Anurag Pandey "NRC क्यों जरूरी नहीं है?"

Updated: Sep 12



NRC की फुल फॉर्म National Register of Citizen हैं, NRC का मुद्दा प्रमुख रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम से जुड़ा हुआ है, किन्तु वर्तमान सरकार ने इसे एक देशव्यापी मुद्दा बना दिया है, वर्तमान सत्तारूढ़ दल, “भारतीय जनता पार्टी” के एजेंडे में भी ये मुद्दा हमेशा से रहा है और समय समय पर बी जे पी इस मुद्दे को लेकर काफी आक्रामक भी रही है। वर्तमान में सत्तारूढ़ बी जे पी देश को ये समझाना चाह रही है के NRC देश के लिए क्यों जरूरी है और इससे देश को क्या क्या फायदे हो सकते हैं।


NRC कोई नई अवधारणा नहीं है, भारत की आजादी के बाद NRC की पृष्ठभूमि तैयार होती है और विशेष रूप से असम राज्य के संदर्भ में इस पर वाद विवाद किसी ना किसी रूप में छाया रहा है। इसके पीछे तर्क ये रखा जाता है के “बाहरी व्यक्तियों का समूह” अथवा गैर असमवासी राज्य में प्रवेश करता रहा है और इसी प्रमुख वजह से असम की असमिया संस्कृति खतरे में पड़ गई है और ये संस्कृति खुद अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन गई है जो धीरे धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है। ये एक ऐसा विचार है जो असम में रहने वाला प्रत्येक “मूल निवासी” सत्य मानता है और इसी तथाकथित सांस्कृतिक खतरे की वजह से असम राज्य में एक तरह का उप-राष्ट्रवाद देखने को मिलता है, जहाँ हर असमिया व्यक्ति अपने को अपनी संस्कृति को दूसरे समूहों और दूसरी संस्कृति के सामने बौना समझने लगता है, जिसके परिणाम स्वरुप लगभग सभी असम मूल निवासी अपनी असमिया संस्कृति को खतरे में देखते हैं और दूसरी संस्कृति के प्रति कटुता का भाव जन्म लेता है जो धीरे धीरे गहरा होता जाता है।


आज की जो ये समस्या है वो ब्रिटिश औपनिवेश काल की देन है, ये वो दौर था जब आज का बांग्लादेश बंगाल का हिस्सा हुआ करता था, वहां किसानों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी और ब्रिटिश सरकार से उनको कोई मदद नहीं मिल रही थी। किसानों में रोष चरम पर था और ये देखकर ब्रिटिश हुक्मरानों ने आज के बांग्लादेश और उस दौर के बंगाल से इन किसानों को असम राज्य में जबरन बसाया ताकि किसान किसी तरह का विद्रोह ना कर सकें। धीरे धीरे एक ऐसी स्थिति का जन्म होता है जब उस दौर के बंगाल से लोगों का असम राज्य में बस जाना एक आम बात हो गई लेकिन ये बसने की प्रकिया बहुत व्यापक नही थी, अधिकतर मामलों में किसान या खेतिहर मजदूर या गरीब मजदूर ही तात्कालिक बंगाल से असम राज्य में पलायन करे और जिनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी, धीरे धीरे इन लोगों ने असमिया खान पान, भाषा, त्यौहार, पहनावा, इत्यादि अपना लिया लेकिन अपनी बंगाली पहचान, भाषा, त्यौहार, पहनावा इत्यादि को छोड़ा नहीं। असम के मूल निवासी इन प्रवासी बंगाली लोगों की संस्कृति से अपने को दूर और अलग ही रखे।


इन बंगाली प्रवासियों में मुस्लिम भी थे और कई मुस्लिम्स पहले से ही असम में रहते आये थे, लेकिन समय के साथ साथ इस विचार ने जोर पकड़ा के असम में मुस्लिम बहुतायत में आ गये हैं और उनकी जनसँख्या काफी बढ़ गई है, ये एक भ्रम था, और इस भ्रम में खुद कई मुस्लिम भी आ गये थे। आजादी के समय ये विचार इतना प्रबल हो चुका था के मौलाना भाषानी ने असम राज्य को पाकिस्तान में मिलाने की वकालत करी, हालांकि उनकी इस मांग का समर्थन ना मुस्लिम्स से मिला और ना ही हिन्दुओं से। ये मांग खारिज कर दी गई और मौलाना भाषानी उस समय के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में चले गये।


आजादी के पश्चात असम के मूल निवासियों ने भारतीय राज्य के समक्ष ये मांग रखी के सिर्फ असम के मूल निवासियों को ही नागरिकता का अधिकार दिया जाए, उन्हें ही नागरिक माना जाए और जो असम के मूल निवासी नहीं हैं उन्हें विदेशी घोषित करते हुए असम से निकाला जाए। इस मांग का सम्मान करते हुए कई तरह के प्रयास सरकार द्वारा किये गये उदाहरण स्वरूप 1950 में ही Immigration Exclusion from Assam Act पारित हुआ इसमें ये प्रावधान किया गया के जो भी व्यक्ति असम का मूल निवासी नहीं है उसे नागरिकता नहीं दी जाएगी और 1951 की जनगणना में इस बात का ध्यान रखा गया। लेकिन 1957 में ये मानते हुए के अब असम में बहुत ज्यादा बाहरी व्यक्ति अथवा समूह का अस्तित्व नही है, Immigration Exclusion from Assam Act को सरकार द्वारा खत्म कर दिया गया।


इसके कुछ सालों बाद सन 1964-65 में पूर्वी पाकिस्तान से कई व्यक्ति विस्थापित होकर असम में शरणार्थी के रूप में आ जाते हैं और सन 1971 के युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थी असम में आकर बस जाते हैं। इन शरणार्थियों में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग थे। इस पलायन का प्रमुख कारण पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर किया जा रहा अत्याचार था, जिसमें लाखो लोगों को मार दिया गया था, घर जलाये गए और महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे कुकृत्य किये गये। मजबूरन पूर्वी पाकिस्तान के लोग भारत में शरण लेने पर विवश हुए और अधिकतर शरणार्थी असम में अपनी पनाह खोजे।


समय बीतने के साथ असम के मूल निवासियों में इन शरणार्थियों को लेकर एक शंका का भाव जन्म लेता है और विशेषकर असम के युवा ये मानने लगे के असम राज्य के जो भी संसाधन हैं उनपर अब उनका अधिकार नहीं रहा और उनका हक़ मारा जा रहा है, उनकी असमिया संस्कृति खतरे में पड़ गई है, क्योंकि असम में पूर्वी पाकिस्तान या 1971 के युद्ध के बाद बने नये राज्य बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी असम में आकर बस गये हैं।

इन्हीं सब कारणों की वजह से असम में All Asaam Student Union (आसु) का सन 1967 में जन्म हुआ, जिसने इसी वर्ष अपने दल का एक संविधान बनाया जिसमें असम को “विदेशी मुक्त” करने का प्रावधान किया गया। इस प्रकार आसु “विदेशी व्यक्तियों या समूहों” के विरुद्ध असम में एक आन्दोलन बनके उभरा। आसु ने इसी समय चुनाव के बहिष्कार की भी अपील करी और असम हित में सभी राजनीतिक दलों को चुनाव ना लड़ने का आग्रह किया, तब तक जब तक असम की वोटर लिस्ट में सुधार ना हो जाए और विदेशी समूहों को असम से बाहर ना कर दिया जाए।


ये समय 1971 बांग्लादेश युद्ध से पहले का था, युद्ध के बाद आसु ज्यादा सक्रिय हुआ और असम आए बांग्लादेशी शरणार्थियों के विरुद्ध चल रहे आन्दोलन को उग्र किया। इसी के चलते सन 1979 में असम साहित्य सभा एवं पूर्बान्चलिया लोक परिषद आसु के इस उग्र आन्दोलन से जुड़े और इन तीनों संगठनों ने आल असम गण संग्राम परिषद का गठन किया, कुछ समय बाद इस नवगठित परिषद में जातियाद्बाड़ी दल, असम युबक समाज और यंग लॉयर फोरम भी समाहित हो गये जिससे ये आन्दोलन और ज्यादा मजबूत हुआ। इस परिषद को आम जनता का भी पूर्ण समर्थन मिला। केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय या सत्ताधारी दल एवं उसके समर्थकों को छोड़कर लगभग सभी इस आन्दोलन में कूद पड़े। बी जे पी ने इस आन्दोलन को हवा दी और इसे मुस्लिम से जोड़ने कोशिश करी हालाँकि आल असम गण संग्राम परिषद का आन्दोलन उन सभी समूहों के विरुद्ध था जो मूल रूप से असम के नहीं थे वो चाहें किसी भी धर्म के क्यों ना हों। इसी दौर में इस विचार ने जोर पकड़ना शुरू किया के बांग्लादेश से कई समूह भारत (विशेषकर असम में) आकर बस गये हैं और इस वजह से असम की मूल संस्कृति, भाषा और संसाधनों पर खतरा मंडराने लगा है। प्रमुख रूप से संस्कृति और संसाधन पर ही ज्यादा जोर दिया गया और “असम बचाओ संसाधन सिर्फ असम के मूल निवासियों के लिए है” जैसे विचारों ने राज्य में मजबूत पैठ बनानी शुरू करी। ये माना जाने लगा के घुसपैठिये लगातार भारत बांग्लादेश सीमा पार करके भारत के असम राज्य में आ रहे हैं, और युद्ध के दौरान आए शरणार्थी अब भारतीय नागरिक बन चुके हैं और जो आ रहे हैं उन्हें नागरिकता गैर क़ानूनी तरीके से दी जा रही है जिससे असम की मूल संस्कृति खतरे में पड़ गई है और असम के संसाधनों पर विदेशी घुसपैठियों ने हक़ जमाना शुरू कर दिया है जिससे असम के मूल निवासी असम में ही अल्पसंख्यक बन रहे हैं और वंचित समूह बनते जा रहे हैं।


इसके विरुद्ध और असम की संस्कृति एवं संसाधनो को सुरक्षित रखने के लिए परिषद ने स्वतंत्रता आन्दोलन की तर्ज पर “विदेशी नागरिकों” के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू किया और कुछ ही महीनों में लाखों लोगों ने गिरफ्तारियां दीं। आसु ने सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय में लगातार ये जानकारी भेजी के असम में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों या अवैध घुसपैठियों की वजह से असम राज्य के मूल निवासियों एवं उनकी संस्कृति, राज्य के संसाधन इत्यादि के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है जो ना केवल असम राज्य के लिए वरन पूरे उत्तर-पूर्व के राज्यों के मूलनिवासियों के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है, जिससे समय रहते निपटना जरूरी है ताकि राज्य की संस्कृति और संसाधन सुरक्षित रहें और सिर्फ राज्य के नागरिक ही इसका लाभ उठा सकें। ये आन्दोलन कई जगह पर हिंसात्मक भी हुआ और कुछ ही समय में इतना उग्र हो गया के तात्कालिक राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को सन 1985 में एक समझौता करना पड़ा जिसे असम एकॉर्ड के नाम से जाना जाता है।


असम एकॉर्ड

राजीव गाँधी की सरकार ने सन 1985 में असम गण परिषद (जो उस वक्त राज्य में इन्हीं सब मुद्दों पर चुनाव जीती थी ) के साथ एक समझौता किया, जिसमें ये प्रावधान किया गया के 1951 से लेकर 1971 तक जो भी समूह या व्यक्ति असम में पूर्वी पाकिस्तान से आकर बस गये हैं उन्हें ही नागरिकता दी जाएगी, लेकिन जो व्यक्ति या समूह 24 मार्च 1971 के बाद असम आएं हैं उन्हें नागरिकता नहीं दी जाएगी, उन्हें विदेशी माना जायेगा। इस तिथि को एक कट ऑफ़ तारीख मानी गई क्योंकि ये माना गया के पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचार के कारण और 1971 युद्ध के कारण इस दौर में सबसे ज्यादा घुसपैठिये असम में आकर बस गए थे।

इस असम एकॉर्ड में एक क्लॉज़ था क्लॉज़ 6, इसके अनुसार जो 1951 से 1971 के मध्य पूर्वी पाकिस्तान से असम आकर बस गये थे उन्हें शरणार्थी मानते हुए संविधान में लिखित नागरिकता के प्रावधानों का पालन करते हुए नागरिकता दे दी जाएगी और असम के मूल निवासियों के संवैधानिक नागरिक अधिकारों की रक्षा की जाएगी। मजेदार बात ये हुई के इस क्लॉज़ 6 को कभी पूरी तरह से लागू ही नहीं किया गया, इस क्लॉज़ के पहले भाग को तो मान लिया गया और पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को नागरिकता दी जाने लगी, लेकिन दूसरे भाग को जो असम के मूल निवासियों के लिए था, लागू नहीं किया गया, जिसके परिणाम स्वरुप जो कट ऑफ़ तारिख तय की गई थी उसके बाद भी जो व्यक्ति या समूह बांग्लादेश से आए उन्हें नागरिकता मिलनी जारी रही लेकिन असम के मूल नागरिकों के लिए किये गये प्रावधान को कभी लागू ही नहीं किया गया। इससे मूल निवासियों में और ज्यादा रोष बढ़ता गया, ये भावना और विचार प्रत्येक असम वासियों के मन में घर कर गई के मुस्लिम की बढती हुई जनसख्याँ इसी अवैध घुसपैठ का परिणाम है और असम की मूल संस्कृति पर इस वजह से खतरा मंडराने लगा है, साथ ही राज्य के संसाधनों पर भी मुस्लिम्स अपना हक जमा रहे हैं और असम के मूल निवासी इससे वंचित हो रहे हैं, रहा सहा काम बी जे पी, आर एस एस इत्यादि संगठनों ने पूरा कर दिया और जनता के मध्य इस रोष का फायदा उठाते हुए घुसपैठ की समस्या को हिन्दू-मुस्लिम समस्या दिखाने की कोशिश करनी शुरू करी और असम के एक बड़े तबके के अंदर हर मुस्लिम को लेकर एक संशय की स्थिति पैदा करी जिसमें सभी मुस्लिम्स को असम के बाकी समुदाय बंगलादेशी ही मानने लगे, जबकि मुस्लिम्स के साथ साथ हिन्दू बंगलादेशी भी असम में घुसपैठ किये थे, जिनकी संख्या मुस्लिम घुसपैठियों से ज्यादा थी, और सन 2015 में बी जे पी ने बंगलादेशी हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, बाद में सन 2017 में बी जे पी ने बंगलादेशी हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए अथक प्रयास किये ताकि वो अपना वोट बैंक सुरक्षित कर सके। इस समय बी जे पी या आर एस एस को असम की मूल संस्कृति या संसाधनों का ख्याल नहीं आया।


NRC का मुद्दा असम में काफी पुराना है सन 1951 में हुए National Population Register के बाद ऐसा कोई भी सटीक कदम नहीं उठाया गया जो असम में नागरिकता तय कर सके और विदेशियों की पहचान कर सके। अतः NRC की मांग जोर पकड़ने लगी ताकि विदेशियों की पहचान की जा सके और असम के मूल निवासी अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और राज्य के संसाधनों का पूर्ण दोहन सिर्फ मूल निवासी ही कर सकें। लेकिन लम्बे समय तक NRC के मुद्दे पर कोई व्यवस्थित कार्य करने का प्रयास नहीं किया गया जिससे असम के लोगों में रोष और ज्यादा बढ़ा और असम के लोग अपनी हर समस्या को शरणार्थी, घुसपैठिये, दूसरे समुदायों या समूहों की बढती आबादी, असम की मूल संस्कृति पर खतरा और संसाधनों का दूसरे समुदायों द्वारा दोहन इत्यादि से जोडकर देखने लगे और NRC की मांग ने जोर पकड़ा। इस NRC में ये मांग भी रखी गई के जो भी व्यक्ति, समुदाय या समूह बाहर से आएं हैं उन्हें असम से निकाला जाए क्योंकि 1951 के बाद NRC को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया है। इसी बीच सन 1997 में असम चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों को डी केटेगरी में रखा जिनकी नागरिकता संदेहास्पद थी, और ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा थी जिन्हें डी केटेगरी में रखा गया।

इन्हीं सब वजहों के कारण असम में NRC की मांग ने जोर पकड़ना शुरू किया और परिणामस्वरूप सन 2009 में असम पब्लिक वर्क्स नाम के एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करी के असम में NRC की आवश्यकता है और 2013 में सुप्रीम कोर्ट के NRC लिस्ट को अपडेट करने का आदेश आने के बाद असम में NRC कराने की प्रक्रिया शुरू हुई। ये एक जटिल प्रक्रिया साबित हुई क्योंकि इस प्रक्रिया को पूरा होने में काफी समय लगा और यह एक लंबी प्रशानिक प्रकिया थी जिसमें असम के प्रत्येक व्यक्ति को देश का नागरिक होने के दस्तावेज दिखाने पड़े ये साबित करना पड़ा के वो भारतीय नागरिक हैं। इस NRC की प्रक्रिया में लगभग 1600 करोड़ रूपये खर्च हुए और 31 अगस्त 2019 को असम में फाइनल NRC लिस्ट जारी हुई। इसमें ये माना गया के असम में लगभग 19 लाख ऐसे लोग हैं जिनकी नागरिकता संदेहास्पद है, या ये व्यक्ति जरूरी दस्तावेज जमा नहीं करा पाए जो उनकी भारतीय नागरिकता साबित करता हो। ये सभी लगभग 19 लाख व्यक्ति एक फॉरेन ट्रिब्यूनल के जरिये दुबारा नागरिकता के दस्तावेज दिखाने के लिए आवेदन कर सकते हैं और यही ट्रिब्यूनल ये तय करेगा के इन 19 लाख में से कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो वास्तविक रूप में भारत के नागरिक हैं और कितने नागरिक नहीं हैं।


असम NRC का जो परिणाम आया उससे सबसे बड़ा झटका बी जे पी और आसु को लगा जो ये मानते थे के लाखों की संख्यां में मुस्लिम्स असम में हैं, और जो भारतीय नहीं हैं वो घुसपैठिये हैं जिन्हें भारत से निकाला जाना चाहिए, बी जे पी के तो चुनाव प्रचार में असम और बांग्लादेश का मुद्दा छाया रहता था, लेकिन NRC की जो फाइनल लिस्ट आई उसमें हिन्दुओं की संख्या मुस्लिम्स से कहीं ज्यादा निकली जिसने बी जे पी के उन सभी दावों की पोल खोल दी जो ये दावा करता था के लाखों बंगलादेशी मुस्लिम असम में आकर बस गये हैं और असम की जनसंख्या कुछ वर्षो में मुस्लिम बहुल हो जाएगी, असम के हिन्दू खतरे में हैं इत्यादि। ये लिस्ट आने के बाद बी जे पी अब स्वयं NRC की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर रही है। शुक्र है कांग्रेस या किसी और दल की सरकार के दौरान ये नहीं हुआ वरना शाहीन बाग़ के तर्ज पर आज बी जे पी सडको पर बैठी होती।


हालाँकि ये भी सत्य है के इस लिस्ट में कई व्यक्ति ऐसे हैं जो अलग अलग वजहों से अपने दस्तावेज नहीं दे पायें हैं, या ऐसे लोगों के भी नाम है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। इन सब वजहों से NRC की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं साथ ही प्रशासनिक प्रक्रिया की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े होते हैं, हालाँकि इस प्रशासनिक प्रक्रिया की प्रासंगिकता पर बी जे पी और आसु भी सवाल खड़े कर रहे हैं, लेकिन उनके सवाल हिन्दू जनसख्याँ का फाइनल लिस्ट में ज्यादा होने पर है, पूरी NRC की प्रशासनिक प्रकिया पर नहीं। इन्होने ये भी आरोप लगाया है के प्रशासनिक लापरवाही की वजह से सिर्फ 19 लाख ही इस NRC की फाइनल लिस्ट में आ पायें हैं जबकि संख्या कहीं ज्यादा होनी चाहिए, इनका आरोप है के लोगों ने (खासतौर से मुस्लिम्स) फर्जी दस्तावेज बना कर नागरिकता साबित करी है। खैर नागरिकता साबित करने की तलवार लगभग 19 लाख लोगों पर ही लटकी है बाकी सभी बातें बेमानी हैं।


यहाँ दो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं, पहला जहाँ जहाँ बी जे पी की सरकार है या जहाँ बी जे पी सत्ता में आना चाहती हैं, ऐसे लगभग सभी राज्यों में बी जे पी के द्वारा NRC की मांग उठाई जाने लगी है, दूसरे वर्तमान बी जे पी सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू किया है, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से अगर कोई प्रताड़ित हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिक्ख, इसाई भारत आते हैं तो ऐसे सभी समूहों को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। पहली बात से ये साफ़ होता है के बी जे पी कुछ विशिष्ट समुदायों को डाउटफुल सिटीजन बनाना चाहती है ताकि इस समूह के सभी डाउटफुल सिटीजन को मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा सके, वोट देने से वंचित किया जा सके, सरकारी सब्सिडी या योजनाओं से वंचित किया जा सके, दूसरी बात जो CAA पास किया गया है वो NRC की मूल भावना या इसके लक्ष्य के ठीक उलट है, जहाँ NRC कौन नागरिक नहीं है और उन्हें देश से बाहर निकालने की वकालत करता है या ऐसे सभी व्यक्तियों को उनके मूल देश भेजने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर CAA विदेशिओं को नागरिकता देने की बात करता है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है के अगर कोई हिन्दू सिक्ख, जैन बौद्ध, इसाई असम में आकर शरण लेते हैं और वो ये साबित कर देते हैं के वो अपने मूल देश में प्रताड़ित किये गये हैं तो उन्हें भारतीय नागरिकता मिल जाएगी और असम में रह सकेंगे, उस वक्त असम की मूल संस्कृति का क्या होगा? या कोई अन्य राज्य अगर असम की तर्ज पर विरोध करे तब ऐसे लोगों को CAA द्वारा कहाँ बसाएगा? ये कानून देश के संविधान की मूलभावना के भी विरुद्ध है क्योंकि देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर चलता है और धर्म के आधार पर भेद भाव नहीं करता, CAA में मुस्लिम्स का शामिल ना किया जाना देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर हमला भी करता है और बी जे पी मुस्लिम्स की नकारात्मक छवि बनाने और उसे पोपुलर करने का प्रयास भी कर रही है। ये संकेत देश के प्रजातंत्र के लिए खतरनाक हैं खासतौर से भारत जैसे देश के लिए जो विविधताओं का सम्मान करने के लिए जाना जाता है।

खैर एक बात साफ़ नजर आती है NRC के जरिये एक समूह विशेष को डाउटफुल सिटीजन बनाना और CAA के जरिये ये साबित करना के पड़ोसी मुस्लिम मुल्क अपने राज्य के अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते हैं, नागरिकता किसे मिलेगी या नहीं ये बाद की बात है फिलहाल बी जे पी इन दोनों के जरिये मुस्लिम्स को दूसरे धर्म का विरोधी घोषित करने का प्रयास करती दिख रही है।


अंत में असम और NRC पर वापस आते हैं, यहाँ एक सम्भावना पर चर्चा आवश्यक है, मान लिया जाए के असम में NRC की फाइनल लिस्ट में आए 19 लाख लोग अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाते हैं तो उनका क्या होगा? बांग्लादेश ने NRC की प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया है और वो इन 19 लाख लोगों को सिर्फ भारत के कहने भर से बांग्लादेश नहीं बुलाएगा। ऐसी परिस्थिति में ये सभी व्यक्ति राज्यविहीन हो जाएंगे ऐसी स्थिति में ये 19 लाख लोग कहाँ जाएंगे? असम के लोगों की शिकायत के दूसरे देशों से आकर विभिन्न समूह असम की मूल संस्कृति पर खतरा बन रहे हैं और मूल निवासी राज्य के संसाधनो का दोहन नहीं कर पा रहे हैं, ये जायज शिकायत है, ये शिकायत ठीक वैसे ही जायज है जैसे महाराष्ट्र में हिंदी भाषी या नार्थ इंडियन को संदेह की दृष्टि से शिव सेना या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना देखती है, इन सभी हिंदी भाषी नार्थ इंडियन्स को महाराष्ट्र खासतौर से मुंबई की संस्कृति पर हमले के रूप में देखती है, राज्य के संसाधनों पर सिर्फ मराठी व्यक्तियों का ही वर्चस्व हो, किसी दूसरे का नहीं, इसकी वकालत करती है। फिर यहाँ ये सवाल खड़ा होता है के भारतीय भी विदेशों में जाते हैं, नौकरी करते हैं और वहाँ कुछ समय बाद नागरिकता ले लेते हैं, जिन्हें NRI (अनिवासी भारतीय) कहा जाता है? ये सभी व्यक्ति एक ख़ास प्रकिया के तहत दूसरे देशों में जाकर नौकरी या पढ़ाई करते हैं लेकिन फिर भी ये व्यक्ति नस्लवाद का शिकार होते हैं, और दूसरे देश के “नस्लवादी मूल निवासी” इन्हें खतरे की तरह देखते हैं, लेकिन कानून अपना काम करता है और किसी भारतीय या अन्य देश से आये व्यक्तियों के साथ कुछ अप्रिय ना हो इसकी गारंटी लेता है। यहाँ मेरा ये मानना है के जो भी NRC में डाउटफुल सिटीजन घोषित किये गये हैं उन्हें भारतीय नागरिकता दे देनी चाहिए और इसके बाद एक ऐसी प्रकिया बनाई जाए जिससे घुसपैठ खत्म हो, जो भी व्यक्ति भारत आए वो बकायदा पुरे दस्तावेज लेकर ही भारत आए जैसे कोई भारतीय विदेश जाता है। ऐसा करके ही हम सभी अपने राष्ट्र राज्य की संकल्पना को और मजबूती दे सकते हैं, संकीर्ण विचार रखकर कोई राष्ट्र तरक्की नहीं कर सकता, राष्ट्र राज्य को समावेशी होना पड़ता है।


असम के इस अनुभव से जिसमें रातों रात 19 लाख लोग नागरिकता के दायरे से बाहर हो गए, जिनमें ज्यादातर गरीब, अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा तबका, जमीन विहीन व्यक्ति, महिलाएं, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समुदाय प्रमुख हैं। NRC नहीं होना चाहिए क्योंकि ये प्रजातंत्र के मूल तत्व के खिलाफ है, ये महिला विरोधी है, दलित, आदिवासी, बंजारे, जमीन विहीन व्यक्ति, अल्पसंख्यक समूह एवं अनपढ़ गरीब तबके के विरुद्ध है, सोचिये अगर देशव्यापी NRC लागू किया जाता है तब ये कितना घातक साबित होगा, कितना देश का पैसा बर्बाद होगा और ये देश कितने राज्यविहीन व्यक्तियों का गढ़ बन जाएगा, जिनके मौलिक अधिकार खत्म हो जाएंगे, सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिलेगा इत्यादि, इन सभी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा मैं एक और लेख में अलग से करूंगा। NRC “भारत एक राष्ट्र” की संकल्पना के विरुद्ध है, इसिलए इसका लागू ना होना ही न्यायसंगत है।


लेख का दूसरा और अंतिम भाग NPA, CAA और इन सभी के विरोध में चल रहे विभिन्न आन्दोलनों पर चर्चा करेगा।


Dr Anurag Pandey is Assistant Professor in University of Delhi. India.

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