.edu/quotes/atal-bihari-vajpayee-on-the-indian-concept-of-secularism. Dated. 13/12/2018.

[xxii] Christophe Jaffrelot (1999) The Hindu Nationalist Movement and Indian Politics: 1920 to the 1990s (New Delhi: Penguin Books).


[xxiii] Asghar Ali Engineer (1995) Lifting the Veil: Communal Violence and Communal Harmony in Contemporary India (Hyderabad: Sangam Books). Asghar Ali Engineer (2003)

Communal Challenge and Secular Response (New Delhi: Shipra Publications). pp.96-97.


[xxiv] Moin Shakir (1975), “The Muslim Political Elite”, in Zafar Imam (eds) Muslims of India (New Delhi: Orient Longman). p.169. Asghar Ali Engineer (1989) Communalism and Communal Violence in India: An Analytical Approach to Hindu Muslim Conflict (Delhi: Ajanta Publications). p.149.


[xxv] Fransis Robinson (1979), “Islam and Muslim Separatism”, in David Taylor and Malcolm Yapp, (eds), Political Identity in South Asia (London: Curzon Press). pp.78-112.


[xxvi] Moin Shakir,(1975), “The Muslim Political Elite”, in Zafar Imam, (eds) Muslims of India (New Delhi: Orient Longman). p.169. Asghar Ali Engineer (1989) Communalism and Communal Violence in India: An Analytical Approach to Hindu Muslim Conflict (Delhi: Ajanta Publications). p.149.


[xxvii] Paul R Brass (2003). Production of Hindu-Muslim Violence in Contemporary India (Washington: University of Washington Press). See also, Ashutosh Varshney (2002). Ethnic Conflicts and Civic Life: Hindus and Muslims in India, London & New Heaven: Yale University Press.


[xxviii] See, Rajgopal Krishnadas (2017), “Seeking Votes on Religious Basis a Corrupt Act,” The Hindu (January. 3). Accessed Via: http://www.thehindu.com/news/national/Seeking-votes-on-religious-basis-a-corrupt-act-SC/article16977220.ece. Dated. 28/1/2018.


[xxix] See, Rajgopal Krishnadas (2017), “Supreme Court Set Aside Instant ‘Talaq’”, The Hindu (August 23). Accessed Via: http://www.thehindu.com/news/national/supreme-court-sets-aside-instant-triple-talaq/article19538599.ece. Dated. 28/1/2018.




Dr Anurag Pandey

Assistant Professor

University of Delhi

India anuragspandey@yahoo.co.in

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